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टाटा के हाथों एयर इंडिया के बिकने से बढ़ जाएगा हवाई अड्डों का राजस्व, जानें कारण

टाटा समूह के हाथों एयर इंडिया के जाने से देश में हवाईअड्डों का राजस्व बेहतर होने की उम्मीद है। अब न सिर्फ हवाईअड्डों को भुगतान समय पर मिलेगा, बल्कि स्लॉट का भी बेहतर इस्तेमाल होने की उम्मीद है।

सरकारी विमानन कंपनी एयर इंडिया (Air India) को नीलामी में टाटा समूह (Tata Group) के द्वारा खरीदे जाने के बाद एयरलाइन सेक्टर (Airline Sector) में आने वाले बदलाव को लेकर लगातार चर्चा चल रही है। एयरलाइन इंडस्ट्री के विशेषज्ञों की राय है कि इस डील से देश में हवाईअड्डों का राजस्व (Airport Revenue) बढ़ सकता है।

स्लॉट का होगा बेहतर इस्तेमाल

टाटा समूह के पास पहले से ही दो एयरलाइन हैं। एयर इंडिया के अधिग्रहण के बाद अब टाटा समूह के पास दो फुल सर्विस एयरलाइन ‘एयर इंडिया और विस्तारा (Vistara)’ हो जाएंगे। इनके अलावा दो बजट एयरलाइन ‘एयर एशिया इंडिया (Air Asia India) और एआई एक्सप्रेस (AI Express)’ भी टाटा समूह के हिस्से में रहेंगे। समूह के पास चार एयरलाइन सर्विस होने से विशेषज्ञों को स्लॉट के बेहतर इस्तेमाल और फास्टर टर्नअराउंड की उम्मीद है। इससे निश्चित तौर पर हवाईअड्डों को फायदा होगा। हवाईअड्डे अधिक फ्लाइट हैंडल कर सकेंगे, जिससे उनका राजस्व बढ़ेगा।

शुल्क के भुगतान में देरी होगी दूर

अभी तक एयर इंडिया के घाटे में चलने से कंपनी की ओर से हवाईअड्डों को शुल्क का भुगतान समय पर नहीं हो पाता था। अब चूंकि टाटा समूह ने एयर इंडिया का अधिग्रहण कर लिया है, इस समस्या के भी दूर हो जाने की उम्मीदें बढ़ी हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि टाटा समूह के संचालन में एयर इंडिया हवाईअड्डों को सारे शुल्क का समय पर भुगतान करेगी, इससे हवाईअड्डे का परिचालन करने वाली कंपनियों का कैश प्लो बेहतर होगा।

ओटीपी में सुधार की उम्मीद

एयरलाइन सेक्टर में एक अहम फैक्टर ओटीपी (On Time Performance) की बात करें तो इसमें भी सुधार की उम्मीद है। सितंबर महीने के आंकड़ों के अनुसार, एयर इंडिया छह घरेलू एयरलाइन में ओटीपी के मामले में सबसे नीचे है। सितंबर में जहां इंडिगो (Indigo) 95.5 प्रतिशत ओटीपी के साथ पहले पायदान पर थी, वहीं एयर इंडिया 87.1 प्रतिशत के साथ निचले पायदान पर थी। टाटा के हाथों परिचालन आने से विशेषज्ञों को उम्मीद है कि ओटीपी फैक्टर में एयर इंडिया का प्रदर्शन सुधरेगा।

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फ्लाइट डिले होने से होते हैं ये नुकसान

ऑन टाइम परफॉर्मेंस बेहतर होने से हवाईअड्डे स्लॉट का बेहतर इस्तेमाल कर पाते हैं। यदि एक फ्लाइट में देरी होती है तो इसका असर बाद के फ्लाइट पर भी पड़ता है। फ्लाइट डिले या कैंसल होने की स्थिति में एयरलाइन के साथ ही एयरपोर्ट ऑपरेटर का भी नुकसान होता है। इस फैक्टर में सुधार से निश्चित तौर पर एयरपोर्ट ऑपरेटर का रेवेन्यू बढ़ेगा।

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