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जैसलमेर में था दुनिया का सबसे पुराना डायनासोर!:मॉर्निंग वॉक करते साइंटिस्ट को मिले सबूत, लाखों साल से दबे रहने से अंडे बन गए पत्थर

संडे बिग स्टोरीजैसलमेर में था दुनिया का सबसे पुराना डायनासोर!:मॉर्निंग वॉक करते साइंटिस्ट को मिले सबूत, लाखों साल से दबे रहने से अंडे बन गए पत्थर

जयपुर3 घंटे पहलेलेखक: रणवीर चौधरी

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जैसलमेर शहर में जेठवाई की पहाड़ी। कभी लोग यहां से पत्थर निकालकर मकान बनाते थे। लेकिन जब लोगों को ये पता लगा कि यहां डायनासोर के अवशेष (फॉसिल) मिलते हैं तो हर कोई चौंक गया।

एक महीने पहले ही वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि दुनिया का सबसे पुराना डायनासोर जैसलमेर में ही रहता था। इस डायनासोर काे ‘थार का डायनासोर’ नाम दिया गया है।

कुछ हफ्ते पहले एक साइंटिस्ट मॉर्निंग वॉक पर अपनी बेटी के साथ आए तो घूमते-घूमते उन्हें डायनासोर का अंडा मिल गया। जहां ये अंडा मिला, उसी जगह डायनासोर की कहानियां बयां करते कई फॉसिल मिल चुके हैं।

आखिर साइंटिस्ट इन पत्थरों में से कैसे ढूंढते हैं कि यहां डायनासोर थे। यही जानने के लिए भास्कर टीम साइंटिस्ट के साथ जेठवाई की पहाड़ी पर पहुंची….

थारोसोरस डायनासोर करीब 40 फीट लंबे होते थे। इनकी गर्दन लंबी और सिर पर ठोस नोक होती थी।

थारोसोरस डायनासोर करीब 40 फीट लंबे होते थे। इनकी गर्दन लंबी और सिर पर ठोस नोक होती थी।

तीन जगहों को कहते हैं डायनासोर का गांव

जैसलमेर शहर में जेठवाई की पहाड़ी, यहां से 16 किलोमीटर दूर थईयात और लाठी को डायनासोर के गांव ही कहा जाता है। इसकी वजह है कि इन जगहों पर ही डायनासोर होने के प्रमाण मिलते हैं।

जेठवाई पहाड़ी पर पहले माइनिंग होती थी। लोग घर बनाने के लिए यहां से पत्थर लेकर जाते थे। ऐसे ही थईयात और लाठी गांव में सेंड स्टोन के माइनिंग एरिया में डायनासोर के फॉसिल मिलते हैं। तीनों गांवों में ही माइनिंग से काफी सारे अवशेष तो नष्ट हो गए थे।

जब यहां डायनासोर के फॉसिल मिलने लगे तो गवर्नमेंट ने माइनिंग का काम रुकवा दिया। अब तीनों जगहों को संरक्षित कर दिया गया है।

साइंटिस्ट को मिले डायनासोर युग के अंडे

जैसलमेर के भू-जल वैज्ञानिक नारायण दास इनखिया का घर जेठवाई पहाड़ी के पास ही है। उन्होंने बताया कि वे हर दिन सुबह के समय भीमकुंज की इन पहाड़ियों में अपनी बेटी के साथ मॉर्निंग वॉक पर आते हैं। उन्होंने बताया कि मैं करीब 17 दिन पहले संडे को अपनी बेटी के साथ यहां मॉर्निंग वॉक पर आया था। हर बार की तरह मैं अपनी बेटी को बता रहा था कि फॉसिल कैसे ढूंढे जाते हैं।

इसी दौरान मेरी नजर एक पत्थर पर पड़ी। मैंने इस गोल पत्थर से बड़ी सावधानी के साथ मिट्‌टी हटाकर अलग करके निकाला और बेटी को दिखाया। उसने देखते ही कहा यह कितना चमकीला पत्थर है। जब मैंने बताया कि यह पत्थर नहीं आज से लाखों वर्ष पुराने किसी अंडे का फॉसिल है तो वो देखकर चौंक गई।

