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राहत शिविरों की खस्ता हालत… 3 महीने से जल रहे मणिपुर में INDIA गठबंधन ने क्या देखा?

Manipur Violence: मणिपुर का दौरा करने के बाद विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया (I.N.D.I.A) का प्रतिनिधिमंडल रविवार को दिल्ली लौट आया है। राष्ट्रीय राजधानी लौटने के बाद प्रतिनिधिमंडल में शामिल अधिकांश सांसदों की एक ही शिकायत थी कि वहां राहत शिविरों की हालत बहुत खराब है। जहां हिंसा प्रभावित लोगों को रखा गया है। विपक्षी सांसदों ने शनिवार को मणिपुर में राहत शिविरों का दौरा किया था और फिर मणिपुर की राज्यपाल अनुसुइया उइके को एक ज्ञापन सौंपा था।

विपक्षी सांसदों के प्रतिनिधिमंडल ने मणिपुर के राज्यपाल को सौंपे ज्ञापन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य में जारी हिंसा पर पीएम की चुप्पी उनकी उदासीनता को दर्शाती है। ज्ञापन में राज्य में शांति और सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए कहा गया और केंद्र को पिछले 89 दिनों से मणिपुर में कानून और व्यवस्था के पूरी तरह से खराब होने से अवगत कराया।

शनिवार को 21 सदस्यीय टीम ने दंगा प्रभावित चुराचांदपुर शहर का दौरा किया था। जहां उन्होंने राहत शिविरों में कुकी नेताओं और पीड़ितों से मुलाकात की थी। सड़क मार्ग से यात्रा करने के जोखिम से बचने के लिए वे हेलीकॉप्टर से चुराचांदपुर पहुंचे। बाद में इंफाल में उन्होंने मैतेई समुदाय के पीड़ितों के लिए राहत शिविरों का दौरा किया। रविवार को विपक्षी दलों को प्रतिनिधिमंडल मणिपुर का जायजा लेने बाद दिल्ली लौट आया। इसके बाद नेताओं ने आंखों देखी तस्वीर मीडिया के साथ अपने शब्दों में साझा की।

मणिपुर से लौटने के बाद कांग्रेस सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार दोनों ही मणिपुर के लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठा रही हैं। दिल्ली और देश के बाहर भी बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं। उन्होंने कहा कि लोगों के घरों में खाना और दवाइयां नहीं हैं, बच्चों के पास पढ़ने के लिए कोई सुविधा नहीं है, कॉलेज के छात्र कॉलेज नहीं जा सकते। दो समुदायों के बीच लड़ाई को खत्म करने के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने अपनी आंखें बंद ली हैं। उन्होंने कहा कि लोगों का राज्य सरकार पर भरोसा खत्म हो गया है, लोग मुख्यमंत्री की शिकायत कर रहे हैं। मणिपुर में हम म्यांमार के साथ बॉर्डर साझा करते हैं और म्यांमार के पीछे चीन है। मणिपुर में शांति बहाली के लिए हर संभव प्रयास होना चाहिए। मणिपुर के लोग अपना घर छोड़कर विस्थापित हो चुके हैं, वे नहीं जानते कि अपने घर वापस कब लौटेंगे। यहां लोगों के लिए खाने और दवाई की सुविधा नहीं है। बच्चों की पढ़ाई रुकी हुई है। लोग एक दूसरे पर विश्वास नहीं कर रहे, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो हालत और बेकाबू हो जाएंगे।

आरजेडी सांसद मनोज झा ने कहा कि मणिपुर में लोगों की इकलौती मांग है कि न्याय के साथ शांति बहाल हो। कहीं भी शांति का कोई विकल्प नहीं है। चाहे मध्य प्रदेश हो या मणिपुर। हम मणिपुर में न्याय चाहते हैं। हमारी एकमात्र मांग है कि दोनों समुदाय सद्भाव से रहें। मणिपुर में स्थिति खौफनाक, दर्दनाक और पीड़ादायक है। संसद में पहले ही चर्चा हो चुकी है कि सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल को मणिपुर का दौरा करना चाहिए।

