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अगर एकजुट हो भी जाए विपक्ष तो भी परेशान करेंगे ये 3 बड़े सवाल? जवाब खोजना मुश्किल

बिहार की राजधानी पटना में 23 जून को विपक्षी दलों की पहली बैठक हुई थी। इसके बाद ऐलान किया गया था कि जल्द ही दूसरी बैठक होगी। आज यानी 17 जुलाई और कल (18 जुलाई) विपक्षी नेताओं की दूसरी बैठक बेंगलुरु में होनी है। विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए से लड़ने पर रणनीति बनाएंगे, लेकिन ऐसे तीन महत्वपूर्ण सवाल हैं जो विपक्ष को काफी मुश्किल में डाल रहे हैं और इनका जवाब खोजना काफी मुश्किल है।

विपक्ष का चेहरा कौन?

विपक्षी दलों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि वह आने वाले लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी के खिलाफ किसे उम्मीदवार बनाकर मैदान में आएं और सबसे बड़ी बात क्या वह एक नाम पर सहमति बना पाएंगे। सबसे बड़ी बात इसी मुद्दे पर विपक्षी दलों की राय एक नहीं है। हाल ही में जब पटना में बैठक हुई थी तब भी इस मुद्दे को लेकर काफी चर्चा हुई। हालांकि मजाक मजाक में लालू प्रसाद यादव ने कहा था कि राहुल गांधी दूल्हा बनें। उनके इस बयान के कई मायने निकाले गए, लेकिन नीतीश कुमार भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं। हालांकि वह हमेशा इस बात को नकारते रहे हैं। लेकिन किसी एक नाम पर विपक्षी दल सहमत नहीं हो पा रहे हैं।

बाद में खबर आती है कि अजित पवार गुट ने एनसीपी से इसलिए बगावत की, क्योंकि विपक्षी दलों की बैठक में राहुल गांधी का नाम प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया गया। जबकि वे चाहते हैं कि शरद पवार देश के बड़े नेता हैं और उनका नाम इसके लिए आगे आए। आम आदमी पार्टी के नेता भी कई बार कह चुके हैं कि अरविंद केजरीवाल देश में लोकप्रिय हो रहे हैं और वह पीएम मोदी के खिलाफ एक अच्छे कैंडिडेट के रूप में सामने आ सकते हैं।

अलग-अलग मसलों पर पार्टियों में संवाद?

विपक्ष की दूसरी सबसे बड़ी समस्या यह है कि अलग-अलग मुद्दों पर पार्टियों में एक समान रूप से संवाद नहीं हो पा रहा है। दरअसल सूत्रों के हिसाब से खबर आई थी कि कई नेता चाहते हैं कि विपक्षी दलों के समूह को एक नाम दिया जाए, लेकिन कई दल इस पर सहमत नहीं हुए। कुछ पार्टियों का मानना है कि औपचारिक नाम देना अभी जल्दबाजी होगी और इससे उद्देश्य पर लोग शक करेंगे।

वहीं पार्टियों के बीच साझा कार्यक्रम तैयार करने को लेकर भी सभी दलों की राय बंटी हुई नजर आ रही है। सभी दल चाहते हैं कि वे चुनाव एक होकर तो लड़े लेकिन अलग-अलग राज्यों में रणनीति अलग रहे और वहां की मजबूत क्षेत्रीय पार्टियां अपने हिसाब से रणनीति बनाएं।

कांग्रेस और टीएमसी विपक्षी दलों की बैठक के लिए एक साथ तो दिख रही है, लेकिन बंगाल में दोनों दलों के बीच जमकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है। बंगाल पंचायत चुनाव में हुई हिंसा को लेकर राज्य की कांग्रेस इकाई टीएमसी पर हमलावर है। वहीं पंजाब में हाल के दिनों में कई कांग्रेसी नेताओं पर कार्यवाही हुई है, जिसको लेकर कांग्रेस के नेताओं ने आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है।यानी साफ है पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच जमकर बवाल मचा हुआ है। दिल्ली में भी कांग्रेस के राज्य के नेता नहीं चाहते हैं कि आम आदमी पार्टी से गठबंधन हो और वह लगातार अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधते हैं।

सीट शेयरिंग को लेकर नहीं बन रही बात

विपक्षी दलों के सामने सबसे बड़ा मुद्दा सीट शेयरिंग को लेकर है। दरअसल कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है और उसकी उपस्थिति लगभग हर एक राज्य में है। लेकिन कई उत्तर भारत के राज्यों में कांग्रेस काफी कमजोर हो गई है और वहां पर क्षेत्रीय पार्टियां हावी हैं। कुछ हफ्तों पहले सामना में एक लेख लिखा था कि विपक्ष 450 सीटों पर एक साझा उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहा है। मतलब जो भी दल इस बैठक में हिस्सा ले रहे हैं उन सभी का 450 सीटों पर केवल एक ही कैंडिडेट होगा, लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है।

सूत्रों के अनुसार आम आदमी पार्टी ने पहले ही कह दिया है कि कांग्रेस दिल्ली और पंजाब छोड़ दें, तभी वह राजस्थान और मध्य प्रदेश उसके लिए छोड़ेगी। जबकि उत्तर प्रदेश में दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां सपा और बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। हालांकि बीएसपी विपक्ष की बैठक में हिस्सा नहीं ले रही है। महाराष्ट्र में अब एनसीपी टूट चुकी है और अजीत पवार गुट उभरकर सामने आया है। किसी एक राज्य में विपक्ष को एक साझा उम्मीदवार खड़ा करना काफी मुश्किल होगा। इसलिए सीट शेयरिंग को लेकर भी मामला फंसा हुआ है।

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