POLITICS

साख बचाने को हर पैंतरा आजमा रही सरकार

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के 2022 के चुनावों को देखते हुए प्रदेश की जयराम सरकार ने चुनावी गणित बिठाते हुए कर्मचारियों से लेकर जातिगत स्तर पर मतदाताओं की लामंबदी करने की मुहिम तो छेड़ी है लेकिन इस लामबंदी का कितना चुनावी फायदा मिलेगा, यह देखना बाकी है।

ओमप्रकाश ठाकुर

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के 2022 के चुनावों को देखते हुए प्रदेश की जयराम सरकार ने चुनावी गणित बिठाते हुए कर्मचारियों से लेकर जातिगत स्तर पर मतदाताओं की लामंबदी करने की मुहिम तो छेड़ी है लेकिन इस लामबंदी का कितना चुनावी फायदा मिलेगा, यह देखना बाकी है। यही नहीं उन्होंने सरकार के चार साल पूरे होने पर मंडी में आयोजित किए जश्न समारोह में विभिन्न योजनाओं के लाभार्थियों की भी भीड़ जुटाई गई और यह संदेश देने की कोशिश की कि ये तमाम लाभार्थी भाजपा के साथ हैं।

इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खास तौर पर शिरकत की थी लेकिन ये लाभार्थी असल में भाजपा के साथ ही जुड़े रहेंगे, इस बात का पता तो 2022 मेंं होने वाले विधानसभा चुनावों में ही हो पाएगा। लेकिन मतदाताओं की लामबंदी की कोशशें तो जयराम सरकार ने शुरू कर ही दी है। वे कहते भी हैं कि उपचुनावों में जनता ने उन्हें समय रहते सतर्क कर दिया है। जयराम सरकार प्रदेश में ‘मिशन रिपीट’ की राह पर चलने का दुष्कर एजंडा चलाए हुए है। हाल ही में विधानसभा के धर्मशाला में सपन्न हुए शीत कालीन सत्र के दौरान जयराम सरकार ने जातिगत तौर पर बड़ा कदम उठाते हुए प्रदेश में सामान्य वर्ग आयोग के गठन को लेकर अधिसूचना जारी कर दी।

कुछ संगठन प्रदेश में सवर्ण समाज के अगुआ बन कर इस तरह के आयोग के गठन को लेकर एक अरसे से सक्रिय व आंदोलनरत थे। इन संगठनों ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान धर्मशाला के तपोवन में विधानसभा के घेराव कर दिया और मुख्यमंत्री ने सदन ही सामान्य वर्ग आयोग के गठन की घोषणा कर दी। इसे राजनीतिक तौर पर सामान्य वर्ग के वोटबैंक को अपने साथ जोड़े रखने की कवायद समझा जा रहा है। कांग्रेस पार्टी के विधायक विक्रमादित्य सिंह विधानसभा के मानसून सत्र के दौरान इस तरह के आयोग के गठन को अपना समर्थन दे चुके थे। हालांकि कांगेस के बाकी नेताओं ने इस मसले पर चुप्पी साधे रखी थी। इस तरह के आयोग को लेकर दलित संगठन भी विरोध में मैदान में कूद चुके है। लेकिन बावजूद इसके जयराम सरकार ने सामान्य वर्ग को खुश करने के लिए आयोग को गठित करने का फैसला ले लिया है।

इस आयोग के गठन से जातिगत समीकरण भाजपा के पक्ष में जाएंगे ही यह अलग मसला है लेकिन उप चुनावों में हार के बाद जयराम सरकार जाति को लेकर राजनीति करने को मजबूर हो गई है, ऐसा भान होने लगा है। संभवत: वह बहुसंख्यकों के तुष्टिकरण की राजनीति करने का एजेंडा चलाने की राह पर है। इस मसले पर तो भाजपा के दिग्गज शांता कुमार भी जयराम के साथ खड़े नजर आ रहे है। उन्होंने इस बाबत सार्वजनिक तौर पर इसका एक तरह से समर्थन ही किया है। यह दीगर है कि वे आर्थिक आधार पर आरक्षण के हिमायती रहे है।

यही नहीं कर्मचारियों के मसलों को लेकर भी जयराम सरकार हलचल करने पर आ गई है। पुरानी पेंशन की बहाली को लेकर देश व प्रदेश के कर्मचारी एक अरसे से आंदोलन की राह पर हंै। धर्मशााला में विधानसभा के शीतकालीन सत्र के दौरान ही इन कर्मियों ने भी धरना प्रदर्शन किया तो जयराम सरकार ने इस मसले पर भी एक समिति का गठन कर दिया। इसके अलावा आउटसोर्स कर्मचारियों को लेकर भी उन्होंने अगले साल बजट में कुछ करने का भरोसा दिलाया है।

खोया जनाधार पाने के लिए झोंकी जा रही पूरी ताकत

इन तमाम कदमों से एक बात तो साफ है कि जयराम सरकार की नींव हिल गई है और सरकार अपना खोया जनाधार हासिल करने के लिए पूरी ताकत लगा रही है। जयराम सरकार मतदाताओं की लामबंदी को कोई भी मौका छूटने नहीं देना चाह रही है। लेकिन असल मसला यह नहीं है कि उपचुनावों को हारने के बाद वह इस तरह के कदम उठा रही है। असल मसला तो यह है कि सरकार चलाने में जो शुचिता चाहिए वह किस तरह से बहाल हो। बहरहाल, इस शुचिता को लेकर कोई कदम उठता नजर नहीं आ रहा है और जब तक इस दिशा में कुछ नहीं होगा तब तक सरकार जितने मर्जी लोक लुभावन व जातिगत समीकरण बिठा ले, सरकार को जनता का समर्थन मिलना संभव नहीं लगता है।

Read More

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
%d bloggers like this: