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जीवन जीने का नजरिया

जिंदगी में सब कुछ उजला नहीं होता। कुछ कालिमा भी होती है। कुछ धुंधलका भी होता है।

पल्लवी विनोद

दुकान में एक महिला स्वर उभरा- ‘भैया मुझे काली साड़ी दिखाइए।’ फिर काली साड़ी उसके सामने थी, लेकिन उसकी नजर बार-बार अगल-बगल दिखाई जाने वाली साड़ियों पर ठहर जाती। ऐसा सिर्फ साड़ियों की खरीदारी में नहीं होता। मकान हो, गाड़ी या घर के अन्य सामान, दूसरों की चीज आपको ज्यादा पसंद आती है। आपकी नजर इधर-उधर घूमती रहती है। यह मानव स्वभाव की कमजोरी है। या तो उसे दूसरों की चीजें पसंद आएंगी या अपने अतिरिक्त कुछ और अच्छा ही नहीं लगेगा। ठीक यही हाल हमारे रिश्तों का भी है।

आप सामने की बालकनी में दिखने वाले परिवार को एक आदर्श परिवार मान लेते हैं और अपने परिवार में कमी ही कमी दिखने लगती है। जबसे सोशल मीडिया ने बालकनी का रूप लिया है, स्थितियां और दुरूह हो गई हैं। कल किसी ने अपने पति के साथ भोजन करते हुए फोटो डाली, तबसे आपका मन खराब है। अमुक की पत्नी ने अपनी कमाई से उसे हीरा जड़ित अंगूठी उपहार में दी, और एक आपकी पत्नी है, उसे कुछ आता ही नहीं। भले शादी करते समय आपकी प्राथमिकता सूची में लिखे गुणों से वह बिल्कुल मेल खाती हो, लेकिन अब वह आपके मित्र या भाई की पत्नी जैसी नहीं है, तो आप घुटन महसूस करने लगते हैं।

जिंदगी में सब कुछ उजला नहीं होता। कुछ कालिमा भी होती है। कुछ धुंधलका भी होता है। आप किसी दिन के एक हिस्से से यह नहीं जांच सकते कि अमुक दिन बहुत अच्छा ही बीता हो। न ही किसी के व्यक्तित्व के एक कमजोर पक्ष से उसकी मजबूती पर सवाल खड़ा कर सकते हैं। लेकिन हमें इसे सुंदर बनाने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए। अपने दिमाग और दिल को संतुलित करने वाला इंसान छोटी-बड़ी परेशानियों से आराम से बाहर निकल आता है। मान लीजिए हम लोहे के सामान हैं, तो हमें बार-बार अध्यात्म रूपी पालिश की जरूरत है। अगर शीशा हैं, तो उस पर पड़ने वाली धूल को भी अध्यात्म रूपी सफाई की जरूरत है।

अक्सर हम अध्यात्म का मतलब दैनिक पूजा या कर्मकांड समझ लेते हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। अध्यात्म वह पद्धति है, जिसके अनुसरण से हम अपनी आत्मा पर लगे जाले दूर कर उसे परमात्मा से मिलने के लिए तैयार करते हैं। अध्यात्म हमारे अंदर जीवन जीने का सही नजरिया पैदा करता है। मृत्यु नामक घटना घटने से पहले ही हमें इसके लिए तैयार करता है।

असल में हमने अपने आसपास एक मिथ्या जगत रच रखा है। हम सामने वाले की अनुशंसा पाने के लिए इस तरह व्याकुल हैं कि खुद की संस्तुति का खयाल ही नहीं रह जाता। हम अक्सर कहते या सुनते हैं, मैंने फलां के लिए यह किया, वह किया, लेकिन उसने मेरे कार्य की सराहना नहीं की, मेरी शिकायत ही की। यकीन मानिए, खुद को उसकी नजर से देखने पर आपको भी अपनी कमियां दिखाई देने लगेंगी।

हर इंसान की आंख में एक तराजू है। आपकी आंखों में आपके कर्मों का पलड़ा भारी होता है, लेकिन सामने वाले की नजर से देखने पर आपके अवगुण आपकी अच्छाइयों पर भारी पड़ जाते हैं। आप अपनी कमियों को परिस्थितिजन्य समझ लेते हैं, लेकिन दूसरे उस कमी के एक-एक रेशे को खोल कर रख देते हैं। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए? खुद की अवहेलना कैसे बर्दाश्त की जाए? इस स्थिति से निकलने का एक ही तरीका है- किसी के लिए उतना ही कीजिए, जितना आपके मन को सही लगे। उसकी तारीफ पाने के लिए कुछ मत करिए। कहते हैं ‘ऊपर वाला सब देख रहा है। आपके हर कृत्य का हिसाब रखा जा रहा है।’ आप भी यही सोचिए।

हम सब ऊर्जा का स्रोत हैं जैसी ऊर्जा हम दूसरों को दे रहे हैं वैसी ही हमें भी मिलेगी। अगर आपने किसी को घृणा की दृष्टि से देखा है तो आपको भी नफरत किसी न किसी रूप में जरूर मिलेगी और क्षमा देने पर क्षमा भी जरूर मिलेगी। क्षमा और प्रेम दुनिया के सबसे मजबूत भाव हैं, इसे जितना बटोरिए उतना ही बांटते रहिए। जिस दिन आपने लोगों को मन से क्षमा करना सीख लिया, आपके आसपास की नकारात्मकता स्वत: कम होने लगती है। आप लोगों को उसी रूप में स्वीकार करना सीख लेते हैं, जिस रूप में वे आपको मिले हैं।

मानव मन बहुत कमजोर होता है। इसे अध्यात्म का पोषण मिलते रहना चाहिए। खुद से प्रेम करने की सबसे बड़ी शर्त स्वयं को लालसा और क्रोध से मुक्त करना है, वरना सोशल मीडिया पर दिखते खूबसूरत चेहरों का छलावा आपको बहुत परेशान करेगा। ठंड में ठिठुरते किसी अजनबी के लिए अलाव बन कर देखिए। उपेक्षाओं से सिकुड़ते किसी अपने की देह पर अपनत्व का स्पर्श बन कर देखिए। यह सुख किसी तस्वीर में उतारा नहीं जा सकता, लेकिन आपके अंतर्मन में उस सुख की स्मृति हमेशा के लिए बस जाएगी।

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