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सामाजिक ताना-पुरुष बराबरी का नारा आख़िर खोखला निकला

भास्कर ओपिनियनसामाजिक ताना-बाना:दुनियाभर में महिला-पुरुष बराबरी का नारा आख़िर खोखला निकला

महिला-पुरुष बराबरी की बात बड़े गर्व से करने वाले दुनिया के कई देशों में यह महज़ नारा ही है। मैकेंजी की हाल में आई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि दुनियाभर में पुरुषों को जिस पद पर जिस काम के लिए सौ रुपए मिलते हैं, महिलाओं को उसी पद पर उसी काम के लिए केवल 73 रुपए ही दिए जाते हैं।

यानी पुरुषों के मुक़ाबले महिलाओं का वेतन 27 प्रतिशत कम होता है। भारत में तो हाल और भी बुरे हैं। यहाँ महिलाओं को दुनिया के औसत से भी दो प्रतिशत कम वेतन मिलता है। यानी पुरुषों को सौ रुपए मिलते हैं तो महिलाओं को मात्र 71 रुपए।

रिपोर्ट बताती है कि भारत के सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे राज्य केरल में यह अंतर या भेदभाव सर्वाधिक है। सांख्यिकी विभाग का कहना है कि केरल के गाँवों में पुरुषों का औसत पारिश्रमिक 842 रुपए रोज़ है। इसके मुक़ाबले महिलाओं का पारिश्रमिक मात्र 434 रुपए रोज़ ही है। यानी लगभग आधा।

वजह साफ़ है- पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ महिलाओं को अपने काम से कई बार रोकती हैं और कई बार तो काम ही छुड़वा देती हैं। जबकि पुरुष के पास महिलाओं की बजाय पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ बहुत कम होती हैं। ज़िम्मेदारी से यहाँ मतलब केवल पैसे कमाने से नहीं है। रिश्तेदारी निभाना, बच्चों को सँभालना, उनका होमवर्क कराना, इस सब पर आख़िर पुरुष कब ध्यान देता है? बल्कि वह तो यही मानता है कि उसकी पत्नी या माँ, कामकाजी होने के बावजूद घर के सभी काम करने के लिए अकेली ज़िम्मेदार है।

अचरज की बात यह है कि युगों- युगों से यह सब वह करती भी आई है। जबकि पुरुष तो ऑफिस से आकर बैग फेंककर खाने का ऑर्डर देने के अलावा कुछ करता ही नहीं। आख़िर यह कैसी बराबरी है? कैसा न्याय है?

ठीक है वर्षों पहले महिलाएँ घर से नहीं निकलती थीं। केवल घर में रहकर ही सारे काम किया करती थीं, लेकिन यह गलती भी किसकी थी? पुरुषों की ही तो थी। उन्होंने महिलाओं को पढ़ने से रोके रखा। आगे बढ़ने नहीं दिया। कदम से कदम मिलाकर चलने तक नहीं दिया।

आख़िर वे क्या करतीं? वे घर के कामों में, परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने में पारंगत हो गईं, लेकिन यह विशेष गुण उनके लिए सजा कैसे बन सकता है। जो और जितना काम पुरुष ऑफिस में करता है, उतना ही एक महिला भी करती है। फिर घर आकर भी वही अकेली सारे काम से क्यों जूझे? पुरुष भी उसका आधा काम क्यों नहीं करता? सवाल कई हैं, लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज के पास कोई जवाब नहीं है।


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