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राजनेताओं पर कितना प्रभावी उड़ीसा उच्च न्यायालय का निर्णय?

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क्या समय आ चुका है कि चुनाव के दौरान तथाकथित राजनीतिक पार्टियों द्वारा जानबूझकर किए गए झूठे वादों को कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए?

जनसत्ता ऑनलाइन

नई दिल्ली | Updated: August 10, 2021 8:27 PM

नई दिल्ली में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ता बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए। (Photo Source – PTI)

अभिनव नारायण झा एवं अनुराग तिवारी। एक केस की सुनवाई करते हुए उड़ीसा उच्च न्यायालय ने हाल ही में माना है कि बेरोजगारी शब्द युवाओं के लिए मौत की आहट की तरह है। इसके साथ ही न्यायालय ने कहा कि नौकरी देने के बहाने उनके साथ धोखा करना, यह सर्वोच्च आदेश के खिलाफ है। कड़ी टिप्पणी के माध्यम से कोर्ट ने कहा कि जब एक शिक्षित युवा अपने लिए कोई उपयुक्त नौकरी नहीं ढूंढ़ पाता है तो उसपर दुःख का पहाड़ टूटने लगता है। इस पीड़ा से बाहर निकालने और समुचित मदद करने की बजाय कोई भी व्यक्ति या दल नौकरी दिलाने के बहाने छल करता है तो यह सर्वोच्च कोटि का अपराध है।

न्यायालय के द्वारा दिए गए निर्णय के मूल तत्वों को देखने के बाद आइए विस्तार से झूठे वादों पर चर्चा करते है। आइए समझने की कोशिश करते है कि कैसे एक झूठा वादा धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है, इसलिए यह कृत्य आपराधिक रूप से दंडनीय है। वास्तव में न्यायालय भी यही कहना चाहती थी! आप किसी व्यक्ति को कुछ ऐसा करने के लिए उत्प्रेरित करते है जो किप व्यक्ति को सच्चाई पता चले तो वह बिल्कुल भी ऐसा नहीं करेगा, तो आप सीधे तौर पर उस व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से नुकसान पहुंचा रहें है। सुनना आसान लगता है ना? है ना? लेकिन ऐसा वास्तव में है नहीं।

इस लेख के उद्देश्य की महत्ता तभी सफल हो पाएगी जब उड़ीसा उच्च न्यायालय द्वारा पारित आदेश और चुनाव प्रचार के दौरान झूठें वादे करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं को एक चश्में से देखा जाएगा। जानबूझकर या यूं कहें कि षड्यंत्र के तहत चुनावी अभियान में झूठे वादे किए जाते है। यह एक प्रकार का राजनीतिक षड्यंत्र भी है। अफसोस है कि आज तक इस विषय पर गंभीरता से संज्ञान नहीं लिया गया और न ही इसके खिलाफ कोई कार्रवाई हुई।

इसे विडंबना ही कहिए कि देश में कोई तंत्र मौजूद नहीं है, जो चुनाव से पहले नेताओं द्वारा किए गए ऐसे वादों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाने में मदद कर सकें। न ही हमारे कानून में कोई ऐसा प्रावधान है जो चुनाव के दौरान किए गए झूठे वादों पर रोक लगाता हो और उसे दंडित भी करता हो। तो सवाल यह उठता है कि क्या चुनावी अभियान के दौरान किए गए वादे आम तौर पर किए जा रहे वादों से अलग है? अगर अलग है तो क्यों? अगर नहीं है तो क्या ऐसे झूठे वादों को दण्डित करने के लिए कानूनी तंत्र होने चाहिए?

पिछले दो दशकों के घटनाक्रम पर नज़र दौड़ाया जाएं तो भारत में बेरोज़गारी पर कई चुनावी वादों की एक श्रृंखला मिलेगी। आसान शब्दों में कहा जाएं तो झूठ का पुलिंदा। विल रोजर्स का कथन है कि राजनेता के द्वारा किया गया वादा उस कागज़ के काबिल नहीं होता जिसपर वह लिखा होता है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी ने चुनावी अभियान में नौकरियों का वादा किया और साल 1999 में सत्ता में आएं। इसके बाद उन्होंने क्या किया? महज मोंटेक सिंह अहलूवालिया के नेतृत्व में रोजगार के अवसरों पर एक टास्क फोर्स का गठन किया और इस टास्क फोर्स ने एक साल में एक करोड़ नौकरियां प्रदान करने का सुझाव दिया। इसके बाद सरकार ने दस लाख रोजगार के अवसरों को लक्षित करने के लिए एसपी गुप्ता की अध्यक्षता में एक और विशेष समूह की स्थापना की। बाद में रिपोर्ट नौकरशाही की हवा में गुमनाम हो गया और फिर वाजपेयी की सत्ता चली गई।

कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए ने भी यही वादा किया था। गठबंधन के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में आई और 10 वर्षों तक सत्तासीन रही। इसके बाद 2013 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश के आगरा में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो एक साल में एक करोड़ नौकरियां दी जाएगी। वहीं वादा जो 1999 में वाजपेयी ने किया था।

हालांकि भाजपा प्रचंड बहुमत से 2014 में चुनाव भी जीतती है और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री भी बनते है। लेकिन एक चीज जो कभी नहीं बदली वह बेरोजगारी की स्थिति। हालांकि वर्तमान में बेरोजगारी दर अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुका है। कोरोना महामारी से पहले भी बेरोजगारी दर काफी भयावह थी और उसके बाद तो स्वाभाविक रूप से स्थिति और बिगड़ती चली गई।

आज हजारों की संख्या में युवा बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे है। कई मानसिक रूप से जद्दोजहद कर रहे है और कईयों को जीवित रहने के लिए अपनी संपत्ति तक बेचनी पड़ रही है। यह उन लाखों युवाओं के तन, मन, प्रतिष्ठा और संपत्ति की वास्तविक क्षति है, जिन्हें झूठें वादों की वजह से अपमानित होना पड़ रहा है। ताज़्जुब की बात है कि सभी प्रायोजित है।

चुनाव एक वैध मानक है जिससे जनता का भरोसा सरकार पर कायम रहता है। इसके पीछे की वजह इसकी प्रक्रिया में लोगों का विश्वास होना है। चुनाव को लोग सम्मान की भावना से देखते है क्योंकि लोगों को लगता है कि यह स्वतंत्र और निष्पक्ष रूप से मतदान करने का अधिकार देता है। लेकिन इसके उलट चीजें जो धीरे धीरे ही सही लेकिन सच होती जा रही है।

अगर किसी मतदाता के वोट देने के लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ छलावा किया जाता है, तो यह पूरी चुनाव प्रक्रिया के साथ साथ लंबे समय के लिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाता है। इससे नागरिकों में अविश्वास, आत्मविश्वास में कमी और मोहभंग पैदा होता है।

चुनाव के दौरान प्रायोजित तरीके से झूठे वादों से मीडिया में आने वाली खबरें भी अविश्वसनीयता पैदा करती है। इससे मतदाता को भी राय बनाने में दिक्कतें आती है। कानूनी दायित्व मुख्य रूप से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सम्मान का भाव सुनिश्चित करता है। भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की गई आदर्श आचार संहिता में आमतौर पर दिशानिर्देश दिए हुए होते है, जो विभिन्न राजनीतिक पार्टियों को घोषणापत्र में ऐसा वादा करने से रोकते है जिससे मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव डाला जा सकें। हालांकि यह संहिता कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में ‘भ्रष्ट आचरण’ को परिभाषित किया गया है और इसमें उम्मीदवार के द्वारा किए गए वादों को भी शामिल किया गया है। हालांकि पब्लिक पॉलिसी को इससे दूर रखा गया है और इसपर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

सबसे चिंतनीय विषय है कि न्यायालयों ने भी इसपर कभी ध्यान नहीं दिया। साल 2015 में एक जनहित याचिका दायर की गई थी। इसमें मुख्य रूप से चुनाव से पहले किए गए वादों के लिए राजनीतिक दलों को जवाबदेह ठहराने पर जोड़ दिया गया था। इस याचिका पर जवाब देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चुनाव के समय किए गए अधूरे वादों के मामलों पर फैसला करना न्यायालय का काम नहीं है। ऐसा करने के लिए न्यायालय कानूनी रूप से बाध्य नहीं है। न्यायालयों और कानूनों द्वारा इस स्थिति को बदलने की सख़्त ज़रूरत है। इसके साथ ही जवाबदेही भी तय करने की आवश्यकता है। ऐसा नहीं होता है तो आने वाले समय में लोकतंत्र और कानून दोनों के लिए खतरा पैदा होना तय है।

चुनाव के समय विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा जनता को खूब लुभाया जाता है। या यूं कहें कि उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जाता है। यह सिलसला कोई आज की बात नहीं है, वर्षों से जनता के नब्ज़ को पकड़कर उनपर वार किया जाता आ रहा है। जरूरत है ऐसे झूठें वादों और आधारहीन वादों पर एक पूर्ण विराम लगाने की। जरूरत है चुनाव के समय धड़ल्ले से इस्तेमाल होने वाली झूठें वादों पर रोक लगाने की, जरूरत है इसपर न्यायालय को कड़े रूप से संज्ञान लेने की। आने वाले समय में इसे रोकना मानवीय मूल्यों के लिए बेहतर कदम होगा।

Abhinav Narayan Jha and Anurag Tiwari लेखक विधि एवं कानून के जानकार और राजनीतिक विश्लेषक है। यह लेखक के निजी विचार है। आप [email protected] पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते है।

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