POLITICS

राजनीति के किरदार और किस्से

37 मिनट पहलेलेखक: राजेश साहू

बात 1953 की है। प्रतापगढ़ में राम मनोहर लोहिया भाषण दे रहे थे। उन्होंने कहा, “लड़के को तैराकी सिखानी है तो पानी में छोड़ना होगा। हमेशा हाथ पकड़े रहोगे तो वह कभी तैरना सीख नहीं पाएगा।” चंद्रशेखर भाषण के बीच उठे और कहा, “आपने तैराकी के तीन पॉइंट्स बताए, एक चौथा पॉइंट नेचर ऑफ वाटर भी है। आपने चर्चा नहीं की। अगर पानी की धारा तेज हो और लड़का उतरे तो वह बह जाएगा। पानी स्थिर हो और उसमें मगरमच्छ हो तो वह लड़के को खा जाएगा।” लोहिया निरुत्तर हो गए।

राजनीति के किरदार और किस्से सीरीज की 11वीं कहानी में आज बात चंद्रशेखर के उन जवाबों की, जो यह दिखाता है कि उन्होंने कभी गलत के साथ समझौता नहीं किया। हक के लिए लड़े और जीते। सबसे पहले बात कांग्रेस में शामिल होने की।

कांग्रेस में शामिल होने जिस ट्रेन से चंद्रशेखर गए उसी पर इंदिरा गांधी भी थी

अपनी आत्मकथा ‘जीवन जैसा जिया’ में चंद्रशेखर लिखते हैं, 1964 में मैंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी छोड़ दी। कांग्रेस में शामिल होने से पहले गुजरात गया। वहां महुआ क्षेत्र में एक सभा हुई। सभा के आयोजक छबीलदास मेहता और यशवन्त मेहता थे। इस सम्मेलन में शामिल होने के लिए जिस ट्रेन पर मैं था, उसी में इंदिरा गांधी भी थीं, लेकिन हमारी मुलाकात सम्मेलन के मंच पर हुई।

गुजरात के महुआ में इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर पहली बार मिले थे।

गुजरात के महुआ में इंदिरा गांधी और चंद्रशेखर पहली बार मिले थे।

मंच पर एक व्यक्ति ने चंद्रशेखर की तरफ उंगली दिखाते हुए कहा, “ये चंद्रशेखर हैं।” इंदिरा ने जवाब दिया, “मैंने नाम तो बहुत सुना है।” चंद्रशेखर ने तुरंत कहा, “मैंने भी आपका नाम बहुत सुना था, लेकिन कभी मुलाकात का अवसर नहीं मिला।” मंच पर दोनों ने अपने-अपने भाषण दिए और कार्यक्रम समाप्त करके चले गए। उन दिनों महुआ में कांग्रेस के नेता शाम को बैठते थे। एक दिन चंद्रशेखर भी पहुंचे।

इंदिरा गांधी के अलावा वहां इंद्रकुमार गुजराल, अशोक मेहता, गुरुपदस्वामी मौजूद थे। लॉन में सभी बैठे थे, तभी इंदिरा गांधी ने मुझसे पूछा, “क्या आप कांग्रेस को समाजवादी मानते हैं?”

चंद्रशेखर ने कहा, “मैं नहीं मानता कि कांग्रेस समाजवादी संस्था है, पर लोग ऐसा कहते हैं।”

इंदिरा ने पूछा, “फिर आप कांग्रेस में क्यों आए?”

“क्या आप सही उत्तर जानना चाहती हैं?”

“हां, मैं यही चाहती हूं।”

चंद्रशेखर ने कहा, “मैंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी में 13 साल ईमानदारी और पूरी क्षमता के साथ काम किया। काफी समय काम करने के बाद पता चला कि पार्टी कुंठित हो गई है। अब यहां कुछ होने वाला नहीं है। फिर मैंने सोचा, कांग्रेस बड़ी पार्टी है, चलते हैं इसमें कुछ करते हैं।”

इंदिरा ने फिर पूछा, आखिर आप करना क्या चाहते हैं?

चंद्रशेखर ने जवाब दिया, मैं कांग्रेस को सोशलिस्ट बनाने की कोशिश करूंगा।

इंदिरा बोलीं- अगर न बनी तो?

चंद्रशेखर ने हैरान करने वाला जवाब दिया। कहा, “कांग्रेस को तोड़ने का प्रयास करूंगा। क्योंकि यह जब तक टूटेगी नहीं , देश में कोई नई राजनीति नहीं आएगी। पहले तो मैं समाजवादी ही बनाने का प्रयास करूंगा, लेकिन अगर नहीं बन पाई तो तोड़ने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।” चंद्रशेखर के जवाब को सुनकर इंदिरा हैरान थी। उन्होंने कुछ नहीं बोला सिर्फ देखती रहीं।

चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी से कहा, मैं कांग्रेस को समाजवादी बनाने की कोशिश करूंगा, नहीं बना पाया तो इसे तोड़ दूंगा।

चंद्रशेखर ने इंदिरा गांधी से कहा, मैं कांग्रेस को समाजवादी बनाने की कोशिश करूंगा, नहीं बना पाया तो इसे तोड़ दूंगा।

इंदिरा गांधी की तरह चंद्रशेखर ने राम मनोहर लोहिया को भी सख्त लहजे में जवाब दिया था। हम यहां दो घटना जानेंगे। पहली घटना आपने सबसे ऊपर ही पढ़ ली है। अब दूसरी की बात करते हैं।

