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वो IAS जिन्होंने खुलासे किए और राजीव गांधी की सत्ता चली गई, बाद में बने थे कर्नाटक के राज्यपाल

1950 बैच के आईएएस टीएन चतुर्वेदी जब कैग बने तो उनकी एक रिपोर्ट ने राजीव गांधी की सरकार को गिरा दिया था। राजीव गांधी सफाई देते रहे, लेकिन टीएन चतुर्वेदी की रिपोर्ट और वीपी सिंह के आक्रमक प्रचार से कांग्रेस को तब बड़ी हार का सामना करना पड़ा था।

आईएएस टीएन चतुर्वेदी जब कैग (नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक) थे, तब उनके एक खुलासे ने राजीव गांधी की सरकार मुश्किलों में आ गई थी। इस वजह से राजीव गांधी के सबसे भरोसेमंद साथी रहे वीपी सिंह विद्रोह करके उन्हीं के खिलाफ मैदान में उतर गए थे। यह सब हुआ था सिर्फ और सिर्फ एक खुलासे थे, जिसे बोफोर्स घोटाला कहा जाता है।

टीएन चतुर्वेदी भले ही अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन बोफोर्स घोटाले पर उनकी रिपोर्ट, हमेशा कांग्रेस को परेशान करती रही है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के अनुसार इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एमए-एलएलबी की डिग्री हासिल करने के बाद चतुर्वेदी 1950 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के लिए चुने गए थे। उन्हें राजस्थान कैडर आवंटित किया गया था। रिटायर होने से पहले वो केंद्रीय गृह सचिव सहित कई बड़े पदों पर रहे थे।

जब बने कैग- कई पदों पर रहने के बाद भी उन्हें सबसे ज्यादा याद 1980 के दशक के अंत में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) के रूप किया जाता है। CAG के रूप में, उन्होंने 1989 में एक रिपोर्ट तैयार की थी, जिसमें राजीव गांधी के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा हॉवित्जर तोपों, जिसे बोफोर्स भी कहा जाता है, की खरीद में अनियमितता पाई गई थी। रिपोर्ट में हॉवित्जर बनाने वाली स्वीडिश हथियार कंपनी बोफोर्स के साथ सौदे मे घोटाले की बात कही गई थी।

टीएन चतुर्वेदी की ये रिपोर्ट संसद में पेश होने से पहले ही मीडिया में लीक हो गई थी। जिसके बाद हंगामा खड़ा हो गया। विपक्ष कांग्रेस पर हमलावर हो गया। सरकार के खिलाफ माहौल तैयार होने लगा और इन सबके बीच राजीव गांधी के सबसे भरोसेमंद वीपी सिंह कांग्रेस से अलग हो गए। कांग्रेस सौदे में किसी भी घोटाले की बात से इनकार करती रही।

हार गई कांग्रेस- तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी दावा करते रहे कि घोटाला नहीं हुआ है, लेकिन उनके इस दावे पर टीएन चतुर्वेदी की रिपोर्ट और वीपी सिंह का आक्रमक प्रचार भारी पड़ा। देश में आम चुनाव हुआ और कांग्रेस को बहुत बुरी हार का सामना करना पड़ा। राजीव गांधी सत्ता से बाहर हो गए और वीपी सिंह प्रधानमंत्री बनें।

विवादों में जब घिरे- रिटायर होने के बाद टीएन चतुर्वेदी बीजेपी में शामिल हो गए। एक ऐसा अधिकारी, जिसकी रिपोर्ट ने कांग्रेस की सरकार को गिरा दिया, आजतक जिसके दाग कांग्रेस पर लगे हैं, वो रिटायरमेंट के बाद कांग्रेस की विरोधी पार्टी में शामिल हो जाए, तो विवाद उठना स्वाभाविक था। चतुर्वेदी भाजपा की तरफ से लोकसभा चुनाव भी लड़े लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। चतुर्वेदी भाजपा की तरफ से 1992 से 1998 तक पार्टी के राज्यसभा सांसद बनाए गए थे। कांग्रेस ने इस मामले को लेकर चतुर्वेदी पर जमकर हमला बोला था।

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