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NDA ने कैसे पूरा क‍िया 25 साल का सफर और लोकसभा चुनाव 2024 में रहेगा क‍ितना असर?

National Democratic Alliance (NDA) का गठन 15 मई, 1998 को हुआ था।

गत 26 मई को नरेंद्र मोदी सरकार के नौ साल पूरे हुए। इसकी खूब चर्चा हुई। लेकिन इस बीच एक दूसरी बड़ी राजनीतिक घटना की वर्षगांठ पर काफी लोगों का ध्यान नहीं गया। 26 मई से 11 दिन पहले 15 मई को NDA (राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन) की 25वीं सालगिरह थी। साल 1998 में एनडीए का गठन हुआ था।

प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता ने पिछले कुछ सालों में भाजपा को गठबंधन की राजनीति की बाधाओं से बचने में मदद की है। हालांकि मोदी गठबंधन का महत्व समझते हैं। उन्होंने बीते रविवार को अपने पार्टी कार्यकर्ताओं को याद दिलाया कि एनडीए के अलावा कोई भी गठबंधन एक चौथाई सदी से बरकरार नहीं है।

एनडीए और लोकसभा चुनाव-2024

2024 के आम चुनावों से पहले विपक्षी दल गठबंधन बनाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे संकेत हैं कि भाजपा भी एनडीए में नई जान फूंकने के विकल्पों पर विचार कर रही है। हाल के वर्षों में कई दल एनडीए से बाहर हुए हैं। टीडीपी, जेडी (यू) और शिरोमणि अकाली दल (SAD) गठबंधन छोड़ चुके हैं। एनडीए को पूर्ण शिवसेना का भी समर्थन प्राप्त नहीं है, उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाला गुट अब कांग्रेस और एनसीपी के साथ है।

भाजपा के लिए एनडीए का महत्व

1996 में एनडीए सरकार 13 दिन में गिर गई थी। तब कांग्रेस की 140 के मुकाबले भाजपा ने 161 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह एनडीए ही था जिसने भाजपा को “राजनीतिक अस्पृश्यता” से उबरने में मदद की थी। एनडीए ने ही कई गैर-कांग्रेसी दलों को कांग्रेस दूरी बनाए रखने की हिम्मत दी थी।

1984 में भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली शिवसेना के अलावा उसका कोई ‘सच्चा’ सहयोगी नहीं था। 1996 में अकाली दल, हरियाणा विकास पार्टी (HVP) और समता पार्टी (अब JD-U) के साथ कई सीटों पर समझौता हुआ।

भाजपा को गठबंधन की राजनीति का पहला बड़ा फायदा 1998 में एनडीए के गठन के बाद मिला। इसी वर्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने केंद्र में दूसरी बार सरकार बनाई। इसी वर्ष टीएमसी, अन्नाद्रमुक, शिवसेना और बीजेडी के साथ आने से भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का विकास हुआ।

चुनावों में भाजपा को 182 सीटों पर जीत मिली, जबकि एनडीए ने सामूहिक रूप से 261 सीटें जीतीं। बाद में टीडीपी के बाहरी समर्थन देने के फैसले से एनडीए के पास सीटों की संख्या 272 हो गई। यह सरकार बनाने के लिए अनिवार्य जादुई आंकड़े से अधिक था।

गठबंधन को व्यापक आधार देने के लिए भाजपा को मजबूरन राम मंदिर निर्माण करने, धारा 370 खत्म करने और समान नागरिक संहिता लागू करने जैसे वैचारिक प्रतिबद्धताओं से दूरी बनानी पड़ी।

इस तरह जिस गठबंधन ने भाजपा को सत्ता में आने में सक्षम तो बनाया, लेकिन उसकी स्थिरता और निरंतरता बनाए रखने के लिए भाजपा को अपने एजेंडे के किनारा करना पड़ा।

गुजरात दंगा और गठबंधन को धक्का

1999 में AIADMK द्वारा समर्थन वापस लिए जाने के बाद पहली NDA सरकार गिर गई। इसके बाद कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि में हुए आम चुनावों में, एनडीए ने सत्ता में वापसी की। अप्रत्याशित नए दल गठबंधन में शामिल हुए। तमिलनाडु में AIADMK की कट्टर प्रतिद्वंदी DMK और जम्मू और कश्मीर की नेशनल कांफ्रेंस ने भाजपा का साथ दिया। इन पार्टियों के शामिल होने से एनडीए की बढ़ती अपील को और मजबूती मिली।

अटल बिहारी वाजपेयी ने ही एनडीए-II सरकार का नेतृत्व किया। वह पांच साल का कार्यकाल पूरा करने वाले पहले गैर-कांग्रेसी पीएम बने। उनका कार्यकाल पूरा होता उससे पहले 2002 में भाजपा शासित गुजरात में सांप्रदायिक दंगा हो गया। तब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे।

दंगे से एनडीए को नुकसान हुआ। तब लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) के लोकसभा में चार सांसद थे, उसने दंगों के तुरंत बाद एनडीए छोड़ दिया। नेशनल कांफ्रेंस और DMK भी गठबंधन से बाहर हो गए।

वाजपेयी ने समय से पहले चुनाव कराने का फैसला किया। ‘इंडिया शाइनिंग’ का नारा दिया। लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के दांव को कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने विफल कर दिया।

जारी रही यात्रा

इस झटके के बावजूद, एनडीए की राजनीतिक यात्रा जारी रही। भारत के राजनीतिक मानचित्र पर एनडीए की एक बड़ी छाप थी क्योंकि कई राज्य उसके अधीन थे। हालांकि, गठबंधन को केंद्र की सत्ता पाने में 10 साल लग गए। लेकिन इस बार मोदी की विशाल उपस्थिति में भाजपा अपने मूल वैचारिक वादों के साथ थी।

अकेले 282 सीटें जीतने के बाद, भाजपा अब एनडीए की निर्विवाद नेता थी। उसे सहयोगी दलों को खोने का डर नहीं था। 2019 में, मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने अपने प्रभुत्व को और बढ़ाया 303 सीटों के साथ सत्ता में वापसी की। इस तरह भाजपा ने सहयोगी दलों की आवश्यकता को और कम कर दिया।

मोदी के कार्यकाल में आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्यों में खुद को स्वतंत्र रूप से स्थापित करने के लिए भाजपा के आक्रामक रवैया अपनाया। इससे टीडीपी, शिवसेना और जद (यू) जैसे पुराने एनडीए सहयोगी गठबंधन से बाहर हो गए। हालांकि शिंदे के नेतृत्व वाला शिवसेना गुट बाद में एनडीए में लौट आया। अकाली दल, जो 1996 से एनडीए के साथ था, उसने 2021 में विवादास्पद कृषि कानूनों का विरोध करते हुए गठबंधन छोड़ दिया।

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