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राजनीति के शुरुआती दिनों में शरद पवार ने ‘अगवा’ कर लिया था नेता, अखबार में छप गई थी खबर

महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े नाम शरद पवार वर्तमान में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख हैं। उन्होंने इस पार्टी की स्थापना कांग्रेस से अलग हो कर की थी। पवार ने अपने राजनीति की शुरुआत भले ही कांग्रेस के साथ की हो लेकिन उनके परिवार का वैचारिक रूझान वामपंथ की तरफ था। हालांकि पवार की मां पुणे के लोकल बोर्ड के सदस्य का चुनाव कांग्रेस पार्टी के टिकट से ही जीती थीं लेकिन वह वैचारिक रूप से पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी ऑफ इंडिया (पीडब्ल्यूपी) के करीब थी।

पवार के बड़े भाई वसन्त राव पीडब्ल्यूपी पार्टी के सक्रिय सदस्य थे। 1940 के दशक के उत्तरार्द्ध और 1950 के दशक के पूर्वार्द्ध में पीजेंट्स पार्टी एक वामपंथी राजनीतिक शक्ति के रूप में देखी जाती थी। पीडब्ल्यूपी पार्टी का निर्माण केशवदास जेधे, शंकरराव मोरे और दत्ता देशमुख ऐसे कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर किया था।

इस नई पार्टी की स्थापना का उनका उद्देश्य मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा को आगे बढ़ाना था। इन तीन नेताओं की मंडली कांग्रेस की आर्थिक नीतियों से असंतुष्ट थी। लेकिन साल 1951 में पीडब्ल्यूपी में विभाजन हो गया और केशवदास जेधे कांग्रेस में पुनः वापस चले गए। वर्तमान में पवार की बहन सरोज के पति एन.डी. पाटिल पीडब्ल्यूपी के कर्ताधर्ता हैं।

राजनीति में कैसे आए?

शरद पवार अपनी आत्मकथा ‘अपनी शर्तों पर’ में बताते हैं कि वह कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही राजनीति में सक्रिय हो गए थे। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह उस उम्र में ही यह समझ गए थे कि राजनीति ही वह केंद्र है जहां से सामाजिक सुधार संभव हैं।

पवार लिखते हैं, “महाराष्ट्र के प्रथम कांग्रेसी मुख्यमंत्री और कांग्रेस के लीडर वाई.बी. चव्हाण ने मुझे मेरी युवावस्था में सर्वाधिक प्रभावित किया। उनके अतिरिक्त पंडित जवाहरलाल नेहरू की भी छाप हमारे ऊपर पड़ी। हालांकि मैं पीडब्ल्यूपी के नेताओं की ईमानदारी, सत्यनिष्ठा और सादगी की प्रशंसा करता था लेकिन धीरे-धीरे मैं इस बात से सहमत होता गया कि भारत का भविष्य कांग्रेस के हाथों में ही सुरक्षित है और इसी के नेतृत्व में विकास सम्भव है।”

साल 1958 में पवार कॉलेज में थे, जब उन्होंने पुणे के कांग्रेस भवन में जाकर पार्टी की सक्रिय सदस्यता ली थी। बीएमसीसी कॉलेज में अपनी शिक्षा के अंतिम वर्ष में उन्होंने छात्रों को सम्बोधित करने के लिए वाई. बी. चव्हाण को आमंत्रित किया। पवार के आमंत्रण पर कॉलेज में पहुंचकर उन्होंने एक ओजपूर्ण और उत्साहवर्धक भाषण दिया।

पवार लिखते हैं, “वह सचेत थे कि मैंने उनको विद्यालय में बुलाने की पहल की है, इसलिए अपना भाषण समाप्त करने के बाद उन्होंने मुझे मंच पर बुलाया और कहा कि ऐसे नौजवानों को चाहिए कि वे कांग्रेस में शामिल हों और राजनीतिक में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए आगे आएं। मैंने पहले ही यह काम प्रारम्भ कर दिया था लेकिन चव्हाण साहेब के शब्दों ने हमारा उत्साहवर्धन किया और मेरे आत्मविश्वास में वृद्धि की। कांग्रेस पार्टी की सदस्यता ग्रहण करने के बाद मैं पुणे के पार्टी कार्यालय में अक्सर जाने लगा।”

कैसे सीखी ‘जमीनी स्तर’ की राजनीति?

