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विक्रेता संस्कृति की पहचान

बाजार वालों को इंतजार डेंगू का था, इसके बाद चिकनगुनिया के आने की हांक दी जाती थी।

सुरेश सेठ

बाजार वालों को इंतजार डेंगू का था, इसके बाद चिकनगुनिया के आने की हांक दी जाती थी। यह बीच से कोरोना कहां से आ गया? एक लहर जाती है तो दूसरी चली आती है! सरकारी बाशिंदे इसको नमस्कार करने की बात कहते हैं और चिकित्सा विशारद इसके अभी भी विदा न होने की चेतावनी देते हैं। नया जमाना है! आजकल हर चीज रूप बदल कर प्रकट होती है और अपने बिकने की हांक देने लगती है। बेचने के लिए ग्राहकों को जुटाना एक ऐसी ललित कला में तब्दील हो गया है कि आजकल इसके नाम दुनिया की इस छत के नीचे किसी भी चीज को बेच डालते हैं।

मैं संगीत की बात नहीं कर रहा कि जहां कभी दर्द भरे नगमे सोज भरी आवाजें लोगों का दिल लूट लेती थीं। आजकल तो हुड़दंगी आवाजें ऐसा रैप संगीत पेश करती हैं, जिसके साथ भागते हुए आपको उसकी लय और ताल का पता ही नहीं लगता। लोगों को नाचने और झूमने पर विवश कर देता है। अब भरत नाट्यम और कूचीपड़ी पर थिरकने वालों को तो लगता है जैसे वह मोहनजोदड़ो की खुदाई के अवशेष हैं। आजकल तो इनकी प्रशिक्षण की दुकानें भी मानो किसी भूतकाल से तरन्नुम उठाती हैं, जैसे कहती हों कि जो बेचते थे दर्द-ए-दिल, वह दुकां अपनी बढ़ा गए!

बस यही बुरी आदत है हमारी कलम को। किस्सा बीमारियों की आमद के धूम-धड़ाके का करना था और जिक्र करने लगे डिस्को फीवर का, रैप संगीत की द्रुत लय का। देश में आजकल अतीत की गरिमा के वरदान के साथ भारतीयता जगाने के प्रयास हो रहे हैं और हम चिल्लाते हुए विकास की द्रुत गति में फंस गए। अब नए-नए चक्रव्यूह रच कर इन्हें आधुनिक शीर्षक दे दिए जाते हैं। इन्हें न आज का कोई अर्जुन भेद पाता है और न ही उसका अभिमन्यु। अब तो यहां माइकल जैक्सन भी याद नहीं किए जाते।

वह भी संगीत की इन नई सुरों के जंगल में भटके दिवगंत हो गए। अब मजे से बेसुरे अपनी आवाज से बाजार लूट रहे हैं। ऐसे ही लगता है इन बीमारियों का बाजार। कभी सिरदर्द, खांसी-जुकाम और बुखार मौसम के हिसाब से अपने रोगी बटोरते थे। सीधी सादी दो-चार दवाइयां मरीजों का दुख हर लेती थीं, लेकिन जल्दी ही बाजारों ने करवट बदली। अब ऐसी महामारियों की तलाश होने लगी जिनके नाम भी किसी की समझ में न आएं और इनकी दवाइयां ऐसी फिरंगी हो जाएं कि किसी देसी दुकान में न पाई जाएं और पिछड़ी सदी के इन मरीजों को न ठीक कर पाएं। वे ठीक हो जाएं तो अपनी कला से और महाप्रयाण की नौबत आ जाए तो कभी मुड़के न देखें।

यह नई सदी है। नई तरह के बाजार विकसित होने लगे हैं। यह महामारियों का बाजार है। इससे पहले हम संगीत के बाजार में भटक गए थे। हां, किताबों का बाजार तलाश करने नहीं जाना है। यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम और ट्विटर के युग में आजकल पुस्तक बाजार कौन तलाश करता है? मोबाइल, वीडियो और लैपटॉप के बाजार से फुर्सत मिले तो पुस्तकों के बाजार का रुख करें। यारों ने ‘कैप्सूल’ के नाम पर प्राचीन से लेकर अर्वाचीन तक हर तरह का रकबा एक पेन-ड्राइव में बंद कर दिया। पुस्तक संक्षेप चिरंजीवी हो गए और पुस्तकें मूल्य देख कर नहीं, तोल कर बिकने लगीं। इसमें भी विदेशी भाषा का वर्चस्व कायम है। अंग्रेजी में रचना प्रतिष्ठासूचक है, इसलिए उनका मोल-भाव नहीं होता। वह महंगे दाम में बिकता है। देसी पुस्तकों को चाहे पुराने युग का खजाना कह लो, उन्हें खरीदने वाले नहीं मिलते।

समय ने मुखौटा बदला। पुराने बाजारों में उल्लू बोलते हैं। विक्रय कला के नए ज्योति स्तंभ नए बाजारों का सृजन कर रहे हैं। पहले विकास बाजार बने थे। नारों से बेचने वाले हांक लगाते थे। कहते थे कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं। हर हाथ को काम मिलेगा। हर दाम पर बढ़िया माल।’ लेकिन अंधे कुएं में चिल्लाओ तो अपनी आवाज ही लौट कर आती है। बहुत दिन तक उसकी प्रतिध्वनि सुन कर चमत्कृत होते रहे, लेकिन खाली आवाज पेट नहीं भरती, इसलिए इन नारों को स्थगन की राजनीति में डाल दिया गया। अब सजे हैं नए बाजार। तनाव और दहशत बेचने के बाजार, इस दिलासा के साथ कि देखो, हर कठिन समय में हम तुम्हें उबारेंगे। इसलिए आओ और हमारी छतरी के नीचे बैठ जाओ। इस छतरी के पीछे भय का सैलाब है। आंतकियों के पागल प्रवाह का भय है और राष्ट्रीयता का टकसाली सिक्का है जो इन बाजारों का सिपाहसालार है।

लेकिन इतने से काम नहीं चलता। इसलिए इस दहशत के नेपथ्य में महामारियों का शक और बाजार खड़ा होने लगा। महामारी के विषाणु की कहानी इसमें ठीक बैठती है। शत्रु इसके बम बना रहा था, विषाणु उसकी पकड़ से निकल भागे। बहरहाल, बीमारी से सावधानी भली। बाजारों ने अपना काम शुरू भी कर दिया है। इस बाजार के सबसे अहम औजार छपी कीमत से पांच गुणा दाम पर भी मिल जाएं तो यह सहज है। विकास है, बदलते युग की पहचान है। आइए, इस पहचान का सजदा करें।

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