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शक्ति संचय का काल नवरात्र

वैदिक चिंतन कहता है कि मां आदिशक्ति के बिना समस्त देवशक्तियां अपूर्ण हैं।

पूनम नेगी

वैदिक चिंतन कहता है कि मां आदिशक्ति के बिना समस्त देवशक्तियां अपूर्ण हैं। शक्ति यानी भयमुक्ति। हमारे ऋषियों ने आदिशक्ति की इसी गौरव गरिमा को समाज में प्रतिष्ठित करने के लिए ऋतु परिवर्तन की बेला में नवरात्र साधना का विधान बनाया। जानना दिलचस्प होगा कि भारत की सनातन वैदिक संस्कृति की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि पूजा-उपासना व विविध धार्मिक कर्मकांडों से सजे विविध पर्व-त्योहारों आत्मिक उत्कर्ष के साथ सामाजिक समसरता का भी बड़ा सन्देश देते हैं। चेतना के क्षेत्र में सुसंस्कारिता का संवर्धन हमारे देवपर्वों का युगों-युगों से कार्यक्षेत्र रहा है। निर्मल आनन्द के पर्याय हमारे सांस्कृतिक पर्व वस्तुत: लोकजीवन को देवजीवन की ओर उन्मुख करते हैं। भारत के इन सांस्कृतिक पर्वों में सबसे ज्यादा लोकप्रिय हैं नवरात्र।

हिन्दू दर्शन में नवरात्र काल को शक्ति संचय की दृष्टि से अति विशिष्ट माना जाता है। शक्ति उपासना के इस विशिष्ट साधनाकाल में साधक आदिशक्ति की उपासना के साथ नारी शक्ति की गरिमा को साकार रूप देते हैं। इन नौ दिनों में भगवती दुर्गा के नौ रूपों की आराधना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की जाती है। देवी साधक प्रतिप्रदा से नवमी तक मां शक्ति के नौ रूपों शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री की पूजा आराधना करते हैं। भगवती के इन नौ रूपों के पूजन के कारण ही इस अवधि को नवरात्र काल कहा जाता है।

नवरात्र की अमृत बेला में मूल रूप से मां शक्ति की उपासना का विधान है। मां दुर्गा का स्वरूप वस्तुत: शक्ति का विश्वरूप है और नवरात्र का अनुष्ठान शक्ति के साथ मर्यादा का अनुशासन और मां के सम्मान का संविधान। देवी आराधना का यह उत्सव मांदुर्गा की नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के रूप में सनातन काल से मनाया जा रहा है। सनातन धर्म में देवी दुर्गा के नौ रूप उनके शक्ति वैविध्य का ही विस्तार है। सच भी है कि शक्ति के बिना लोकमंगल का कोई भी प्रयोजन सफल नहीं हो सकता। यही वजह है कि हमारे यहां शक्ति के बिना शिव को ‘शव’ की संज्ञा दी गई है। शक्ति ही चेतना है, सौन्दर्य है, इसी में संपूर्ण विश्व निहित है। देवी दुर्गा शक्ति की अपरिमितता की द्योतक हैं। जिस तरह युद्ध के संकट काल में दुर्ग में रहने वाले लोग सुरक्षित बच जाते हैं, ठीक उसी तरह मां दुर्गा की शरण में आए हुए की दुर्गति कदापि नहीं हो सकती। दुर्गा शब्द का यही निहितार्थ है। इसीलिए वे दुर्गति नाशिनी कहलाती हैं।

मातृ शक्ति के इसी सृजनात्मक व दिव्य स्वरूप को प्रतिष्ठित करने के लिए मार्कण्डेय ऋषि ने देवी भागवत पुराण में अलंकारिक भाषा शैली में विविध रोचक कथा प्रसंगों की संकल्पना की है। ‘दुर्गा सप्तशती’ में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में की गई है। मां जगदम्बा के इस महात्म्य को वर्तमान संदर्भों में देखें तो पाएंगे महिषासुर पाशविक प्रवृत्तियों का प्रतीक है। जब-जब मानव समाज में सात्विकता व नैतिकता का हृास होता है तब-तब पाशविक प्रवृत्तियां सिर उठाकर संसार में हाहाकार मचाती हैं।

मां दुर्गा का वाहन सिंह बल का, शक्ति का, निर्भयता का प्रतीक है। उनके दस हाथ दस दिशाओं में शक्ति संगठन के सूचक हैं। इसी तरह यह भी समझना चाहिए कि प्रत्येक असुर एक दुष्प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिनका विनाश दुर्गा जैसी दुर्गतिनाशिनी शक्ति के द्वारा ही हो सकता है। शास्त्रीय मत से मनुष्य में मुख्य रूप से तीन प्रवृतियां होती हैं- सात्विक, राजस एवं तामस। जब तामसिक प्रवृत्तियां प्रबल होती हैं तो मनुष्य उदात्त दैवी गुणों से, सात्विक वृत्तियों से दूर हो जाता है, उसमें पाशविकता प्रबल हो उठती है। शुंभ-निशुंभ, मधु-कैटभ आदि असुर और कुछ नहीं; हमारे भीतर स्थित आलस, लालच और घमंड जैसी दुष्प्रवृत्तियां ही हैं।

हिन्दू दर्शन में ‘नवरात्र’ को सर्वाधिक फलदायी साधनाकाल माना जाता है। जिस प्रकार ईश्वर की आराधना के लिए प्रात:काल की ब्रह्मबेला सर्वोत्तम मानी जाती है, ठीक उसी तरह नवरात्रिक साधना काल को अध्यात्म के क्षेत्र में विशिष्ट मुहूर्त की मान्यता प्राप्त है। ऋतु परिवर्तन की यह बेला वस्तुत: साधना के द्वारा शक्ति संचय की मानी जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए वैसे तो किसी अवसर विशेष की बाध्यता नहीं होती लेकिन नवरात्र बेला में किए गए उपचार संकल्प बल के सहारे शीघ्र गति पाते तथा साधक का वर्चस्व बढ़ाते हैं। हमारे तत्वज्ञ मनीषियों की मान्यता है कि इस समय वायुमंडल में दैवीय शक्तियों के स्पंदन अत्यधिक सक्रिय होते हैं तथा सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह भी इन दिनों तेजी से उभरते व मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं।

इसीलिए हमारे ऋषियों ने इस संधिकाल को मां शक्ति की आराधना से जोड़कर देवत्वपूर्ण बना दिया। नवरात्र की प्रासंगिकता ही उसकी सदुपयोगिता में है। नवरात्र के नौ दिन मन, वाणी, कर्म तीनों में शुद्धता लाते हैं। इसकी साधना आत्मा, मन और शरीर का शोधन करती है। यों तो आज के आपाधापी और तेजी से दौड़ते समय में आम आदमी के पास न तो कड़ी तपश्चर्या का समय है और न ही उतना सुदृढ़ मनोबल, फिर भी आध्यात्मिक विभूतियों की मान्यता है कि यदि नौ दिनों की इस विशेष अवधि में जब वातावरण में परोक्ष रूप से देवी शक्तियों के अप्रत्याशित अनुदान बरसते रहते हैं, संकल्पित साधना की जा सके तो उससे चमत्कारी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

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