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संकट की कड़ियां

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महामारी से उपजी यह स्थिति कब तक रहने वाली है, कोई नहीं जानता।

सीरिंज में कोरोना टीका भरतीं हेल्थ वर्कर। (फोटोः पीटीआई)

महामारी से उपजी यह स्थिति कब तक रहने वाली है, कोई नहीं जानता। इस दौरान दुनिया के सामने कई चुनौतियां और अवसर, दोनों प्राप्त हुए हैं। महामारी ने पूरे विश्व के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचे को पूरी तरह से हिला कर दिया है, इसमें बच्चे और शिक्षा का क्षेत्र भी चपेट में आ गया है। इसके कारण सभी बच्चों को घर बैठना पड़ा, सभी स्कूलों को बंद करना पड़ा और इसके साथ आॅनलाइन शिक्षण को शुरू किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि बच्चों की कक्षा से दूरी बढ़ने लगी और बच्चों ने पढ़ाई में रुचि लेना कम कर दिया। कई सारे बच्चों ने बीच में ही स्कूल की पढ़ाई छोड़ दी। इसके कारण शिक्षा क्षेत्र का पूरा ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया और करोड़ों बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा।

दूसरी ओर, इसी बीच व्यापक सुधार करके शिक्षा प्रदान करने की संभावनाएं भी देखी जा रही हैं। उदाहरण के तौर पर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आॅनलाइन पोर्टल के साथ डायरेक्ट टू होम टीवी सेवा, सतत अधिगम के लिए रेडियो कार्यक्रम, सोशल मीडिया (वाट्सऐप, जूम, टेलीग्राम, यूट्यूब लाइव, फेसबुक लाइव, गूगल मीट आदि) माध्यमों से बच्चों तक अपनी पहुंच बनाने की कोशिश की। माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा के लिए दीक्षा पोर्टल शुरू किया गया, जिसमें बच्चों, अध्यापकों, अभिभावकों के लिए पाठ्य सामग्री और वीडियो तैयार कर डाले गए।

इसके अलावा, कक्षा पहली से दूसरी तक के बच्चों के लिए आॅनलाइन शिक्षण के तहत ई-पाठशाला ऐप शुरू किया, जिसमें सभी पुस्तकें, दृश्य-श्रव्य सामग्री, सभी विषयों पर कई भाषाओं में पढ़ने और पढ़ाने के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन भारत के ऐसे कई राज्य है जहां पर बिजली की बहुत कम या बिल्कुल भी सुविधाएं नहीं हैं। फिर ऐसे भी परिवार हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति कमजोर है और वे कम पढ़े-लिखे हैं।

ऐसे में उनके बच्चों के पास आॅनलाइन शिक्षा प्राप्त करने के लिए कई समस्याएं, जैसे- स्मार्टफोन और उसमें इंटरनेट जैसी सुविधाएं नहीं होना, सिग्नल की समस्या, स्मार्टफोन का सही से उपयोग करने में सक्षम नहीं होना आदि उत्पन्न हुई है। आॅनलाइन शिक्षण के कारण अध्यापकों का बच्चों से सीधा संवाद नहीं हो रहा है। पाठ्यक्रम पूर्ण हो कर भी अपूर्ण रह जा रहा है, जिसे हम उनके परीक्षा परिणाम में देख सकते है। महामारी ने पूरे विश्व के दैनिक क्रियाकलाप से लेकर लंबे समय तक पूरी न होने वाली योजनाओं को तहस-नहस कर दिया है। भविष्य में इसे ठीक करने के लिए लंबे समय तक प्रयास करने होंगे।


’रक्षा महाजन, मगांअंहिविवि, वर्धा, महाराष्ट्र

लोकतंत्र के पहिये

किसी भी लोकतांत्रिक देश में जिस तरीके से एक सफल सत्ता यानी सरकार का होना जरूरी है, उसी तरीके से एक ताकतवर विपक्ष का होना भी जरूरी है। भारत में मौजूदा भारतीय जनता पार्टी कि मोदी सरकार कहीं न कहीं एकाधिकार की तरह काम कर रही है। यह एक गंभीर समस्या है, क्योंकि एकाधिकार लोकतांत्रिक देश का दीमक है। भारत जैसे देश को विकसित होने के लिए दो पहियों की आवश्यकता है। एक पहिया है सत्ता-सरकार, तो दूसरा है विपक्ष।

सत्ता-सरकार तो अभी देश में मजबूती बनाए हुए है, लेकिन देश की दुर्दशा अभी यह है कि उसके पास कोई ऐसा विपक्ष नहीं, विपक्ष में कोई ऐसा नेता नहीं, जो देश के गंभीर मुद्दों पर सरकार को शत-प्रतिशत सटीक तथ्यों के साथ घेरे में लाए, जिससे सत्तापक्ष भी सोचने पर मजबूर हो जाए। ऐसे सुझाव दे, जिसके बिना देश की स्थिति वाकई चिंताजनक हो सकती है एक सफल विपक्ष की निशानी यह है कि वह समय-समय पर सरकार को उसके कामों के प्रति संसद में और इसके माध्यम से देश की जनता के सामने उसको घेरे। देश की जटिल समस्याओं से उनका संपर्क करवाएं। लेकिन आज का विपक्ष अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है या कहिए अपनी शक्ति भूल गया है। सवाल है कि एक सफल विपक्ष कहां है!विपक्षी नेता के ऐसे बयान, जिस पर सत्ता पक्ष को भी सोचने के लिए एक पल रुकना पड़े, वे सवाल कहां हैं?


’सर्वेश, कल्याणपुर, लखनऊ, उप्र

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