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राजनीति में रंजिश

महाराष्ट्र में जिस तरह राज्य सरकार ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए नारायण राणे को गिरफ्तार कराया और शिवसैनिकों ने जगह-जगह उपद्रव किए, वह बदले की राजनीति का एक नया अध्याय है।

महाराष्ट्र में जिस तरह राज्य सरकार ने अपनी ताकत का प्रदर्शन करते हुए नारायण राणे को गिरफ्तार कराया और शिवसैनिकों ने जगह-जगह उपद्रव किए, वह बदले की राजनीति का एक नया अध्याय है। नारायण राणे ने जन-आशीर्वाद यात्रा के दौरान उद्धव ठाकरे को थप्पड़ मारने वाला बयान दिया था। इसे लेकर शिवसेना के कार्यकर्ता उत्तेजित हो गए, उन्होंने नारायण राणे के घर पर पथराव किया, भाजपा के दफ्तर में आगजनी की। उद्धव ठाकरे ने अपनी पुलिस दौड़ा दी और आखिरकार राणे को गिरफ्तार करा लिया।

इसमें दोनों तरफ से मर्यादाएं टूटीं। नारायण राणे केंद्र में मंत्री हैं, इसलिए एक राज्य सरकार द्वारा उन्हें इस तरह गिरफ्तार कराए जाने पर चौतरफा सवाल उठे। किसी मंत्री को गिरफ्तार करने के लिए कुछ नियम-कायदों का पालन करना पड़ता है, मगर उनका ध्यान नहीं रखा गया। जाहिर है, राज्य सरकार अपनी ताकत का प्रदर्शन करने और नारायण राणे को सबक सिखाने की हड़बड़ी में अधिक थी। हालांकि मर्यादा पालन की अपेक्षा नारायण राणे से भी की जाती थी। राजनेता अपने प्रतिपक्षियों पर कटाक्ष और उनकी कमियों को उजागर करते ही रहते हैं। मगर, एक केंद्रीय मंत्री का दायित्व निभा रहा व्यक्ति जब किसी मुख्यमंत्री को थप्पड़ मारने की बात कहे, तो वह केवल उसकी व्यक्ति भावना का मामला नहीं रह जाता, अंगुलियां सरकार पर भी उठती हैं।

हालांकि नारायण राणे और उद्धव ठाकरे के बीच की तल्खी को समझना मुश्किल नहीं है। राणे पहले शिवसेना में ही थे और बाला साहब ठाकरे के पसंदीदा नेताओं में थे। बाला साहब उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में देखते थे। मगर उनके देहांत के बाद स्थितियां बदलीं और उद्धव ठाकरे ने पार्टी की कमान संभाली तो नारायण राणे का उनसे मनमुटाव रहने लगा। राणे ने उद्धव ठाकरे को पार्टी की जिम्मेदारी सौंपने का विरोध किया था। जाहिर है, राणे का शिवसेना में रहना मुश्किल हो गया और उन्होंने पार्टी छोड़ दी।

वहां से वे कांग्रेस में गए, फिर अपनी पार्टी बनाई और अंतत: भाजपा का दामन थामा और राज्यसभा में पहुंच कर मंत्री बने। भाजपा और शिवसेना के बीच की तल्खी भी छिपी नहीं है। जबसे शिवसेना ने उससे अलग होकर सरकार बनाई है, भाजपा उसे हजम नहीं कर पाती। भाजपा राणे का इस्तेमाल शिवसेना की शक्ति क्षीण करने के लिए करना चाहती है। राणे के मन में वही पुरानी खुन्नस और उद्धव के प्रति नाराजगी भरी रही होगी, जो सार्वजनिक रूप से इस तरह निकली। उद्धव ठाकरे के मन में भी राणे के प्रति बदले की भावना का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं। मन में बारूद भरा हो, तो उसके फटने के लिए एक चिनगारी काफी होती है। बस, नारायण राणे के बयान ने चिनगारी का काम किया।

हालांकि यह कोई पहली और अकेली घटना नहीं है, जब राजनीति में रंजिश इस तरह शक्ति प्रदर्शन करके निकाली गई। कुछ दिनों पहले पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान और उसके बाद की घटनाएं भी इसी रंजिश की निशानी हैं। पिछले कुछ सालों में इस तरह अपनी राजनीतिक रंजिश निकालने के लिए बदले की कार्रवाई की घटनाएं बढ़ी हैं। सरकारों और राजनीतिक दलों के शीर्ष पदों से अशोभन और अमर्यादित बयानों के भी अनेक उदाहरण हैं। इस तरह की घटनाओं से समाज में गलत संकेत जाते हैं। राजनीति में प्रतिद्वंद्विता स्वाभाविक है, यह एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जरूरी भी है, मगर वह व्यक्तिगत रंजिश की तरह फूटे और उसे साधने के लिए सत्ता-बल का प्रयोग किया जाए, तो उसे किसी भी रूप में उचित नहीं कहा जा सकता।

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