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संगरूर में कट्टर मुकाबले की बनती हवा

चार महीने के भीतर पंजाब की दो युवा हस्तियों—अभिनेता-एक्टिविस्ट दीप सिद्धू और गायक शुभदीप सिंह उर्फ सिद्धू मूसेवाला—की असामयिक मौत और उसके बाद उठा भावनाओं का ज्वार 23 जून को संगरूर में होने वाले लोकसभा उपचुनाव को प्रभावित कर सकता है. ‘कॉमेडी किंग’ और आम आदमी पार्टी (आप) के नेता भगवंत मान ने मार्च में धुरी क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीतने के बाद यह सीट खाली कर दी थी और उन्हें राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था. उपचुनाव से पहले लगभग सभी प्रत्याशी अपने भाषणों में इन दोनों दिवंगत शख्सियतों का नाम ले रहे हैं क्योंकि वे मतदाताओं की नब्ज को छूना चाहते हैं.

सिद्धू और मूसेवाला के पैतृक स्थानों पर उनकी अंतिम अरदास के लिए हजारों लोग उमड़ रहे हैं, ऐसे में कोई भी उम्मीदवार उन दोनों की मौत से उपजी भावनाओं को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकता. इससे होने वाले संभावित असर का अंदाजा अतीत की ऐसी दो सभाओं से लगाया जा सकता है. 1990 में श्री हरगोबिंदपुर के चीमा खुदी गांव में मारे गए खालिस्तानी आतंकवादी जुगराज सिंह उर्फ तूफान सिंह और बरगाड़ी (फरीदकोट) में कथित बेअदबी के खिलाफ बहबल कलां में हुए विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलियों से मारे गए दो सिखों की अरदास ने राज्य की सियासत पर काफी सर डाला था.

कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान 2021 में गणतंत्र दिवस पर लाल किले में तोडफ़ोड़ के लिए सिख युवाओं को उकसाने के आरोपी दीप सिद्धू की 15 फरवरी को एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी, जबकि 29 मई को मूसेवाला की गोली मारकर हत्या कर दी गई. दीप सिद्धू को खालिस्तान समर्थक माना जाता था और मूसेवाला ने कभी-कभार अलगाववादी भावनाओं को व्यक्त किया था. ऐसे में उनकी मौत ने कट्टरपंथी सिख भावनाओं को उद्वेलित किया है. इसके अलावा, मूसेवाला की हत्या से जुड़ी परिस्थितियों—एक दिन पहले ही उनकी सुरक्षा में कटौती कर दी गई थी—ने मुख्यमंत्री मान और उनकी सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी बढ़ा दी है. गायक के हत्यारों को पकड़ने और हत्या के साफ मकसद का पता करने में पंजाब पुलिस अब तक नाकाम रही है.

सुखबीर सिंह बादल के नेतृत्व वाले शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) ने संगरूर संसदीय क्षेत्र में ग्रामीण सिख आबादी की भावनाओं को भुनाने की उम्मीद में बब्बर खालसा इंटरनेशनल के आतंकवादी बलवंत सिंह राजोआना की बहन कमलदीप कौर राजोआना को मैदान में उतारा है. बलवंत को 1995 में तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी. साल 1995 में एसएडी के पुनर्गठन के बाद पहली बार पार्टी ने लोकसभा चुनाव में किसी उग्रवादी के परिवार के किसी सदस्य को उम्मीदवार बनाया है. लगभग 26 साल जेल में काट चुकने को आधार बनाते हुए मौत की सजा को आजीवन कारावास की सजा में बदलने संबंधी दोषी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को दो महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया है. राजोआना के साथ सहअभियुक्त जगतार सिंह हवारा और 1992 के चंडीगढ़ बम धमाके के आरोपी देविंदर पाल सिंह भुल्लर समेत 22 कैदियों की रिहाई के लिए बादल गांव-गांव जाकर अभियान चला रहे हैं. बादल कहते हैं, ”हम इस उपचुनाव का इस्तेमाल उन सभी बंदी सिखों का मामला उठाने के लिए कर रहे हैं जिन्होंने अपनी सजा पूरी कर ली है.” चुनाव प्रचारकों के पोस्टरों में जेल में बंद राजोआना की तस्वीरों को प्रमुखता से दिखाया जाता है.