कांग्रेस सांसद फूलोदेवी नेताम ने मणिपुर पुलिस पर बड़ा आरोप लगाया। फूलोदेवी नेताम ने कहा कि दो लड़कियों के साथ रेप हुआ। पीड़ितों ने मुझे बताया कि उनके साथ पुलिस के सामने बलात्कार हुआ, लेकिन सरकार कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। किसी को भी इतना बेशर्म नहीं होना चाहिए। हम मांग करते हैं वहां जल्द से जल्द सामान्य स्थिति बहाल की जानी चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि हम एक प्रामाणिक रिपोर्ट बनाएंगे और इसे सदन के सामने पेश करेंगे। हम मांग कर रहे हैं कि प्रधानमंत्री को मणिपुर पर चर्चा के लिए संसद में आना चाहिए। सदन के पटल की रणनीति पर चर्चा करने के लिए गठबंधन के नेता कल सुबह 9.30 बजे संसद बैठक करेंगे।

मणिपुर से लौटने के बाद कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने कहा, ‘वहां के लोगों के साथ जो हुआ उससे हम निराश हैं। राज्यपाल के साथ बैठक में हमने सुझाव दिया कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में एक अखिल भारतीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल यहां आए। हम पहले दिन से यही सुझाव दे रहे हैं, लेकिन पीएम गायब हैं। उनके मंत्री दिल्ली में बैठकर बयान दे रहे हैं। उन्हें वहां की जमीनी हकीकत देखने के लिए मणिपुर का दौरा करना चाहिए।’

एनसीपी (शरद पवार गुट) सांसद पीपी मोहम्मद फैजल ने मणिपुर से लौटने के बाद कहा, ‘हमने जो कुछ भी देखा और सुना है वह हमारी उम्मीदों से परे है। उन लोगों को हुई पीड़ा को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। अगर सरकार ने शुरू में कार्रवाई की होती तो ऐसी स्थिति से बचा जा सकता था, सरकार मूकदर्शक बनी रही और कार्रवाई नहीं की। ठीक है…हमने राज्यपाल से मुलाकात की है और उनसे अनुरोध किया है कि वह एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल लाने और इन समुदायों के नेताओं को बुलाने और उन्हें एक साथ बैठाने के लिए सरकार से बात करें।’

सीपीआई (एम) सांसद एए रहीम ने कहा, “वहां सभी प्रणालियां ठप हो गई हैं। डबल इंजन वहां पूरी तरह से पंगु हो गया है और फेल हो गया है। राहत शिविरों में कोई राहत नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नफरत की राजनीति के कारण वहां नहीं जा सकते। यह मणिपुर में भाजपा और आरएसएस के नेतृत्व में राजनीतिक ध्रुवीकरण का परिणाम है।’

रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के सांसद एनके प्रेमचंद्रन ने कहा, ‘मणिपुर की स्थिति अभी भी खराब है। राहत शिविरों में लोगों की ठीक से देखभाल नहीं की जा रही है। राहत शिविरों में सभी सुविधाएं उपलब्ध कराने की तत्काल आवश्यकता है। हमने राज्यपाल से मांग की है कि तुरंत एक सर्वदलीय दल को मणिपुर भेजा जाए, ताकि स्थिति का सही आकलन किया जाए और भारत सरकार को सिफारिशें दी जा सकें। उन्होंने कहा कि यदि आप (केंद्र) हस्तक्षेप नहीं करता है, तो स्थिति खराब हो जाएगी और इसका असर उत्तरी राज्यों के साथ-साथ देश की सुरक्षा पर भी पड़ेगा।’

शिवसेना (यूबीटी) नेता संजय राउत ने रविवार को विपक्षी गुट इंडिया के सदस्यों की मणिपुर यात्रा को “दिखावा” बताने के लिए भाजपा पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न तो हिंसा प्रभावित राज्य का दौरा किया और न ही संसद में इस बारे में बात की। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री जी…मणिपुर भारत का हिस्सा है और उसके नागरिक भारतीय नागरिक हैं…उनकी बात सुनिए। इसीलिए भारत गठबंधन प्रतिनिधिमंडल ने राज्य का दौरा किया। उन्होंने पूछा, नागरिकों का दुख समझना और उन्हें सांत्वना देना दिखावा कैसे कहा जा सकता है?

