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NDTV की रिपोर्ट के बाद मध्य प्रदेश के अनाथ बच्चों को मिला ‘पालनहार’, मंत्री ने ली देखभाल की जिम्मेदारी

NDTV की रिपोर्ट के बाद मध्य प्रदेश के अनाथ बच्चों को मिला 'पालनहार', मंत्री ने ली देखभाल की जिम्मेदारी

माता-पिता की मौत के बाद अब इस परिवार में तीन बच्चियां और दो बच्चे हैं.

भोपाल:

मध्य प्रदेश के भिंड जिले में पांच भाई-बहन अपने माता-पिता को कोविड में खोने के बाद दर-दर की ठोकरें खा रहे थे. एनडीटीवी ने जब बच्चों की व्यथा जानी तो इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया. एनडीटीवी की रिपोर्ट के एक दिन बाद राज्य के कैबिनेट मंत्री और भाजपा विधायक अरविंद भदौरिया ने कहा है कि वह उनके लिए एक घर बनवाएंगे और अभिभावक की तरह उनकी देखभाल करेंगे.

एनडीटीवी से बात करते हुए भिंड के अटेर खंड से विधायक भदौरिया ने कहा कि बच्चों को एक आश्रय में स्थानांतरित कर दिया गया है. “राज्य सरकार उनकी शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा की देखभाल कर रही है. उन्होंने कहा है कि उन्हें रहने के लिए जगह चाहिए. इसलिए अपनी व्यक्तिगत क्षमता से मैं सुनिश्चित करूंगा कि उनके पास एक घर हो. शिक्षा और अन्य आवश्यकताओं के लिए भी मैं उनका अभिभावक हूं.”

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मंत्री ने कहा कि यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि महामारी के दौरान बच्चे अनाथ हो गए. उन्होंने कहा, “वे हमारे बच्चे हैं, हम उनके साथ खड़े हैं. मैं उनके लिए घर बनवाने की व्यवस्था करूंगा.”

एक सवाल के जवाब में कि सामाजिक संगठन और अन्य लोग बच्चों की मदद कैसे कर सकते हैं क्योंकि उनके पास बैंक खाते नहीं हैं, मंत्री ने कहा कि वह इस मुद्दे को सुलझाने के लिए जिला कलेक्टर के साथ बातचीत कर रहे हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि मदद बच्चों तक पहुंचे और कोई दुरुपयोग न हो. मंत्री ने एक सप्ताह के भीतर खाता खोलने का आश्वासन देते हुए कहा, ‘प्रशासन के माध्यम से हम खाता खुलवाएंगे और सामाजिक संगठनों से किसी भी तरह की मदद का स्वागत करते हैं.

एक अन्य सवाल पर कि ये बच्चे मध्य प्रदेश योजना के तहत कोविड द्वारा अनाथ लोगों के लिए लाभ क्यों नहीं उठा सके, उन्होंने कहा, “एक तकनीकी कठिनाई थी क्योंकि उनके माता-पिता की मृत्यु राज्य में नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में हुई थी. इसलिए हमारे सिस्टम में यह फीड नहीं हो सका. लेकिन अब हम इसके बारे में जानते हैं, यह हमारे जिले और राज्य का मुद्दा है और हमारे पास मुख्यमंत्री से निर्देश भी हैं. मैं इसे व्यक्तिगत रूप से भी देखूंगा.

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बच्चे – तीन बहनें और दो भाई, जिनमें से सबसे छोटा सात महीने का है और सबसे बड़ा 10 – अमाहा गांव में एक श्मशान घाट के पास आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त झोंपड़ी में रह रहे थे. उनके पिता राघवेंद्र वाल्मीकि की फरवरी में और उनकी मां गिरिजा की जून में मृत्यु हो गई थी.

बच्चों में सबसे बड़ी निशा ने कल कहा, “हमारे पास खाने के लिए कुछ नहीं है… इसलिए हमें ग्रामीणों से प्रतिदिन भोजन और दूध मिलता है, जिन्होंने हमें कपड़े भी प्रदान किए. हम सरकार से अनुरोध करते हैं कि हमें एक घर… भोजन, पीने का पानी और शिक्षा प्रदान करें.”

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