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खिल गए पलाश, वन धधक उठे

अप्रतिम सुंदरता की मूर्ति सरीखे पलाश के रक्ताभ फूल मार्च महीने में खिलना शुरू करते हैं।

जल्दी ही केदारनाथ अग्रवाल की बावली मस्तमौला बसंती हवा बौरों से गदराए आम के पेड़ को झकझोर कर, उसके कान में कू करके किसी खेत-खलिहान में छुप जाएगी। लेकिन प्रकृति बहुत कुशल मंच संचालक है। ‘ऋतुसंहार’ के इस नाटक में वह धरती के मंच को क्षण भर भी खाली नहीं छोड़ती। इस अनवरत नाटक में अंतराल भरने के लिए किसी छोटेमोटे कलाकार की जरूरत नहीं। बसंती हवा मंच से हटी नहीं कि नेपथ्य में छुपी चैती बयार गर्म सांसें भरती हुई मंच पर आ जाती है।

उसके आगमन के साथ पार्श्व में गायिका के स्वर गूंज उठते हैं- ‘चैत मासे बोले कोयलिया हो रामा’, और तब प्रकट होता है चैत्र से जेठ-बैशाख तक प्रकृति के मंच पर डटे रहने वाला वह सुंदर, मनोहारी पात्र, जिसके कई नाम हैं- पलाश, टेसू, किंशुक, ढाक आदि। ये नाम बताते हैं कि वह दूर-दूर तक दर्शकों को अपनी सज-धज से सम्मोहित करता रहा है।

जिस रणक्षेत्र में जून 1757 में मीर जाफर ने ईस्ट इंडिया कंपनी के राबर्ट क्लाइव से चांदी के सिक्कों के बदले में मातृवत बंगाल की धरती और अपनी आत्मा का सौदा किया था, वह भी तो पलाश वनों से घिरा होने के कारण ही पलाशी (प्लासी) कहा जाता था। इस सौदे से आहत पलाश के पेड़ों के हृदय में धधकती आग रक्ताभ फूल बन कर उनकी हर डाली पर छा गई होगी। आग की लपटों की तरह लाल फूलों से आच्छादित पलाश का वन दावानल-सा लगता है, तभी इसका एक और नाम है वन ज्वाला (फ्लेम आफ द फारेस्ट)। 1971 में भारतीय सेनाओं के सामने जिस नगर में पाकिस्तानी फौजों ने आत्मसमर्पण किया था, उसे भी तो कभी ढाक के वनों से घिरा होने के कारण ढाका नाम मिला था। वहां भी पाकिस्तानी सैनिकों के दमन की शिकार महिलाओं की आंखें आंसू बहाते-बहाते इन्हीं फूलों की तरह रक्ताभ हो गई होंगी।

अप्रतिम सुंदरता की मूर्ति सरीखे पलाश के रक्ताभ फूल मार्च महीने में खिलना शुरू करते हैं। गोल आकृति वाले थोड़े नुकीले हरे पत्तों के बीच झांकते लाल फूल और हरे पंख वाले तोते की नुकीली मुड़ी हुई लाल नाक में साम्य देख कर इस फूल को किंशुक नाम देने वाले की कल्पना की उर्वरता का क्या कहना। किंशुक शब्द बिगड़ते-बिगड़ते किन्सू- केंसू- टेसू बन गया है। टेसू के सुर्ख लाल फूल जब पूरे पेड़ पर आच्छादित हो जाते हैं, तो उसके बड़े-बड़े गोल पत्ते विस्थापित होकर धरती पर उतर आते हैं। फिर पूरा पेड़ एक विशाल फूलों का गुच्छा लगता है। सूखे पत्तों का उपयोग दोने पत्तल आदि बनाने में होता है, तो फूल भी केवल आंखों को तृप्ति देकर संतुष्ट नहीं हो जाते।

होली खेलने हेतु टेसू के फूलों को उबाल कर बने जैविक रंग आज के रासायनिक रंगों के दुष्प्रभावों से छुटकारा दिलाने वाला विकल्प बनने के पहले से ही लोकप्रिय रहे हैं। कृष्णप्रेम में बावरी मीरा को भी ‘सांवरिया के दर्शन पासूं पहन कुसुंभी सारी’ की कामना करते हुए टेसू कुसुम से बने पीत रंग की सुध रही। सदियों से पलाश के फूल कवियों की कल्पना पर छाए रहे हैं। संस्कृत काव्य में बाणभट्ट को पलाश के फूलों में कामदेव की पताकाएं दिखती थीं, तो कालिदास को पवन के झोंकों से हिलती पलाश की शाखाएं वन की ज्वाला। उन्होंने पलाश के लाल फूलों से आच्छादित धरती की तुलना लाल साड़ी में लिपटी नववधू से की थी।

पलाश को हिंदी में भी कम प्यार और सम्मान नहीं मिला। हिंदी साहित्य की शायद ही कोई विधा हो, जिसमें उसका उल्लेख न मिले। अमरकांत की कहानी ‘पलाश का पेड़’ में उसकी एक सांकेतिक उपस्थिति भर है, लेकिन मेहरुन्निसा परवेज के उपन्यास ‘अकेला पलाश’ में उससे कहीं बढ़ कर। वह कहती हैं, ‘पलाश भी कितना प्यारा और जानदार फूल है, एक अकेला पेड़ सारे वीराने को अपने सौंदर्य से भर देता है।’ उनकी नायिका तहमीना पलाश को देख कर अपने दुख भूल जाती है। नरेंद्र शर्मा की पंक्तियां हैं- ‘लो डाल-डाल से उठी लपट, लो डाल-डाल फूले पलाश/ यह है बसंत की आग, लगा दे आग जिसे छू ले पलाश/ लग गई आग, बन में पलाश, भू पर पलाश/ लो चली फाग, हो गई हवा भी रंग भरी छूकर पलाश!’

पलाश व्यंग्य में भी दिखता है, जैसे रवींद्र नाथ त्यागी के संग्रह ‘पूरब खिले पलाश’ में। मुहावरों तक में पलाश मिलता है, लेकिन उनमें पलाश के तने की छाल जैसी रूखी ऐसी मनोवृत्ति दिखती है, जिसमें जमाने से तंग आया कोई परेशानहाल फूल का सौंदर्य सराहने की जगह केवल ढाक के तीन पात देख पाता है। मगर ऐसा हमेशा नहीं होता। मलय जैन के उपन्यास ‘ढाक के तीन पात’ में यही मुहावरा एक सशक्त व्यंग्य बन कर उभरा है। प्रकृति के रंगमंच पर पलाश के साथ जुड़ने वाला एक दूसरा कलाकार पीले फूलों की लंबी वेणियां हाथों में लटकाए आता है। अब आप बूझिए इस नए अदाकार का नाम।

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