जैसलमेर में करोड़ों साल पहले समुद्र था। यहीं कारण है कि यहां से निकलने वाले पत्थरों में उस समय के झींगों और कीड़ों की फॉसिल के सबूत मिलते हैं।

जैसलमेर में करोड़ों साल पहले समुद्र था। यहीं कारण है कि यहां से निकलने वाले पत्थरों में उस समय के झींगों और कीड़ों की फॉसिल के सबूत मिलते हैं।

डायनासोर के समय का है अंडा

जिस समय जैसलमेर में डायनासोर हुआ करते थे, यह अंडा उस समय किसी जीव का था। इसका आकार मुर्गी या सामान्य अंडे से काफी बड़ा है। लाखों साल जमीन के नीचे दबने से यह अंडा पत्थर बन गया। अंडा भी आधा टूटा हुआ है। बावजूद इसके अंडे के अंदर पाए जाने वाले पीले हिस्से की झलक आसानी से देख सकते हैं।

डॉ. नारायण दास इनखिया ने बताया कि अब वे खुद इस अंडे के जीवाश्म को लेकर जयपुर जाएंगे। जयपुर स्थित जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की जीवाश्म विज्ञान की लेबोरेटरी में इस अंडे की जांच करवाएंगे। इससे अंडे की उम्र पता चलेगी। यह भी पता लगाया जाएगा कि यह अंडा किसी डायनासोर का था या किसी दूसरे जीव का था।

साइंटिस्ट कैसे खोजते हजारों साल पुराने फॉसिल

मिट्टी और पत्थरों के बीच पहचानना सबसे मुश्किल

लाखों वर्ष पहले जब डायनासोर विलुप्त हुए तो प्राकृतिक कारणों से मिट्टी के नीचे दब गए। डायनासोर ही नहीं ऐसे अन्य प्राणी भी हजारों साल तक मिट्टी के नीचे दबे रहने के बाद जीवाश्म बन जाते हैं। यानी उन जीवों का शरीर पत्थर बन जाता है। रंग भी आस-पास की मिट्टी और पत्थरों जैसा हो जाता है।

उन फॉसिल को जब हम ढूंढते हैं तो दूर से देखने पर यह आस-पास के पत्थरों जैसे लगते हैं। गौर से देखने पर उसकी आकृति से अनुमान लगाया जाता है। फिर बारीकी से अध्ययन करना पड़ता है। फॉसिल की आकृति थोड़ी अलग होती है। जैसे हमें अंडे का फॉसिल मिला तो वो दिखने में को पत्थर जैसा था लेकिन उसकी सतह एकदम अंडे की तरह चिकनी थी। उसकी आकृति और सतह को छूते ही पता लग गया कि यह किसी विलुप्त हो चुके जीव के अंडे का फॉसिल है।

जैसलमेर के भू-जल वैज्ञानिक नारायण दास इनखिया ने भास्कर टीम को बताया कि लाखों साल जमीन में दबे रहने से डायनासोर के अंडे पत्थर बन गए।

जैसलमेर के भू-जल वैज्ञानिक नारायण दास इनखिया ने भास्कर टीम को बताया कि लाखों साल जमीन में दबे रहने से डायनासोर के अंडे पत्थर बन गए।

पत्थरों की परतों की बीच दबे मिलते हैं फॉसिल

फॉसिल दो प्रकार से मिलते हैं। कुछ खुद ही जमीन से बाहर आ जाते हैं। उन्हें बस पहचानना होता है। जैसे आकल वुड फॉसिल पार्क में है। यहां 18 करोड़ साल पहले 30 से 40 फीट लंबे पेड़ हुआ करते थे। यह पेड़ जमीन के नीचे दबने के बाद पत्थर बन गए थे। फिर प्राकृतिक तरीके से जब इनके ऊपर से मिट्टी की परत हटी तो यह बाहर आ गए।

कई सालों तक क्षेत्र में यह ऐसे ही पड़े रहे। लोग इन्हें पत्थर समझते थे। लेकिन साइटिंस्ट ने पहली ही नजर में पता लगा लिया कि यह फॉसिल है। अब करोड़ों साल पुराने पेड़ों के फॉसिल को प्रिर्जव करके यहां रखा गया है।