राज्यसभा सदस्य ने कहा, प्रधानमंत्री मणिपुर नहीं गए हैं और उन्होंने संसद में अभी तक इस मुद्दे पर बात नहीं की है। राउत ने आरोप लगाया, ”विपक्षी गठबंधन के नेताओं ने प्रभावित नागरिकों से बात की और उनकी शिकायतों को समझा, अगर इसे दिखावा कहा जाता है, तो हमने इससे क्रूर सरकार और राजनीति नहीं देखी है।”

TMC सांसद सुष्मिता देव ने कहा कि पूरा विपक्ष मणिपुर के साथ है। JMM सांसद महुआ माजी ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि मणिपुर में शांति लौट आई है, लेकिन शांति कहां है? राज्य अभी भी जल रहा है. जबकि DMK सांसद कनिमोझी ने कहा कि लोग सरकार द्वारा अपमानित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने दावा किया यहां के लोगों को लगता है कि सरकार ने हस्तक्षेप नहीं किया और हिंसा जारी रही तो उन्हें सीएम एन बीरेन सिंह पर कोई भरोसा नहीं है।

विपक्षी दलों का प्रतिनिधिमंडल मणिपुर क्यों गया?

विपक्षी दलों का प्रतिनिधिमंडल राज्य में जमीनी हकीकत का जायजा लेने के लिए दो दिनों के लिए राज्य के दौरे पर था। मणिपुर में मई की शुरुआत से जातीय हिंसा भड़क उठी थी। विपक्षी दलों के नेताओं की इस यात्रा का उद्देश्य केंद्र के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में बहुप्रतीक्षित चर्चा से पहले संसद में पीएम मोदी से बयान मांगने के लिए सरकार पर दबाव बढ़ाना है।

मणिपुर में पीछे लगभग तीन दशकों से अधिक समय से कुकी और मैतेई समुदायों के बीच जारी भूमि विवाद मुख्य वजह है। दरअसल, मणिपुर की कुल 30 लाख की आबादी में मैतेई लोगों की हिस्सेदारी 53 फीसदी है और ये लोग घाटी क्षेत्र में रहते हैं, जो मणिपुर की कुल भौगोलिक क्षेत्र का 10 फीसदी हिस्सा है। वहीं कुकी समेत अन्य आदिवासी समुदायों की जनसंख्या हिस्सेदारी करीब 40 फीसदी है। इनमें सबसे ज्यादा 24 फीसदी नागा जनजातियां हैं, उसके बाद 16 फीसदी कुकी या ज़ोमी जनजातियां हैं। मणिपुर में ज्यादातर आदिवासी पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं, जो मणपुर की कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 90 फीसदी हिस्सा है।

मणिपुर में हिंसा की स्थिति तब पैदा हुई, जब ऑल ट्राइबल ने मणिपुर के पहाड़ी जिलों में ‘आदिवासी एकजुटता मार्च’ का आयोजन किया और फिर उसके प्रतिक्रिया में 3 मई को लगभग पूरे मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच हुए हिंसक टकराव में अब तक 160 से अधिक लोग मारे गए और 600 से अधिक घायल हुए। वहीं हजारों की संख्या में लोग बेघर हुए और करोड़ों की संपत्तियां भी बर्बाद हुईं। मणिपुर छात्र संघ मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति (एसटी) दर्जे की मांग के खिलाफ मई से अब तक लगातार विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

1993 में भी हुआ था मणिपुर में दंगा

साल 1993 में मणिपुर हिंसा के दौरान राज्य में नागा और कुकी समुदाय आमने-सामने हुए थे। उस दौरान 10-20 और 50 नहीं, बल्कि सैकड़ों लोग मारे गए थे। कुछ आंकड़े बताते हैं कि लगभग 700 लोग, तो वहीं कुछ लोगों का कहना है कि इसमें अनगिनत लोग मारे गए थे।

मणिपुर का भारत में विलय

साल 1947 में मणिपुर अंग्रेजों से आजाद हुआ था। उस दौरान तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की जिम्मेदारी थी कि वो सभी रियासतों का भारत में विलय कराएं। 1947 में जब मणिपुर आजाद हुआ तब से मणिपुर का शासन महाराज बोध चन्द्र के कन्धों पर था। राजा ने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर तो किए, लेकिन अपनी रियासत में एक संविधान भी बना दिया, जिसके बाद साल 1948 में मणिपुर में चुनाव भी हुए। साल 1949 में शिलांग में मणिपुर के राजा ने भारत के साथ अपनी रियासत को शामिल करने में रजामंदी दी। इसी के साथ 15 अक्टूबर, 1949 को मणिपुर भारत का हिस्सा बन गया। हालांकि, अब भी मणिपुर के अलगाववादी नेताओं का दावा है कि 1949 के विलय पत्र पर मणिपुर के राजा के हस्ताक्षर जबरदस्ती कराए गए थे। मणिपुर 1956 में केंद्र शासित राज्य बना और 21 जनवरी, 1972 को इसे पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया था।

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