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निकम्मा, नकारा…’ तीखी बयानबाजी से गहलोत-पायलट में बढ़ी थी कलह, क्या कर्नाटक के नतीजों ने दिखाई सुलह की राह?

सवाल ये उठता है कि क्या इतने साल पुरानी अदावत एक चार घंटे की बैठक के बाद खत्म हो सकती है? इसका जवाब तभी मिल सकता है, जब इस अदावत की जड़ को ठीक तरह से समझा जाए।

राजस्थान की राजनीति में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट की अदावत कई साल पुरानी हो गई है। शुरुआत 2018 से पहले हुई थी, लेकिन जोर उसने अब और ज्यादा पकड़ लिया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने दोनों नेताओं के साथ चार घंटे की अहम बैठक की है, नतीजा क्या रहा, अभी तक स्पष्ट नहीं, लेकिन पार्टी ने कहा है कि साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सहमति जताई गई है।

कैसे शुरू हुई पायलट-गहलोत तकरार?

सवाल ये उठता है कि क्या इतने साल पुरानी अदावत एक चार घंटे की बैठक के बाद खत्म हो सकती है? इसका जवाब तभी मिल सकता है, जब इस अदावत की जड़ को ठीक तरह से समझा जाए। 2018 से पहले सचिन पायलट राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष थे, वे दावा करते हैं कि उन्हीं की अगुवाई में वो चुनाव लड़ा गया था। उस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी। सचिन पायलट चाहते थे कि जीत का सेहरा उनके सिर बांधा जाए, उनकी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा प्रबल थी।

कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी थी, एक तरफ दो बार के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत थे, तो दूसरी तरफ युवा तेज तरार नेता सचिन पायलट। पार्टी गहलोत में अपना वर्तमान देख रही थी और पायलट में अपना भविष्य, ऐसे में उसी सिद्धांत पर आगे बढ़ते हुए फैसला लिया गया। अशोक गहलोत को तीसरी बार राज्य का मुख्यमंत्री बना दिया गया। सचिन पायलट को डिप्टी सीएम का पद दिया गया और प्रदेश अध्यक्ष भी उन्हीं को रहने दिया।

साल 2020 में हुआ सबसे बड़ा खेल

अब सचिन पायलट को एक शिकायत रही वे डिप्टी सीएम तो बन गए लेकिन अधिकारियों पर उनका कोई कंट्रोल नहीं। वे अपने पसंद के किसी अधिकारी को नियुक्त भी नहीं कर पा रहे थे। इस सब के ऊपर 2020 में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने उनकी चुनी हुई सरकार को गिराने की कोशिश की। असल में पुलिस ने बीजेपी के दो नेताओं को गिरफ्तार किया था। उन दोनों की एक AUDIO टेप सामने आई जिसमें कहा गया- डिप्टी सीएम ही सीएम बनना चाहता है।

गहलोत का एक फैसला और बगावत पर उतरे पायलट

उस समय डिप्टी सीएम के पद पर सचिन पायलट थे, ऐसे में पुलिस का एक नोटिस उनको भी गया। अब सीएम अशोक गहलोत ने तो उस समय इस नोटिस को ज्यादा तवज्जो नहीं दी, लेकिन सचिन पायलट और उनके समर्थकों ने इसे निजी वार माना। अब मुद्दा तो अलग था, लेकिन पायलट ने सीधे अशोक गहलोत के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया। उनकी तरफ से दावा किया गया कि उनके संपर्क में 30 विधायक हैं, संदेश देने का प्रयास हुआ कि सीएम गहलोत की सरकार अल्पमत में आ गई है। अब दावे तो बदलते रहे, लेकिन एक वक्त पायलट 18 विधायकों के साथ एक महीने तक गुरुग्राम के एक होटल में रहे।

पायलट को कैसे मनाया, तल्खी कम क्यों नहीं हुई?

