POLITICS

समानता की बाधित राहें

हमारे यहां स्त्री सशक्तिकरण के जितने आंदोलन चले, वे मानसिकता को बदलने और व्यवहार में आई जड़ता को तोड़ने के लिए ही रहे।

पूनम पांडे

एक बार ऐसा हुआ था कि महिलाओं ने घरेलू काम की अनिवार्यता को लेकर जिद पकड़ ली और केवल एक चर्चा शुरू की जो महिलाओं को हर दिन दो समय रोटी बेलने को लेकर की गई थी। आंदोलनकारी स्त्रियों का कहना था कि एक औसत परिवार संभालने वाली महिला अपने गृहस्थ जीवन को निभाते हुए अनुमान लगा कर लगभग चार लाख रोटियां बेलती और सेंकती है। वास्तविक संख्या शायद इससे कहीं अधिक ही होगी।

मगर थोड़ी-बहुत बातचीत के बाद यह बात आई-गई हो गई। किसी पंचायत या सरकार ने यह समझने की जरूरत नहीं समझी कि जीवन भर अपनी रोज की दिनचर्या में हाड़ तोड़ देने वाली मेहनत करने वाली महिलाएं बस रोटी को लेकर ऐसी बात क्यों कर रही हैं। समझदारी और संवेदनशीलता दिखाई गई होती तो संकेत समझा जा सकता था कि यह समाज के लिए सोचने की बात थी और महिलाओं को इस रूप में अपना असंतोष वयक्त करना था।

दरअसल, विश्व समाज की यह एक विशेषता बन गई है कि परिवार और खानदान कला से जुड़ा रहेगा, पर उसके लिए यह विचार दरकिनार करने लायक लगेगा कि उसी घर में कोई महिला वंचना की शिकार तो नहीं हो रही। महिलाओं और उनके हक को लेकर कोई मुद्दा उठता भी है तो बार बार स्थगित हो जाता है। महिलाओं को भी लीक से हट कर चलना शायद अजीब लगता है।

इसीलिए बहुत बार ऐसा होता है कि पुरुष समाज के तर्क बाकी चीजों को महत्त्वपूर्ण बता कर एक स्त्री मन को समझना नहीं चाहता। ‘खुमारी और मायूसी’ औरत के लिए महज एक शब्द है, जादुई अहसास दिल में कहीं सिकुड़े से ही रहते हैं। इनको अभिव्यक्त करने का मतलब चरित्र पर सवाल।

आम भारतीय परिवारों मे आज भी स्त्री की परिभाषा वही है। सुंदर, व्यावहारिक, मीठी बोली, सहनशीलता, कार्य में गरिमा। चुनौतियां आएं तो हलचल नहीं। एक बेकार धारणा है कि औरत लोहे-सी मजबूत होती है। इसका मतलब अब यही लगता है कि स्त्री जितनी पीड़ित है, उससे ज्यादा पीड़ा सहने की क्षमता रखती है। सवाल है कि इस पीड़ा की सीमा कहां खत्म होती है? और यह वाक्य तो घिस-पिट चुका है कि स्त्री की सामंजस्य क्षमता औरों की तुलना में कहीं अधिक है। सोचती हूं कि अगर यह सच होता तो दुनिया भर में हर साल पच्चीस लाख से ज्यादा शादीशुदा महिलाओं के आत्मघात के मामले क्यों होते!

पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की संजीदगी से की गई शिरकत को रत्ती भर ही सम्मान मिल सका है। भोलापन, लापरवाही, नादानी और मूर्खता के लिए बेटे को लाड़ और एक औसत भारतीय बेटी को फटकार ही मिलती है। जबकि बेटी को भी तो यही एक नपा-तुला मनुष्य जन्म मिला है। पर किसी अनजान भय से महिला आज तक खुल कर नहीं खिल रही। एक महिला को पारिवारिक परिवेश में हमेशा व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर सजीव प्रस्तुति देनी होती है। समाज ने अभी औसत महिला को इतना प्यार नहीं दिया कि वह सिर उठा कर संवाद स्थापित करे।

आज भी राजधानी दिल्ली तक में युवतियों को सरेआम छींटाकशी, हिंसा, प्रताड़ना, छेड़छाड़ जैसी समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। एक सशक्त महिला के तौर पर हमारी कोई मजबूत नेता यह जरूर चाहती रही होंगी कि हर कोने से मजबूत महिलाएं नेतृत्व की क्षमता के साथ आगे आएं और बेहतरीन मुकाम हासिल करें। मगर कितनी अजीब बात है कि परंपरागत भारतीय समाज आज भी महिलाओं को लेकर रूढ़िवादी है।

दरअसल, जो समस्या रही है, वह दहलीज से बाहर भागदौड़ की दुनिया, कामकाजी संसार में उसके साथ होने वाले व्यवहार की है। हमारे यहां स्त्री सशक्तिकरण के जितने आंदोलन चले, वे मानसिकता को बदलने और व्यवहार में आई जड़ता को तोड़ने के लिए ही रहे। लेकिन इस दिशा में हमारा समाज कितना आगे बढ़ सका, सभ्य और संवेदनशील हो सका? आज के समय में हमारे देश में महिलाएं भले ही सानिया मिर्जा, मैरी काम, हिमा दास, पीवी संधू, कर्णम मल्लेश्वरी, प्रियंका चोपड़ा आदि में खुद को देखती हों, पर मूल रूप से हर महिला हर जगह पर उतनी भी सुरक्षित और सम्मानित नहीं दिखतीं, जितने अधिकार और अवसर उन्हें संविधान में दिए गए हैं।

हर सुबह खबरों में यह घोषणा होती है कि महिला समाज पीड़ित, प्रताड़ित और भयभीत है और अपने अस्तित्व को लेकर आशंकित भी है, जो निराधार भी नहीं है। जरूरत से ज्यादा परखने-जांचने और आजमाने की कोशिश ने महिला को भीतर से कहीं बागी भी बना दिया है। हमें महिला दिवस पर बैठक, सेमिनार, विचार गोष्ठी, आंदोलन, नारेबाजी के दिखावे के बजाय महिलाओं को एक आत्मविश्वासी जीवन के अवसर देने और लैंगिक असमानता से समानता के गलीचे पर चहलकदमी करने की आजादी मिले तो कमाल हो जाए। यह परिवर्तन इस लिहाज से भी महत्त्वपूर्ण है कि महिलाओं को अशिक्षित, असम्मानित और उपेक्षित छोड़ कर तरक्की की उम्मीद छलनी में पानी भरने जैसा होगा।

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