अब इसे फॉसिल पार्क घोषित कर दिया है। दूसरा तरीका ये है कि मिट्‌टी और पत्थर की परत को हटाकर ढूंढा जाए। इसमें सबसे ज्यादा सावधानी रखनी पड़ती है। पत्थर और मिट्टी हटाते समय फॉसिल के नष्ट होने या टूटने का खतरा सबसे ज्यादा होता है।

इस तकनीक से पता लगाते हैं कितने साल पहले मरा था जीव

फॉसिल कितना पुराना है या उस जीव की मौत कितने वर्ष पहले हुई, इसका पता रेडियो कार्बन डेटिंग तकनीक से लगाया जाता है। धरती पर मौजूद हर जीव में कार्बन-14 जरूर होता है। कार्बन से ही जीवों के उम्र का पता लगाते हैं।

सुर्य के जरिए कार्बन पेड़ों, जीवों में आता है। जब कोई पेड़, इंसान, जानवर मर जाता है तो उसमें कार्बन-14 बनना बंद हो जाता है। कार्बन-14 कब से बनना बंद हो गया, उससे ही जीवों की उम्र का पता लगता है।

इस तकनी से 50 हजार साल पुराने जीव की उम्र का पता लगा सकते हैं। अगर कोई जीव 50 हजार साल से ज्यादा पुराना है तो उसका पता रेडियो कार्बन डेटिंग से पता नहीं किया जा सकता। इसके बाद पोटैशियम आर्गन डेटिंग और यूरेनियम ऑर्गन डेटिंग फामूर्ला इस्तेमाल होता है।

जैसलमेर शहर में स्थित जेठवाई की पहाड़ी जहां डायनासोर के फॉसिल मिले हैं। पहले इस पहाड़ी पर अवैध खनन होता था। फॉसिल मिलने के बाद अवैध खनन रुकवाया गया।

जैसलमेर शहर में स्थित जेठवाई की पहाड़ी जहां डायनासोर के फॉसिल मिले हैं। पहले इस पहाड़ी पर अवैध खनन होता था। फॉसिल मिलने के बाद अवैध खनन रुकवाया गया।

अगस्त में रिसर्च पूरी हुई तो जैसलमेर में मिले सबसे पुराने डायनासोर के सबूत

जैसलमेर शहर हजारों साल पहले डायनासोर का घर हुआ करता था। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) के वैज्ञानिक देबाशीष भट्टाचार्य, कृष्ण कुमार, प्रज्ञा पांडे और त्रिपर्णा घोष ने 2018 में रिसर्च शुरू किया था। रिसर्च के दौरान सबसे पुराने शाकाहारी डायनासोर थारोसोरस के जीवाश्म मिले थे। सबसे ज्यादा डायनासोर की रीढ़, गर्दन, सूंड, पूंछ और पसलियों के जीवाश्म मिले थे।

अगस्त 2023 के पहले सप्ताह में रुड़की रिसर्च सेंटर ने अपनी जांच पूरी की। वैज्ञानिकों ने बताया कि जेठवाई पहाड़ी पर ‘थारोसोरस इंडिकस’ के फॉसिल मिले थे। वो दुनिया का सबसे पुराना डायनासोर था। इस डायनासोर के फॉसिल जैसलमेर में मिलने पर इसे ‘थार का डायनासोर’ नाम दिया गया है। ये जीवाश्म चीन में मिले जीवाश्म से भी पुराना है। जैसलमेर में यह डायनासोर 16.7 करोड़ साल पहले यहां रहते थे।

शाकाहारी थे ये डायनासोर

थारोसोरस इंडिकस या थार का डायनासोर शाकाहारी होते थे। इनकी लंबी गर्दन, रीढ़ लंबी, सिर छोटा और सिर पर ठोस नोक होती थी। वैज्ञानिकों ने इसे डायनासोरों के पुराने परिवार डायक्रेओसोराइड सोरोपॉड्स में रखा है। इस परिवार के डायनासोर की गर्दन लंबी और सिर छोटे होते थे। वे शाकाहारी होते थे। इस डायनासोर के यहां होने का दूसरा सबूत वर्ष 2014 में मिला था। जब जैसलमेर से 16 किलोमीटर दूर थईयात गांव की पहाड़ियों में इसे पंजों के निशान मिले थे।

