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सैन्य आधुनिकीकरण : क्या है आगे का रास्ता

बदलती भौगोलिक-राजनीतिक स्थिति और सुरक्षा परिदृश्य के कारण भारत में सैन्य आधुनिकीकरण तेज किया जा रहा है।

बदलती भौगोलिक-राजनीतिक स्थिति और सुरक्षा परिदृश्य के कारण भारत में सैन्य आधुनिकीकरण तेज किया जा रहा है। बीते एक साल में आधुनिकीकरण की कवायद तेज हुई है, जिसकी बड़ी वजह चीन के साथ तनाव और लद्दाख गतिरोध को बताया जा रहा है। साथ ही, पाकिस्तान के साथ लगातार तनाव भी एक वजह है।

आधुनिकीकरण की कवायद सुनियोजित नहीं थी। राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञ भरत कर्नाड के मुताबिक, भारत में सैन्य आधुनिकीकरण हमेशा एक सहायक प्रक्रिया रही है, जो केवल संबंधित सेवाओं के निदेशालयों द्वारा तैयार की गई संभावित योजनाओं के अनुरूप है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत के सैन्य आधुनिकीकरण के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक रक्षा बजट है। साल 2020 में भारत का रक्षा बजट करीब 72.9 बिलियन डालर था, जबकि चीन का रक्षा बजट इसी दौरान करीब 178 बिलियन डालर था। भरत कर्नाड कहते हैं, आधुनिकीकरण सेना को उपलब्ध कराए गए वित्तीय संसाधनों का एक कार्य है। भारत के मामले में एकमात्र समस्या यह है कि यहां बजट का एक बड़ा हिस्सा जनशक्ति पर खर्च हो रहा है।

सेना ने 2020-2021 के बजट का 56 फीसद या 38 बिलियन डालर का पूरा हिस्सा लिया और इसमें से केवल 18 फीसद यानी करीब सात बिलियन डालर, पूंजीगत व्यय के लिए आवंटित किया गया था, जो कि आधुनिक हथियारों और पुर्जों की खरीद के लिए है। आज के जमाने में सात बिलियन डालर से सैन्य आधुनिकीकरण नहीं किया जा सकता।

आधुनिकीकरण की दिशा में महात्वाकांक्षी योजना एकीकृत कमान की है। सरकार सेना, नौसेना और वायु सेना की क्षमताओं को एकीकृत करना चाहती है। वतर्मान 17 एकल-सेवा इकाइयों को पांच थिएटर कमांड के तहत लाया जाना है ताकि भविष्य के संघर्षों से निपटने में एकीकृत दृष्टिकोण स्थापित हो सके।

जानकारों के मुताबिक, सुधार आधुनिकीकरण प्रक्रिया के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। आधुनिकीकरण केवल हथियारों, प्लेटफार्म और उपकरणों के बारे में नहीं है। साल 2020 में सियाचिन पर भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट- ‘हिमालय में दुनिया का सबसे ऊंचा युद्धक्षेत्र’ ने बहुत ही जरूरी सैन्य तैयारियों में कमी को उजागर किया था। पिछले दशक में सैन्य संसाधनों कमी और उपकरणों के चलन से बाहर होने की ऐसी कई रिपोर्ट आई हैं। पुराने हथियार प्लेटफार्मों में जो अभी भी सेवा में हैं, उनमें सबसे विशिष्ट भारतीय वायु सेना बेड़े में मिग-21 बाइसन है, जिसे चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है।

विमान अभी भी उपयोग में क्यों है, इसके कारणों के बारे में विश्लेषकों का कहना है कि नए जेट प्राप्त करने के लिए पैसे की कमी है और इसी वजह से सेना और नौसेना की विमानन इकाइयों का एक बार में आधुनिकीकरण नहीं किया जा सकता है। कुछ जानकारों का कहना है कि भारत को किस तरह के जेट विमानों की जरूरत है, इस पर अधिकारियों को स्पष्टता की जरूरत है। विशेषज्ञों का जोर देकर कहना है कि इन सबके अलावा, साइबर और नेटवर्क केंद्रित युद्ध पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है।

भारत अभी दुनिया के शीर्ष पांच हथियार आयातकों में से एक है। हालांकि, केंद्र सरकार हथियारों और सैन्य उपकरणों के स्थानीय स्तर पर उत्पादन और खरीद पर अधिक जोर दे रही है।

जानकारों की राय में, भारत ने हाल ही में जो खरीदारी की है, वह विचार प्रक्रिया में एक रणनीतिक बदलाव को दिखाती है। भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण को भी प्रशंसनीय माना जा रहा है, जिसमें स्वदेशी विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रांत, नियोजित वाहक आइएनएस विशाल और संशोधित कीव-श्रेणी के विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य का उदाहरण दिया जा रहा है।

इस सिलसिले में राजनयिक मोर्चे पर भी कवायद चल रही है। जानकारों की राय में भारत को सैन्य उपकरणों की खरीद को लेकर संयुक्त राज्य अमेरिका और रूस के साथ संघर्ष को टालने के साथ स्वदेशीकरण की राह अपनाने के लिए दीर्घकालिक योजना के साथ आगे बढ़ना होगा। रूस से एस-400 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों (एसएएम) ट्रायम्फ की खरीद के भारत के फैसले पर अमेरिकी प्रतिबंध खासकर ‘काउंटर अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शन एक्ट’ (काट्सा) का साया मंडरा रहा है।

भारत-रूस एस- 400 सौदे की वजह से अमेरिका-भारत संबंधों में होने वाले संभावित कड़वाहट के बारे में नई दिल्ली और वाशिंगटन डीसी दोनों जगह विश्लेषण चल रहे हैं। दरअसल, अमेरिका चाहता है कि भारत या तो अमेरिकी लाकहीड मार्टिन द्वारा निर्मित थियेटर हाई एल्टीट्यूड एरिया डिफेंस (टीएचएएडी) प्रणाली या पैट्रियट बैटरी प्रणाली को खरीदे। लागत और परिचालन आवश्यकताओं और अन्य कारणों से, भारत ने अमेरिकी प्रणालियों को खरीदने में रुचि नहीं जताई है।

मिसाइल ताकत

मिसाइल विकास के क्षेत्र में भारत को पिनाक मल्टी बैरल प्रणाली (एमआरबीएलएस) जैसी हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलों को विकसित करने में सफलता मिली है, पृथ्वी शार्ट रेंज बैलिस्टिक मिसाइलों (एसआरबीएम) से लेकर इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल (आइआरबीएमएस) की अग्नि शृंखला तक, के-4 सबमरीन बैलिस्टिक मिसाइल (एसएलबीएम) और प्रलय तक, सुपरसोनिक मिसाइल टारपीडो (एसएमएआरटी) के अतिरिक्त ब्रह्मोस के सभी स्वरूपों को विकसित कर लिया है।

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