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सेना भर्ती की तैयारी करने वालों का छलका दर्द: ज्यादा विकल्प नहीं होने पर निराश युवा चलेंगे ‘अग्निपथ’ पर!

रिटायर मेजर जनरल यश मोर का कहना है कि यह योजना पूरी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकती। पहले सरकार को उन दो साल की भर्तियों को पूरी करे जो कोरोना के कारण रोकी गई हैं और युवा उसका इंतजार कर रहे हैं।

गजेंद्र सिंह

राष्ट्रीय स्तर की दौड़ प्रतियोगिता में भाग ले चुके बिहार भागलपुर के कृष्णा जहां अपने लिए दौड़ते हैं, वहां 75 और युवा फौज की तैयारी के लिए आते हैं। कृष्णा उनको प्रशिक्षण देते हैं। लेकिन अग्निपथ योजना के आने के बाद से उनके पास आने वाले युवा परेशान हैं। कृष्णा बताते हैं कि कुछ की उम्र सीमा खत्म हो रही है जबकि कुछ इस बात से परेशान हैं कि अग्निपथ में चयन के चार साल बाद क्या करेंगे। कृष्णा के पास आने वाले ज्यादातर नौजवान 12वीं पास हैं। ये कुछ साल से फौज की भर्ती खुलने की आस लगाए बैठे थे। लेकिन कृष्णा का कहना है कि हताश युवा कहते हैं कि अगर इसमें तब्दीली नहीं होती है तो भी कोई मार्ग नहीं बचा है और वे आवेदन करेंगे।

सेना में चार साल की संविदा नौकरी देने की अग्निपथ योजना की घोषणा के बाद देश के कई राज्यों में युवा उग्र प्रदर्शन कर रहे हैं। वे योजना को वापस लेने और रुकी भर्ती बहाल करने की मांग कर रहे हैं। लखनऊ में आठ साल से बच्चों को सेना में भर्ती का प्रशिक्षण दे रहे राजू बताते हैं कि उनके पास आने वाले सभी युवा इस योजना के खिलाफ हैं। यहां प्रशिक्षण ले रहे एक अभ्यर्थी का कहना है कि सात माह बाद उनकी उम्र 21 साल हो जाएगी।

वे चार साल से तैयारी कर रहे हैं। ऐसे में अगर सरकार दो साल उम्र बढ़ा रही है तो वे आवेदन कर देंगे, क्योंकि वे अभी बेरोजगार हैं। उत्तराखंड में खगयार गांव के 20 वर्षीय दीपक और उनके गांव के 10 और दोस्त सेना की तैयारी कर रहे हैं। दीपक कहते हैं कि योजना गलत है। चार साल बाद कमाने की कोई गारंटी नहीं होगी। उनका सवाल है कि 25 फीसद वाले में भ्रष्टाचार भी बढ़ने की संभावना है। लेकिन आवेदन करूंगा। कमीशन आधारित सेना भर्ती की तैयारी कर चुके फतेहाबाद के हरपाल कहते हैं कि पूरी योजना को अभी नकार देना सही नहीं होगा। हरपाल का मानना है कि सरकार को भी 75 फीसद के लिए नौकरियों में आरक्षण देना चाहिए।

दो साल से लटकी भर्ती तो पूरी करते

रिटायर मेजर जनरल यश मोर का कहना है कि यह योजना पूरी तरह से स्वीकार्य नहीं हो सकती। पहले सरकार को उन दो साल की भर्तियों को पूरी करे जो कोरोना के कारण रोकी गई हैं और युवा उसका इंतजार कर रहे हैं। हमारे यहां सामाजिक और आर्थिक फैक्टर देखे बिना ही यह योजना बना दी गई है। जबकि गांव के लोगों के लिए सेना की नौकरी का मतलब ही देश सेवा और उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार है। यश मोर कहते हैं कि फौज का दूसरा आकर्षण वेतन और पेंशन है। उनका कहना है कि 75 फीसद लोगों को दूसरी नौकरी मिलना मुश्किल होगी।

चार साल की नौकरी में छह माह के प्रशिक्षण पर भी यश मोर सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि एक सिपाही बनने के लिए नौ माह चाहिए। ऐसे में यह छह माह का कौन सा प्रशिक्षण होगा।

कैसे संभालेंगे युवाओं की भीड़

रिटायर एअर मार्शल एके गोयल इसे गलत योजना बताते हैं। वे कहते हैं कि चार साल में सैनिक तैयार करना सही नहीं है। लोगों का सेना से आकर्षण समाप्त होगा। सरकार को सोच-समझ कर जमीनी स्तर पर काम करके यह योजना लानी चाहिए थी। योजना में 25-75 फीसद से जुड़े मामले में गोयल कहते हैं कि जब पहले से ही पुलिस व अन्य नौकरियों के लिए सैकड़ों युवाओं की लाइन लगी है तो वहां इस भीड़ को कैसे संभाल सकेंगे। छह माह के प्रशिक्षण से एक अच्छा सिपाही रेजिमेंट को नहीं मिल सकता।

कुछ बदलाव के साथ लाई जाए योजना

रिटायर मेजर जनरल बीएस भाकुनी अपना प्रशिक्षण केंद्र चलाते हैं। उनका कहना है कि योजना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता लेकिन कुछ बदलाव जरूरी हैं। वे कहते हैं कि पहले तो रुकी हुई भर्ती शुरू करें और यह योजना भी साथ चलाएं। इसके अलावा नौकरी पांच साल करें। उम्र सीमा में जो छूट दी गई है वह आगे भी बढ़ाई जाए। मेजर जनरल कहते हैं कि सरकार इस योजना को अच्छे से समझा नहीं सकी है। वे छह माह के प्रशिक्षण को सही बताते हैं। हालांकि उनका कहना है कि 75 फीसद वालों को भी अहमियत मिलनी चाहिए।

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