चीन में मिले जीवाश्म से भी पुराने

थारोसोरस से पहले चीन में मिले डायक्रेओसोराइड के जीवाश्म को सबसे पुराना समझा जाता था। वह 16.6 करोड़ से 16.4 करोड़ साल पुराना था। भारत में हुई ताजा खोज ने चीन के जीवाश्म को 10 से 30 लाख साल पीछे छोड़ दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार इन सभी खोजों को जोड़ कर देखें तो पक्के सबूत मिलते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप डिप्लोडोसॉइड डायनोसोरों की उत्पत्ति और उनके क्रमिक-विकास का केंद्र था।

जैसलमेर में कहां-कहां थे डायनासोर और शार्क मछलियां

1. सोनार का किला : यहीं था टेथिस समुद्र का किनारा

वैज्ञानिक जमीन के नीचे की परते खोलते हैं तो पता लगता है कि यहां करोड़ों साल पहले क्या था। जैसलमेर शहर का फोर्ट और पूरा शहर जहां बसा है, यहां करोड़ों सालों पहले जुरासिक युग का टेथिस सागर का किनारा हुआ करता था। इसी एरिया में बड़ी मात्रा में समुद्री कोरल और मूंगिया पत्थर के जीवाशम मिले हैं।

2. कुलधरा : गहरा समुद्र, जहां रहती थी खूंखार शार्क मछलियां

बैसाखी, कुलधरा, खाबा क्षेत्र में समुद्र का गहरा हिस्सा था। यहां समुद्र 1 हजार मीटर से ज्यादा गहरा था। यहीं कारण है कि यहां समुद्र के तल में मिलने वाले सूक्ष्म जीव और हाईबोडॉन्ट शार्क के जीवाश्म मिले हैं।

3. थईयात और लाठी गांव : यहीं घूमते और उड़ान भरते थे डायनासोर

जैसलमेर से जोधपुर हाइवे रोड़ पर थईयात गांव है। थईयात से लाठी तक का एरिया में डायनासोर सबसे ज्यादा घूमते थे। डायनासोर के सबसे ज्यादा जीवाश्म भी इसी एरिया में मिले हैं। डायनासोर के पैरों के निशान से साबित होता है कि इन क्षेत्रों में डायनासोर की सबसे ज्यादा आवाजाही थी।

आकल वुड फॉसिल पार्क में संजोकर रखे गए 40 फीट लंबे पेड़ों के जीवाश्म इस बात का प्रमाण है कि यहां के घने जंगलों में डायनासोर का खूब विकास हुआ।

आकल वुड फॉसिल पार्क में संजोकर रखे गए 40 फीट लंबे पेड़ों के जीवाश्म इस बात का प्रमाण है कि यहां के घने जंगलों में डायनासोर का खूब विकास हुआ।

4. आकल : यहां घने जंगलों में थे 40 फीट लंबे पेड़

जैसलमेर शहर से आकल की तरफ घना जंगल हुआ करता था। यहां 30 से 40 फीट लंबे पेड़ होते थे।घने जंगल के कारण ही यहां डायनासोर का इतना विकास हुआ था।

5. सुल्ताना : यहां गहरे समुद्र में तैरती थी शार्क

हाईबोडॉन्ट शार्क के एशिया में सिर्फ तीन जीवाश्म मिले है। इनमें जापान, थाईलैंड और तीसरा जैसलमेर में मिला है। जैसलमेर में इसके जीवाश्म मिलने के बाद इसका नाम स्ट्रोफोडस जैसलमेरेंसिस रखा गया। जैसलमेर में जहां टेथिस सागर का किनारा था, वहां से 20 किलोमीटर आगे हाईबोडॉन्ट शार्क सबसे गहरे पानी में पाई जाती थी। यह शार्क 6.5 करोड़ वर्ष पहले विलुप्त हो गई थी। इसके फॉसिल जैसलमेर से 50 किमी दूर सुल्ताना गांव में मिले थे। वर्ष 2017 के नवंबर और दिसंबर महीने में मोकल-सुल्ताना रोड के किनारे दो शार्क के दांत मिले थे। दांत छोटा (चौड़ाई: 6.4 मिमी, ऊंचाई: 3.1 मिमी) के आकार का था।

