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Narada Case: ममता की याचिका पर सुनवाई से SC के जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने खुद को किया अलग

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दरअसल, इस स्टिंग टेप केस में सीबीआई द्वारा 17 मई को टीएमसी के चार नेताओं की गिरफ्तारी के दिन अपनी और प्रदेश के कानून मंत्री मलय घटक की भूमिका को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा हलफनामा दायर करने की इजाजत न दिए जाने के बाद ममता ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस और प.बंगाल की सीएम ममता बनर्जी। (फोटो सोर्सः यूट्यूब स्क्रीनग्रैब-West Bengal State Legal Services Authority/PTI)

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने Narada Case में खुद को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और TMC चीफ ममता बनर्जी की याचिका पर सुनवाई करने से अलग कर लिया है।

दरअसल, इस स्टिंग टेप केस में सीबीआई द्वारा 17 मई को टीएमसी के चार नेताओं की गिरफ्तारी के दिन अपनी और प्रदेश के कानून मंत्री मलय घटक की भूमिका को लेकर कलकत्ता उच्च न्यायालय द्वारा हलफनामा दायर करने की इजाजत न दिए जाने के बाद ममता ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की बेंच को मुख्यमंत्री, घटक और पश्चिम बंगाल द्वारा दायर अलग-अलग अपीलों पर 22 जून को सुनवाई करनी थी। इससे पहले, टॉप कोर्ट ने कहा था कि वह घटक द्वारा दायर याचिका पर 22 जून को सुनवाई करेगी।

कोर्ट ने 18 जून को हाईकोर्ट से अनुरोध किया था कि वह टॉप कोर्ट द्वारा आदेश के खिलाफ राज्य सरकार और घटक की याचिका पर विचार करने के एक दिन बाद मामले की सुनवाई करे। केस की सुनवाई विशेष सीबीआई अदालत से हाईकोर्ट ट्रांसफर करने से जुड़ी सीबीआई की याचिका पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के पांच न्यायाधीशों की बेंच ने नौ जून को कहा था कि वह मामले में चार नेताओं की गिरफ्तारी के दिन बनर्जी और घटक की भूमिका को लेकर उनके द्वारा दायर हलफनामे पर विचार करने के बारे में बाद में फैसला करेगी।

घटक और राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं राकेश द्विवेदी और विकास सिंह ने कहा था कि हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में हलफनामों का लाया जाना जरूरी है, क्योंकि वे 17 मई को संबंधित व्यक्तियों की भूमिका के बारे में हैं। द्विवेदी ने कहा कि कानून मंत्री मंत्रिमंडल की बैठक में हिस्सा ले रहे थे और सुनवाई के वक्त अदालत परिसर में नहीं थे। उन्होंने कहा कि सीबीआई अधिकारी भी मौके पर नहीं थे क्योंकि एजेंसी के वकील डिजिटल रूप से अदालत से संवाद कर रहे थे।

यह आरोप लगाया गया था कि राज्य के सत्ताधारी दल के नेताओं ने मामले में 17 मई को चार नेताओं की गिरफ्तारी के बाद सीबीआई को उसके विधिक दायित्वों के निर्वहन से रोकने में अहम भूमिका निभाई। सिंह ने दलील दी कि नियमों के मुताबिक हलफनामे दायर करने का अधिकार है और इतना ही नहीं सीबीआई ने तीन हलफनामे दायर किये हैं और अदालत की इजाजत नहीं ली थी।

सॉलिसिटर जनरल ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया था कि विलंब के आधार पर हलफनामों को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्हें उनकी जिरह पूरी होने के बाद दायर किया गया है। केस की सुनवाई विशेष सीबीआई अदालत से उच्च न्यायालय में स्थानांतरित करने का अनुरोध कर रही सीबीआई ने वहां अपनी याचिका में मुख्यमंत्री और कानून मंत्री को भी पक्ष बनाया।

एजेंसी का दावा था कि चार नेताओं की गिरफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री कोलकाता में सीबीआई कार्यालय में धरने पर बैठ गई थीं, जबकि 17 मई को विशेष सीबीआई अदालत में डिजिटल माध्यम से मामले की सुनवाई के दौरान घटक, बंशाल अदालत परिसर में मौजूद थे। कोर्ट के 2017 के एक आदेश पर नारद स्टिंग टेप मामले की जांच कर रही सीबीआई ने मंत्री सुब्रत मुखर्जी और फरहाद हकीम, तृणमूल कांग्रेस के विधायक मदन मित्रा और कोलकाता के पूर्व महापौर सोवन चटर्जी को गिरफ्तार किया था।

कौन हैं जस्टिस अनिरुद्ध बोस? मूल रूप से कोलकाता के हैं। वहीं से एलएलबी किया और बाद में Constitutional, Civil and Intellectual Property से जुड़े मसलों पर Calcutta High Court में साल 1985 के आसपास प्रैक्टिस करने लगे। 2004 में वह कलकत्ता हाईकोर्ट में परमानेंट जज बने। जानकारी के मुताबिक, उनका नाम दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के लिए भी आगे बढ़ाया गया था, पर केंद्र ने उसे लौटा दिया। सरकार की ओर से हवाला दिया गया था कि उनके पास तब दिल्ली जैसे हाईकोर्ट के लिए पर्याप्त अनुभव नहीं है। कॉलेजियम ने प्रस्ताव पर पुनःविचार किया और उन्हें चार अगस्त 2018 को झारखंड हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस के तौर पर ट्रांसफर कर दिया गया, जबकि 2019 में वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने। (पीटीआई-भाषा इनपुट्स के साथ)

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