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BJP पार्टी नहीं, चुनावी मशीन, RSS की दूसरी पंक्ति के नेता अब मोदी की आर्मी का हिस्सा, संघ बस मुखौटा बनकर रह गया, बोले अरुण शौरी  

अरुण शौरी ने एक इंटरव्यू में कहा कि आरएसएस शुरू से साधुओं जैसे समूहों को अपने में शामिल कर रहा है, लेकिन कभी इस पर ध्यान नहीं दिया गया। आज जो भी हो रहा है उससे हैरान होने की जरूरत नहीं क्योंकि इसमें हमारी अनदेखी का भी योगदान है।

आरएसएस नेता अब मोदी की आर्मी का हिस्सा बन गए हैं और संघ बस एक मुखौटा बनकर रह गया। यह बात द इंडियन एक्सप्रेस के पूर्व संपादक और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने कही है। उन्होंने कहा कि बीजेपी अब पार्टी नहीं एक चुनावी मशीन है, जिसके पास आरएसएस है जो दूसरे दलों के पास नहीं है। अगर विपक्ष एकजुट हो जाए तभी बीजेपी को चुनौती दे सकता है।

द इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक इंटरव्यू के दौरान अरुण शौरी से पूछा गया कि क्या बीजेपी के अंदर या बाहर कोई ऐसा है जो उसे चुनौती दे सकता है। इस पर पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बीजेपी को अंदर से कोई खतरा नहीं है क्योंकि उनके पास एक साधन (रिसोर्स) है जो दूसरों के पास नहीं है और वह है आरएसएस का कैडर। आरएसएस तर्क दे रहा है कि उसके एजेंडे को अंजाम दिया जा रहा है। आरएसएस का शीर्ष नेतृत्व अब सिर्फ मुखौटा है। संघ के दूसरे क्रम के नेता और कैडरों को मोदी ने सहयोजित किया है और अब ये उनकी आर्मी का हिस्सा हैं। वहीं, अगर विपक्षी दलों की बात की जाए तो बीजेपी को चुनौती देना मुश्किल है क्योंकि यह चुनाव जीतने की मशीन बन गई है। बीजेपी को चुनौती देना तभी संभव है अगर विपक्ष एकजुट हो।

इस दौरान अरुण शौरी से यह भी सवाल किया गया कि क्या उनको लगता है कि बहुसंख्यकों की असुरक्षा से जुड़ा मुद्दा नहीं उठाने के लिए मीडिया दोषी है और इसी वजह से भाजपा की रणनीति इतनी अच्छी तरह से काम कर रही है?

अरुण शौरी ने कहा कि हां, ये बात सही है। किसी ने भी आरएसएस की शुरुआती गतिविधियों पर कभी ध्यान नहीं दिया और आज जो हो रहा है उसमें हमारी अनदेखी का भी योगदान है। हम आज की स्थिति को देखकर हैरान हैं, जबकि वे तो वही कर रहे हैं जो उन्होंने कहा। आरएसएस ने हमेशा कहा है- “हम जो कहते हैं वही करते हैं”, लेकिन हमने उनकी ये बात कभी सुनी ही नहीं। इसके अलावा, हमने कभी उन लोगों पर ध्यान नहीं दिया जिनको वे इकट्ठा कर रहे हैं।

1940 से साधुओं को अपने साथ लाने के लिए काम कर रहा आरएसएस

आरएसएस 1940 के दशक से साधुओं जैसे समूहों को अपने साथ लाने के लिए काम कर रहा है। ये समाज में एक प्रभावशाली समूह है, जिन्हें लोग सुनते हैं और इनकी बातों का लोगों के जीवन पर प्रभाव पड़ता है। वहीं, हमने कभी यह कोशिश नहीं की कि हम उन तक पहुंचें और ये सुनिश्चित करें कि वे आरएसएस की विचारधारा को फैलाने का माध्यम ना बनें। हमारी अनदेखी के कारण आरएसएस के लिए ऐसे लोगों को अपने पाले में करना आसान हो गया।

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