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यूपी में बढ़ा बीजेपी का कुनबा लेकिन सामने आएंगी ये समस्याएं, पार पाना आसान नहीं

बीजेपी उत्तर प्रदेश में गठबंधन के नजरिए से मजबूत तो हो गई है लेकिन सीट बंटवारा उसके लिए चुनौती बन सकता है। ओपी राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के एनडीए में शामिल होने के बाद भाजपा को अब उत्तर प्रदेश में तीन सहयोगियों के साथ सीटों पर मंथन करना होगा। इससे पार्टी को सीट-बंटवारे की व्यवस्था तय करने में चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।

2019 में बीजेपी के साथ थे दो सहयोगी

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी थे। हालांकि निषाद पार्टी के उम्मीदवार प्रवीण कुमार निषाद ने भाजपा के चिन्ह पर चुनाव लड़ा था। इस बार राज्य के कैबिनेट मंत्री संजय निषाद के नेतृत्व वाली पार्टी ने भाजपा नेतृत्व से अपने सिंबल पर चुनाव लड़ने की इच्छा व्यक्त की है। पिछले हफ्ते द इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में संजय निषाद ने कहा था कि वह चाहते हैं कि उनकी पार्टी का चुनाव चिन्ह लोकसभा तक पहुंचे। हालांकि संजय निषाद ने कहा कि सीट-बंटवारा कोई मुद्दा नहीं है और भाजपा उनकी पार्टी की ताकत के अनुसार सीटें आवंटित करेगी।

बाद में संजय निषाद ने एक ट्वीट में कहा कि उनकी पार्टी अपने चुनाव चिन्ह पर 37 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार है। उन्होंने कहा कि भाजपा को हमें वे सभी सीटें देनी चाहिए जहां वो 2019 के लोकसभा चुनाव में हार गई थी। हम ये सीटें जीतेंगे। 2019 में बीजेपी यूपी की 16 सीटों पर हारी थी।

एसबीएसपी ने भाजपा के साथ गठबंधन में 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा और चार सीटों पर जीत हासिल की थी लेकिन ‘सामाजिक न्याय’ के कारण 2019 के चुनावों से पहले गठबंधन छोड़ दिया। सूत्रों के मुताबिक ओपी राजभर के बेटे को लोकसभा टिकट नहीं देने का बीजेपी का फैसला ही गठबंधन तोड़ने का कारण था।

राजभर फिर से बीजेपी के साथ

सूत्रों ने कहा कि राजभर इस बार पूर्वी यूपी में कम से कम दो लोकसभा सीटों की मांग के साथ एनडीए में लौट आए हैं। लेकिन बीजेपी अब तक सिर्फ एक सीट देने पर राजी हुई है बीजेपी ने कहा है कि वह एसबीएसपी को गाज़ीपुर या घोसी सीट दे सकती है। पिछले साल के विधानसभा चुनावों में उनकी पार्टी को छह सीटें मिलने के बाद राजभर की ताकत बढ़ गई।

अपना दल (एस) और भाजपा अब तक चार चुनाव साथ मिलकर लड़ चुकी हैं। 2014 और 2019 दोनों लोकसभा चुनावों में अपना दल (एस) ने दो सीटों पर चुनाव लड़ा और दोनों पर जीत हासिल की। पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी 12 सीटें जीतकर विधानसभा में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी।उपचुनाव जीतने के बाद अपना दल (एस) को राज्य पार्टी का दर्जा मिला और विधानसभा में पार्टी के विधायकों की संख्या 13 है।

अपना दल (एस) के एक नेता ने इंडियन एक्सप्रेस से कहा, “अपना दल (एस) ने कई चुनावों में भाजपा के साथ गठबंधन बनाए रखा और पिछले 10 वर्षों में अपनी ताकत बढ़ाई और संगठन का विस्तार किया। हमारे कार्यकर्ता चाहते हैं कि पार्टी संसद में ताकत बढ़ाने के लिए अधिक सीटों पर चुनाव लड़े। हमें 2024 में अधिक सीटें मिलने की उम्मीद है।”

अपना दल (एस) को भी है ये उम्मीद

अपना दल (एस) के कार्यकारी अध्यक्ष और यूपी के कैबिनेट मंत्री आशीष पटेल ने कहा, ”हमारी पार्टी सीट बंटवारे को लेकर कभी भी सौदेबाजी नहीं करती है। हम सामाजिक न्याय से जुड़े अपने मुद्दों के आधार पर अपने बड़े साथी भाजपा के साथ चुनाव लड़ते हैं। सीट-बंटवारा हमारे लिए कोई मुद्दा नहीं है और हम इसे चर्चा से सुलझा लेंगे।”

वहीं दिल्ली में एक भाजपा नेता ने कहा, “भाजपा अपने कुछ मौजूदा सांसदों को टिकट देने से इनकार कर सकती है जो सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रहे हैं। भाजपा पर दिल्ली में सत्ता बरकरार रखने के लिए यूपी में अधिकतम सीटें जीतने के लिए सहयोगियों को एडजस्ट करने का दबाव है।”

इस मुद्दे पर बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा, ”गठबंधन में कोई चुनौती नहीं है। भाजपा सभी को साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। निश्चित रूप से जब साझेदारों की संख्या बढ़ती है तो व्यक्ति को एडजस्ट करना पड़ता है। आंशिक नुकसान संभव है लेकिन गठबंधन के फायदे बड़े हैं।”

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