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असली स्वच्छता

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हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं, मगर आज भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जहां हम देश के सामाजिक गुलदस्ते को बिखरते महसूस कर सकते हैं।

जनसत्ता

नई दिल्ली | August 14, 2021 7:41 AM

उत्तर प्रदेश में एक दलित शख्स को कुछ लोगों ने लात-घूसों और लाठी-डंडों से बुरी तरह पीटा था। (video screenshot)

देश के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमन ने हाल ही एक कार्यक्रम के दौरान यह चिंता जताई कि मानवाधिकारों का सबसे ज्यादा खतरा देश के पुलिस थानों से है। पिछले कुछ सालों से देश यह भी देख रहा है कि संविधान ने अभिव्यक्ति की जो आजादी और अधिकार दिए हैं, उसे कैसे नुकसान पहुंचाया जा रहा है और सरकार कैसे आंख बंद करके देख रही है। आज क्यों समाज में द्वेष और रोष ने लोगों की मानसिकता को जकड़ रखा है? क्यों लोगों के अंदर से सही-गलत की समझ समाप्त होती जा रही है। हम आजादी की 75वीं वर्षगांठ मनाने जा रहे हैं, मगर आज भी ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं, जहां हम देश के सामाजिक गुलदस्ते को बिखरते महसूस कर सकते हैं।

देश की राजधानी हो या देश का कोई कोना, जहां से आने वाली खबरें हमारी आत्मा को झकझोर देती हैं। हाल ही में दिल्ली के जंतर मंतर पर एक प्रदर्शन के दौरान एक विशेष समुदाय के खिलाफ अभद्र और समाज के फिजां को गंदे करने वाले शब्द उत्साहपूर्वक चिल्ला-चिल्ला कर बोले गए। आखिर संसद की दीवारें ऐसी आवाजें कैसे अनसुना कर रही हैं! लालकिले पर झंडा फहराते हुए सोचना चाहिए कि देश को गोरों के चंगुल से मुक्त कराने वाले दीवानों में सभी शामिल थे। तो फिर क्यों इतनी नफरत? लालकिले से यह आवाज बुलंद करनी चाहिए और अनेकता में एकता का पैगाम देना चाहिए। जब देश की आजादी के लिए सभी पक्षों बहुत सारे लोगों की जान गई और सभी का लहू शामिल है यहां की मिट्टी में तो किसी एक समुदाय का विकास करके देश का विकास कैसे हो सकता है।

समाज में आज भी फैले जातीय भेदभाव खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसका एक उदाहरण कुछ समय पहले आगरा के पास देखने को मिला था, जिसमें एक कमजोर जाति की महिला की अर्थी चिता पर दाह संस्कार के लिए रखी जा चुकी थी, मगर अग्नि देने से पहले उच्च कही जाने वाली एक जाति के लोगों द्वारा विरोध किया गया और कहा गया कि यह श्मशान केवल उनके लिए है।

ऐसे न जाने कितने उदाहरण देश में देखने को मिलते हैं। तात्पर्य यह है कि हम आज भी उन्हीं जड़ रीति-रिवाजों में जी रहे हैं। जबकि सभी जानते हैं कि सबका मालिक एक है।

प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान को काफी सराहा गया। मगर जरूरत है समाज में कुंठित सोच और भेदभाव से स्वच्छता की जो आज भी दीमक की तरह देश में सामाजिक सौहार्द को चाट रही है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ का मूलमंत्र यह है कि जब तक समाज से ऐसी सोच का सफाया नहीं होगा, तब तक किसी स्वच्छता का कोई फायदा नहीं। अफसोस इक्कीसवीं सदी में भी ऐसी ऐसे भी लोग समाज में हैं। प्रधानमंत्री को लालकिले से एक आवाज बुलंद करनी चाहिए, ताकि उसका असर देश पर हो।


’मोहम्मद आसिफ, जामिया नगर, दिल्ली

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