6. बांदा : यहां व्हेल तैरती थी

भूगर्भीय वैज्ञानिक कृष्ण कुमार की टीम को जैसलमेर के बांदा गांव में व्हेल का एक खंडित जबड़ा और रीढ़ की हड्‌डी के जीवाश्म मिले थे। यह व्हेल 4.7 करोड़ साल पहले जैसलमेर के समुद्र में रहती थी। वहीं इस दौरान एक मगरमच्छ के दांत भी मिले थे। इसके साथ ही कछुए की हड्डियां मिली। ऐसे कई समुद्री जीवों के जीवाश्म यहां मिले थे।

स्टडी में पता चला कि इस तरह के डायनासोर एक से तीन मीटर ऊंचे और पांच से सात मीटर चौड़े होते थे। इस डायनासोर के जीवाश्म इससे पहले फ्रांस, पोलैंड, स्लोवाकिया, इटली, स्पेन, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में मिले हैं।

स्टडी में पता चला कि इस तरह के डायनासोर एक से तीन मीटर ऊंचे और पांच से सात मीटर चौड़े होते थे। इस डायनासोर के जीवाश्म इससे पहले फ्रांस, पोलैंड, स्लोवाकिया, इटली, स्पेन, स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में मिले हैं।

जैसलमेर में कब-क्या खोज हुई

डायनासोर युग को साइंटिस्ट मेसोजोइक युग कहकर बुलाते हैं। जैसलमेर में इस युग में पाए जाने वाले 40 फीट लंबे पौधों के जीवाश्म की खोज सबसे पहले वर्ष 1826 में हुई थी। इसके बाद वर्ष 1861 और 1877 में रिसर्च पेपर प्रकाशित हुए तो पूरी दुनिया के साइंटिस्ट की नजर जैसलमेर पर पड़ी। कई वैज्ञानिकों का यहां पहुंचना शुरू हो गया। यहां जुरासिक युग की चट्टानों की संरचना सबसे पहले ओल्डहैम ने 1886 और 1902 में ला टौचे ने खोजी थी।

  • ओल्डहैम ने सबसे पहले जैसलमेर बेसिन के मेसोजोइक चट्टानों का मैप बनाया था। उन्होंने लाठी, जैसलमेर, भादासर की चट्टानों के बारे में जानकारी दी थी।
  • 1953 से 1954 में साहनी और भटनागर, टेलर ने जैसलमेर किले के उत्तर दिशा में 1.5 किमी और भादासर से लगभग 1 किमी पश्चिम में भादासर में कई जुरासिक जीवाश्म इकट्ठे किए।
  • 1963 में रिक्टर-बर्नबर्ग और शॉट ने जैसलमेर बेसिन के जुरासिक संरचनाओं का बायोस्ट्रेटिग्राफिक विवरण देने वाले पहले व्यक्ति थे।
  • वर्ष 1989 में कालिया और रॉय ने जैसलमेर बेसिन के जुरासिक से चूनेदार नैनोप्लांकटन रिकॉर्ड करने वाले पहले व्यक्ति थे।
  • राय और गर्ग (2007) ने कुलधारा खंड से अर्ली कैलोवियन नैनोफॉसिल्स को भी दर्ज किया। अल्बियन युग के नैनोफॉसिल्स की 55 प्रजातियां मिली।
2014 में इंटरनेशनल ग्रुप ऑफ साइंटिस्ट के 20 वैज्ञानिकों ने गांव की पहाड़ियों पर डायनासोर के पंजे के निशान खोजे थे।

2014 में इंटरनेशनल ग्रुप ऑफ साइंटिस्ट के 20 वैज्ञानिकों ने गांव की पहाड़ियों पर डायनासोर के पंजे के निशान खोजे थे।

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