ये कांग्रेस में पवार के शुरुआती दिन थे। वह तमाम अन्य युवा नेताओं की तरह ही वरिष्ठ कांग्रेसी नेता भाऊ साहेब शिराले और राम भाऊ तेलंग जैसे लोगों के आप-पास मंडराते रहते थे। पवार बताते हैं कि ये दोनों नेता कांग्रेस के मजबूत स्तंभ हुआ करते थे। इन नेताओं की पुणे म्युनिसिपल कारपोरेशन (पीएमसी) की राजनीति में उनकी गहरी पैठ थी। इन्हीं नेताओं की संगत में पवार ने भी सीखी की ‘जमीनी राजनीति’ कैसे होती है।  

जमीनी राजनीति सीखने के चक्कर में ही शरद पवार एक नेता के ‘अपहरण’ में शामिल हो गए थे। दरअसल, तब पुणे म्यूनिसिपल कारपोरेशन (पीएमसी) की कमेटी में चेयरमैन पद के चुनाव होना था। कांग्रेस और इसकी मुख्य विपक्षी पार्टी संयुक्त महाराष्ट्र समिति (एसएमएस) के सदस्यों की संख्या लगभग बराबर थी। ऐसे में यह जरूरी नहीं था कि चेयरमैन कांग्रेस का ही बने। कांग्रेस की जीत सुनिश्चित करने के लिए भाउ साहेब ने पवार के साथ मिलकर एक चाल चली, जिसका जिक्र खुद पवार अपनी आत्मकथा में करते हैं।

पवार लिखते हैं, “चुनाव की पूर्व बेला पर भाऊसाहेब ने मुझको बगैर यह बताए कि हम कहां जा रहे हैं, मुझे कार में बैठने को कहा। इसके बाद हम लोगों ने संयुक्त महाराष्ट्र समिति (एसएमएस) के एक सभासद को अपनी कार में बिठाया और पुणे से 40 किलोमीटर दूर एक डाक बंगले में पहुँच गए। कुछ समय बाद वह सभासद व्याकुल हो उठा और पुणे वापस जाने की बात करने लगा।

हालांकि भाऊ साहेब ने उसके बहानों पर ध्यान नहीं दिया और उसको वार्तालाप में उलझाए रखा। उस अंधेरे बंगले के बाहर मुझे सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई। मैं मुस्तैदी से चौकीदार की भूमिका निभाता रहा। दूसरे दिन सुबह जब पीएमसी में वोटिंग होनी थी तब हम एसएमएस के उस सभासद के साथ पुणे वापस आ गए। उसकी पार्टी एक वोट से चुनाव हार गई।”

अखबार में छप गई अपहरण की खबर

स्थानीय अखबारों ने एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और उसके सहयोगियों द्वारा सभासद को ‘अगवा’ करने की कहानी छापी। अखबारों ने छापा कि इसी कारण एसएमएस की हार हो गई। अखबार की यह खबर पढ़कर शरद पवार बहुत डर गए। वह भागे-भागे भाऊ साहेब के पास पहुंचे। उन्होंने भाऊ साहेब से कहा, “हम लोगों को अब क्या करना चाहिए? यदि कल अखबारों में मेरा नाम छपा, तो कॉलेज मुझे निश्चित रूप से सस्पेंड कर देगा और मुझे घर से भी निकाल दिया जाएगा?”

पवार की घबराहट पर ध्यान दिए बिना भाऊ साहेब ने स्पष्ट और शांत भाव से कहा, ‘तुम किस बारे में बात कर रहे हो? मैं कुछ नहीं समझ पा रहा हूं कि तुम क्या कह रहे हो?” भाऊ साहेब की यह बात सुनकर पवार के और भी पसीने छूटने लगे। उन्होंने अपनी बात को दोहराते हुए कहा, “सभी अखबारों ने सभासद के ‘अगवा’ करने की कहानी छापी है। यदि उन्होंने यह सब भी छाप दिया कि हम सब आपकी कार में गए थे…”

पवार अपनी बात पूरी कहते उससे पहले ही भाऊ साहेब ने आश्चर्य भरी भाव भंगिमा से कहा, “इधर आओ! तुम क्या कह रहे हो? मैं तो पिछले तीन दिन से अपने घर से बाहर ही नहीं निकला हूं। मैंने अपने घर से बाहर कदम भी नहीं रखा।” भाऊ साहेब ने पवार को घर वापस जाने को कहा। फिर पूरा मामला एक-दो दिन में शांत हो गया।

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