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दूसरे दलों के साथ आने से BJP खुश लेकिन कैडर चिंतित! बाहरी नेताओं को दी जा रही अहमियत बड़ी वजह

Lok Sabha Election 2024: लोकसभा चुनाव को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी अपना कुनबा बढ़ाने में लगी है। भाजपा नेतृत्व का यहां तक मानना है कि उसने महाराष्ट्र राज्य में शिवसेना को विभाजित करके एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। इतना ही नहीं इसके एक साल बाद उसने अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के नेताओं को लुभाकर निकट भविष्य के लिए महाराष्ट्र में राजनीतिक और चुनावी परिदृश्य बदल दिया है। साथ बिहार, उत्तर प्रदेश, पंजाब और आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में क्षेत्रीय दलों या कई मामलों में उनके नेताओं को शामिल करके अपनी कोशिशों को तेज कर दिया है।

राष्ट्रीय नेतृत्व के राजनीतिक पैंतरेबाज़ी के पीछे के लोगों का मानना है कि ऐसे कदम तब आवश्यक होते हैं जब कोई पार्टी अपने गढ़ में खुद को ठगा हुआ महसूस करती है या जब उसे उन क्षेत्रों में विस्तार करना मुश्किल लगता है, जो लंबे समय से उसकी पहुंच से बाहर हैं। पार्टी के एक नेता कहते हैं, ‘आज बीजेपी ने वो मुकाम हासिल कर लिया है, जिसके बारे में कोई दूसरी पार्टी सपने में भी नहीं सोच सकती थी, लेकिन देश के कई हिस्सों में हमारी कमजोरियां हैं और जब तक हम वहां अपना मूल आधार विकसित नहीं कर लेते, तब तक हमें दूसरी पार्टियों के नेताओं की ओर रुख करना होगा।’

नेता भाजपा के वैचारिक अभिभावक आरएसएस का उदाहरण देते हैं, जिसने अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए हमेशा हिंदुत्व पंथ से परे नायकों पर अपनी नजर रखी है। वह असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा जैसे लोगों का उदाहरण देते हैं। वो कहते हैं कि हिमंता 2015 में कांग्रेस से पार्टी में शामिल हुए थे, तब से पूर्वोत्तर में भाजपा के विकास वो मुख्य किरदार की भूमिका में रहे हैं।

बृजेश पाठक, जितिन प्रसाद समेत कई ऐसे नाम जिनको पार्टी ने अहमियत दी

इसी तरह बृजेश पाठक (जो बसपा से आए थे) और जितिन प्रसाद (पूर्व में कांग्रेस के) उत्तर प्रदेश में भाजपा के ब्राह्मण चेहरे हैं। बृजेश पाठक भी पसमांदा मुसलमानों को लुभाने के भाजपा के मिशन में शामिल हैं। तेलंगाना में पूर्व बीआरएस नेता ईटेला राजेंदर को अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में राज्य में भाजपा की महत्वाकांक्षाओं में मदद करने की उम्मीद है।

हालांकि, इन सबके बावजूद भाजपा में हर कोई खुश नहीं है, खासकर दूसरे दर्जे के वो नेता जो लंबे समय से इंतजार कर रहे थे, जिन्हें अचानक अपनी स्थिति अनिश्चित लगने लगी है। कई लोग अपने वैचारिक आधार पर क्रॉसओवर को उचित ठहराने को लेकर भी असहज हैं।

कई लोग निजी तौर पर सवाल पूछते हैं कि बीजेपी सरकार में जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया था या जिन पर अन्य केस हैं, अब ऐसे लोग भाजपा में शामिल हो गए हैं या एनडीए का हिस्सा हो गए हैं। यह कहां तक उचित है। क्या इसको लेकर भाजपा क्या सोचती हैं।

ये नेता यह समझाने में कठिनाई के बारे में भी बात करते हैं कि भाजपा की अपनी सरकारें अब तेजी से कल्याणकारी एजेंडा क्यों पेश कर रही हैं, जबकि पार्टी विपक्ष की “रेवड़ी” संस्कृति को अपना रही है। पार्टी के एक नेता यहां तक कहते हैं, ‘जैसे-जैसे हम पार्टी के सिद्धांतों को कमजोर कर रहे हैं, बीजेपी के लिए अलग खड़ा होना मुश्किल होता जा रहा है।’

‘भाजपा अब मतभेदों वाली पार्टी’

एक जिला नेता, जो लंबे समय से भाजपा के साथ रहे हैं। उन्होंने द इंडियन एक्सप्रेस को बताया, ‘यह अब एक अलग पार्टी नहीं है। भाजपा अब मतभेदों वाली पार्टी है। एक अन्य स्थानीय नेता ने देवेन्द्र फडणवीस के बारे में बात की। वो कहते हैं कि जिन्होंने वर्षों तक पार्टी के लिए कड़ी मेहनत की थी उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटने के लिए कहा गया था, ताकि भाजपा की नई सहयोगी शिंदे सेना को यह पद सौंपा जा सके। वो यहां तक कहते हैं कि हम कड़ी मेहनत कर रहे हैं, कई बार हमने पार्टी के लिए काम करने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च किया है। जाहिर है हम पार्टी में अवसरों की उम्मीद करते हैं, लेकिन अगर पार्टी में अवसर इसी तरह बांटे जाएंगे तो हमें मौका कहां मिलेगा?

निराशा शायद अधिक तीव्र है, क्योंकि वर्तमान भाजपा सरकार ने 2014 में सत्ता में आने के शुरुआती वर्षों में संगठन के निर्माण पर नए सदस्यों और संसाधनों पर बहुत अधिक ध्यान केंद्रित किया। पूर्व पत्रकार और वर्तमान में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प्रेस सचिव अजय सिंह अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि कांग्रेस ने अपने विशाल संगठनात्मक नेटवर्क को कमजोर कर दिया है, लेकिन इसके विपरीत मोदी सरकार संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। क्योंकि मोदी अपने पीछे एक मजबूत संगठनात्मक ढांचा छोड़ना चाहते हैं।

हालांकि, अब अन्य लोगों को फिर से सत्ता में आने का सामना करना पड़ रहा है, उनके लिए सवाल यह है कि पार्टी अपनी सरकारों में संगठन के लोगों को समायोजित क्यों नहीं कर पाई है। मध्य प्रदेश में एक युवा पार्टी नेता ने पूछा, ‘केंद्र सरकार में कितने शीर्ष मंत्री रैंक के माध्यम से आए हैं? ऐसा क्यों है कि जो लोग रैंक में आते हैं उन्हें हमेशा किनारे कर दिया जाता है? चाहे वह उत्तर प्रदेश में हों या मध्य प्रदेश।

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