बादल खेमे को लंबे समय से खालिस्तान समर्थक और एसएडी (अमृतसर) प्रमुख सिमरनजीत सिंह मान से मुकाबला करना होगा. 1999 में जीतने के बाद से हर चुनाव में मान इस सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. दीप सिद्धू और मूसेवाला दोनों ने 77 वर्षीय मान का समर्थन किया था. पूर्व आइपीएस अफसर और दो बार सांसद रहे मान शुरुआत में संयुक्त ‘पंथिक’ उम्मीदवार के लिए जोर लगा रहे थे तथा बादल भी उससे सहमत थे. लेकिन उम्मीदवारी को लेकर दोनों में बात नहीं बनी. इस साल के विधानसभा चुनावों में तकरीबन पूरी तरह सफाए के बाद बादल एसएडी की सियासी वापसी कराने के लिए बेताब थे. किसी बंदी सिख परिवार से उम्मीदवार उतारने की अकाल तख्त जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह की अपील के बाद बादल ने कमलदीप कौर पर दांव खेला. उन्होंने मान को उम्मीदवारी छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की पर नाकाम रहे.

वहीं, आप इस निर्वाचन क्षेत्र में भगवंत की लोकप्रियता पर भरोसा जता रही है और उसने पर्यावरणविद् और घराचों गांव के सरपंच तथा लो-प्रोफाइल शख्सियत गुरमेल सिंह को मैदान में उतारा है. उनका नाम सामने आने से पहले इस क्षेत्र में मुख्यमंत्री मान की बहन मनप्रीत कौर के पोस्टर हर जगह चस्पां हो गए थे, लेकिन दिल्ली में आप के नेतृत्व मे उनकी बजाय गुरमेल को चुना. अपने अभियान में गुरमेल, भ्रष्टाचार और माफिया पर लगाम लगाने के लिए मान सरकार के किए कार्यों की बात करते हैं, लेकिन स्थानीय मीडिया और लोगों की ओर से राज्य में बिगड़ती कानून-व्यवस्था के बारे में पूछे जाने पर वे कन्नी काट जाते हैं.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पंजाब में संगरूर एकमात्र ऐसा निर्वाचन क्षेत्र था, जिसने आप का सांसद चुना था. दिल्ली समेत देश के हर हिस्से में आप को हार मिली थी, लेकिन तब भी संगरूर के मतदाताओं ने उसका साथ नहीं छोड़ा था. ऐतिहासिक रूप से संगरूर ने हमेशा बदलाव के लिए मतदान किया है—2014 और 2019 में इस सीट से मान की जीत के पहले, केवल एसएडी के सुरजीत सिंह बरनाला एकमात्र अन्य नेता थे जिन्होंने लगातार चुनाव जीता था. हालांकि आप को यहां 2019 के प्रदर्शन को दोहराने का काफी भरोसा है. मार्च में विधानसभा चुनावों में संगरूर लोकसभा क्षेत्र के सभी नौ क्षेत्रों में 50 फीसद से अधिक वोटों के साथ मिली भारी जीत ने आप के इस भरोसे को बल दिया है.

विरोधियों का दावा है कि राज्य सरकार गुरमेल की मदद के लिए अपनी ताकत का इस्तेमाल कर रही है और मतदाता मान के ”खराब” शासन की सजा गुरमेल को देंगे. कांग्रेस ने धुरी में मान के खिलाफ विधानसभा चुनाव लड़ने वाले दलवीर सिंह खंगुरा उर्फ गोल्डी को यहां से मैदान में उतारा है. यह पुरानी पार्टी मूसेवाला को टिकट देना चाहती थी. पंजाब पीसीसी प्रमुख अमरिंदर सिंह राजा वारिंग कहते हैं, ”अब हम उनके इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं.” मूसेवाला की हत्या के बाद राहुल गांधी उनके परिवार से मिलने पहुंचे और उन्होंने मान सरकार पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने में नाकाम रहने का आरोप लगाया.

मूसेवाला की हत्या को इसका ज्वलंत उदाहरण बताते हुए भाजपा भी कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर आप सरकार की नाकामियों का मुद्दा उठा रही है. पार्टी ने 2019 में संगरूर से कांग्रेस के लिए चुनाव लड़कर दूसरा स्थान हासिल करने वाले केवल सिंह ढिल्लों को मैदान में उतारा है. उन्हीं की तरह पाला बदलने वाले पूर्व पीसीसी प्रमुख सुनील जाखड़ गांवों तक पहुंच बनाने में ढिल्लों की मदद कर रहे हैं. वहीं पूर्व मंत्री राणा गुरमीत सिंह सोढ़ी को इस सीट का प्रभारी बनाया गया है. पिछले चार चुनावों में यहां उपविजेता रहे—ढिल्लों, अरविंद खन्ना, सुखदेव ढींढसा और परमिंदर ढींढसा—के अपने खेमे में होने की वजह से भाजपा भी अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है. यह उपचुनाव दिखाएगा कि क्या संगरूर आप के साथ मजबूती से खड़ा है या किसी अन्य पार्टी को मौका देना चाहता है.

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