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सवाल जमीन का

दरांग के धौलपुर गोरुखुटी में सरकारी जमीन पर लोग कई सालों से रहे हैं। इस अवैध कब्जे के लिए अगर पूर्व की सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन अब जब लोगों को हटाया जा रहा है तो उन्हें दूसरी जगह जमीन देना मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी बनती है। वरना फिर कहीं अतिक्रमण होगा।

सरकारी जमीन पर से अतिक्रमण हटाने का अभियान अगर लोगों की जान लेने वाला हो जाए तो सरकार, स्थानीय प्रशासन और पुलिस के काम करने के तरीके पर सवाल उठना स्वाभाविक ही है। गुरुवार को असम के दरांग जिले के धौलपुर गोरुखुटी इलाके में हुई ऐसी ही घटना बताती है कि जिस संवेदनशील मसले को बहुत ही संजीदगी के साथ हल करने की जरूरत थी, उसमें पुलिस और प्रशासन ने बर्बरता दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सरकारी जमीन खाली करवाने पहुंचे अमले ने बेरहमी से ग्रामीणों को पीटा। जब भीड़ उग्र हो गई तो गोलियां चला दीं। इसमें दो लोग मारे गए।

हालांकि अतिक्रमण हटाने जैसी कार्रवाई में इस तरह की झड़पों का खतरा बना ही रहता है। लेकिन असम की यह घटना दहलाने वाली इसलिए है कि पुलिस और उसके साथ गए फोटोग्राफर ने गोली से घायल एक व्यक्ति के साथ हैवानियत की सारी सीमाएं तोड़ डालीं। पुलिस उस घायल व्यक्ति पर डंडे बरसाती रही और जब उसने दम तोड़ दिया तो फोटोग्राफर उसके शव पर कूदता रहा। इस घटना का वीडियो प्रसारित हो गया। एक शव के साथ इस तरह की बर्बरता ने पुलिस के असली चरित्र को एक बार फिर उजागर कर डाला।

गौरतलब है कि इस बस्ती में करीब तेरह सौ परिवार दशकों से रहते आ रहे थे। लोगों ने यहां कच्चे-पक्के मकान और धार्मिक ढांचे भी खड़े कर लिए थे। सरकारी रिकार्ड में यह सात हजार बीघा जमीन सामुदायिक खेती के लिए रखी गई थी। हाल में असम सरकार ने यहां सामुदायिक खेती के लिए परियोजना को मंजूरी दी थी। जब जमीन खाली करवाने का मामला अदालत में पहुंचा तो अदालत ने भी सरकार को इन परिवारों को यहां से हटाने का निर्देश दिया था। इसी क्रम में अतिक्रमण हटाने की कवायद पिछले कुछ दिनों से चल रही थी।

पहले चरण में सोमवार को प्रशासन ने करीब आठ सौ परिवारों को हटा दिया था। बुधवार को बाकी बचे पांच सौ परिवारों को भी जमीन खाली करने के लिए नोटिस थमा दिए गए और अगले ही दिन गुरुवार को सरकारी अमला बस्ती खाली करवाने पहुंच गया। इस पर लोग भड़क गए। उनका कहना था कि हटाने से पहले सरकार उन्हें रिहायश मुहैया करवाए। सवाल तो इस बात का है कि जब आठ सौ परिवारों को हटा दिया गया था, तो बाकी को भी समझा-बुझा कर क्या जमीन खाली नहीं करवाई जा सकती थी?

दरअसल अतिक्रमण संबंधी मामले सरकारों की अनदेखी और लापरवाही की देन होते हैं। अगर स्थानीय प्रशासन शुरू से सतर्क रहे तो अवैध बस्तियां बसने और अन्य तरह के अतिक्रमण जैसी समस्याएं पैदा ही न हों। हालांकि यह सब जानते हैं कि राजनीतिक दल अपने वोटों की खातिर जहां-तहां ऐसी बस्तियां बसाते रहते हैं। यह समस्या कोई असम की नहीं, बल्कि पूरे देश में हैं। रेलवे इसका बड़ा उदाहरण है जिसकी खाली पड़ी जमीनों पर अवैध रूप से बस्तियां बसी हुई हैं।

दरांग के धौलपुर गोरुखुटी में सरकारी जमीन पर लोग कई सालों से रहे हैं। इस अवैध कब्जे के लिए अगर पूर्व की सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाए तो गलत नहीं होगा। लेकिन अब जब लोगों को हटाया जा रहा है तो उन्हें दूसरी जगह जमीन देना मौजूदा सरकार की जिम्मेदारी बनती है। वरना फिर कहीं अतिक्रमण होगा। राज्य के मुख्यमंत्री ने अतिक्रमण अभियान जारी रखने की बात कही है। यह होना भी चाहिए। पर असम ही नहीं, दूसरी राज्य सरकारों को भी भूमिहीनों की समस्या को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सवाल है कि जमीन नहीं मिलेगी तो लोग जाएंगे कहां?

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