उस समय सचिन पायलट को मनाने की कोशिश राहुल से लेकर प्रियंका गांधी तक ने की। एक तीन सदस्यों की कमेटी का गठन भी हुआ, आश्वासन दिया गया कि उनकी मांगों पर विचार किया जाएगा। एक लंबे सियासी ड्रामे के बाद पायलट मान तो गए लेकिन उन्हें दो बड़े पद गंवाने पड़ गए- एक डिप्टी सीएम का और दूसरा प्रदेश अध्यक्ष का। इसके ऊपर सीएम अशोक गहलोत का तब एक बयान भी काफी चर्चा में रहा। उन्होंने सचिन पायलट को लेकर कह दिया था कि मुझे पहले से पता था वो निकम्मा, नकारा था, पहले भी शिकायतें आती थीं। इस बयान की वजह से समझौता होने के बावजूद एक तल्खी दोनों नेताओं के बीच बनी रही।

अब वर्तमान में सचिन पायलट ने अपनी संघर्ष यात्रा निकाली, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सबसे ज्यादा फोकस रहा, एक बयान में यहां तक कह गए कि अशोक गहलोत की नेता सोनिया गांधी नहीं वसुंधरा राजे हैं। ऐसे में इस तल्खी के बीच गहलोत और पायलट के साथ मल्लिकार्जुन खड़गे की बैठक हुई। समझौता होने और हाईकमान पर फैसला छोड़ने की बात सामने आई, लेकिन किस फॉर्मूले के तहत ये किया जाएगा, इस पर स्पष्टता की कमी रही।

कर्नाटक जीत दिखा रही एक बड़ी राह

अब यहीं पर कर्नाटक की स्थिति समझना जरूरी हो जाता है। कर्नाटक में इस बार कांग्रेस ने प्रंचड जीत दर्ज की, ऐसे समय में ये जीत मिली जब राज्य में पार्टी के अंदर ही दो गुट सक्रिय चल रहे थे, जैसे राजस्थान में इस समय हालात हैं। एक धड़ा सिद्धारमैया का रहा तो दूसरा डीके शिवकुमार का। लेकिन खड़गे ने अपने अनुभव का इस्तेमाल कर बात बिगड़ने से पहले दोनों नेताओं से बात की और फिर साथ मिलकर चुनाव लड़ा। नतीजा सभी के सामने रहा, कांग्रेस ने राज्य में अपनी दूसरी सबसे बड़ी जीत दर्ज कर डाली।

खड़गे बन सकते हैं फिर किंग

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि मल्लिकार्जुन खड़गे अपने निजी अनुभवों से ऊपर उठकर पार्टी के लिए फैसले लेते हैं। सिद्धारमैया के साथ खड़गे के रिश्तों को लेकर विवाद रहा है। बताया जाता है कि 2013 में मल्लिकार्जुन खड़गे भी मुख्यमंत्री बन सकते थे, लेकिन उन्हें सिद्धारमैया के हाथों हार झेलनी पड़ गई थी। इसके बाद खड़गे को कर्नाटक से बाहर केंद्र की राजनीति में भेज देने का श्रेय भी कुछ हद तक सिद्धारमैया को ही जाता है। ऐसे में दोनों के रिश्तों को लेकर विवाद है, लेकिन चुनाव के समय इसकी कोई झलक नहीं दिखी और कई मौकों पर खड़गे ने खुद आगे से आकर बात की और मार्गदर्शन भी किया।

भविष्य या अनुभव, चुनाव करना है मुश्किल

अब मल्लिकार्जुन खड़गे को राजस्थान में भी अपने उसी अनुभव का इस्तेमाल करना है। इस समय कहने को राहुल गांधी ही कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा माने जा रहे हैं, लेकिन पार्टी में जो बड़े निर्णय हो रहे हैं, जिस तरह से चुनौतियों से निपटा जा रहा है, उसमें खड़गे ही किंग की भूमिका निभा रहे हैं। इसी वजह से राजस्थान में गहलोत और पायलट को मनाने का मिशन भी उन्हीं के जिम्मे आया है। राहुल गांधी भी बात जरूर कर रहे हैं, लेकिन ज्यादा सक्रियता कांग्रेस अध्यक्ष की मानी जा रही है। चुनाव इस बात का होना है कि कांग्रेस आगामी मुकाबले में भविष्य यानी कि सचिन पायलट पर दांव चलती है या फिर अनुभव यानी कि अशोक गहलोत पर फिर भरोसा जताती है।

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