दमा के अटैक ने चंद्रशेखर के सम्मेलन का मुख्य अतिथि बदल दिया

चंद्रशेखर के इंटरव्यू पर आधारित ‘रहबरी के सवाल’ किताब में राम बहादुर राय लिखते हैं, चंद्रशेखर को बलिया के ददरी मेले में एक सम्मेलन करना था। मुख्य अतिथि के तौर पर आचार्य नरेंद्र देव को जाना था, लेकिन उन्हें दमा हो गया। चंद्रशेखर इलाहाबाद में उनके घर पहुंचे तो बगल में ही लोहिया बैठे थे। आचार्य ने कहा, चंद्रशेखर इन्हें ले जाओ। ये सम्मेलन में बोलेंगे।

चंद्रशेखर और लोहिया हैरान रह गए। चंद्रशेखर इसलिए हैरान क्योंकि उन्हें लोहिया के बारे में जानकारी नहीं, लोहिया इसलिए परेशान कि उन्हें सम्मेलन के अगले ही दिन कलकत्ता जाना था। लोहिया एकाएक बोल पड़े, “अरे मुझे तो कलकत्ता जाना है, मैं कैसे जाऊंगा वहां?” चंद्रशेखर ने कहा, “आप अगले दिन कलकत्ता पहुंच जाएंगे।” लोहिया बोले “लेकिन कैसे?” चंद्रशेखर ने कहा, “जीप के जरिए आपको बलिया से बक्सर पहुंचा दिया जाएगा जहां से पंजाब मेल मिल जाएगी।”

चंद्रशेखर ने जीप का तो बोल दिया, लेकिन उस वक्त जीप का इंतजाम करना बहुत कठिन काम था। दूसरी बात ये कि बलिया से बक्सर तक सड़क इतनी खराब थी कि 100 किलोमीटर के सफर में भी 6 घंटे लग जाते थे।

चंद्रशेखर बलिया के सक्रिय युवा नेता थे। अपने क्षेत्र में समाजवादी नेताओं का लगातार कार्यक्रम करवाते रहते थे।

चंद्रशेखर बलिया के सक्रिय युवा नेता थे। अपने क्षेत्र में समाजवादी नेताओं का लगातार कार्यक्रम करवाते रहते थे।

लोहिया ट्रेन से उतरे, तभी पूछा- मेरी जीप कहां है

लोहिया इलाहाबाद की छोटी लाइन से आने वाली गाड़ी से तय तारीख को दो घंटे लेट से बलिया पहुंचे। उतरते ही पूछा, “मेरी जीप कहां है चंद्रशेखर जिससे मैं मुझे बक्सर जाना है?” चंद्रशेखर ने कहा, “अरे आप प्रोग्राम में चलिए, जीप आ जाएगी।” लोहिया के चेहरे पर तनाव था। उन्होंने कहा, “अभी मेरा प्रोग्राम तो नहीं है?” चंद्रशेखर बोले, अभी नहीं है, 11 बजे से है। लोहिया ने घड़ी देखा तो 9 बज रहे थे, बोल पड़े, “दो घंटे में कैसे तैयार हो पाऊंगा?” चंद्रशेखर ने कुछ नहीं कहा।

लोहिया ने डांटा तो चंद्रशेखर उखड़ गए

लोहिया बलिया के बड़े शरीफ आदमी राय बहादुर सुदर्शन सिंह के यहां तैयार होने के लिए रुके। 11 बजे प्रोग्राम में जाना था। चंद्रशेखर घर के बाहर इंतजार कर रहे थे। लोहिया बाहर निकले और पूछा, मेरी जीप कहां है चंद्रशेखर? चंद्रशेखर ने जवाब दिया, “डॉ. साहब जीप तो आपको शाम को चाहिए।” लोहिया उखड़ गए। कहा- तुम झूठ बोलते हो। झूठ बोलकर कार्यक्रम बनवा लेते हो।

चंद्रशेखर चुप थे, लेकिन लोहिया चुप होने का नाम नहीं ले रहे थे। चंद्रशेखर उखड़ गए और कहा, डॉ. राममनोहर लोहिया केवल आप ही ईमानदारी के पुतले नहीं हैं, मैंने आपको बुलाया नहीं था। मैंने आचार्य को बुलाया था। उनके कहने पर आप आए। आप मेहरबानी करके तशरीफ ले जाइए। आप आ गए इसके लिए धन्यवाद। इतना कहकर चंद्रशेखर वहां से चलने लगे। दूसरे साथी को जीप की तरफ इशारा करते हुए कहा, लोहिया को बक्सर छोड़ देना।

चंद्रशेखर के गुस्सा होने के बाद लोहिया वापस नहीं लौटे, बल्कि चार सभाओं को संबोधित किया।

चंद्रशेखर के गुस्सा होने के बाद लोहिया वापस नहीं लौटे, बल्कि चार सभाओं को संबोधित किया।

लोहिया बक्सर नहीं गए, चंद्रशेखर रैली में नहीं गए

चंद्रशेखर बिगड़कर चले गए तो लोहिया को महसूस हुआ कि लड़का गलत नहीं बोल रहा था। वह लोगों के साथ चार सभाओं में गए। बढ़िया भाषण दिया। अंतिम भाषण ददरी मेले के युवक सम्मेलन में हुआ। समाजवादी आंदोलन से जुड़े लोग लोहिया के भाषण से झूम उठे। शाम को विदाई के वक्त चंद्रशेखर से लोहिया ने पूछा, भाषण कैसा था मेरा? चंद्रशेखर ने जवाब दिया, माफ कीजिएगा। मैं भाषण नहीं सुन पाया। लोगों की देखरेख में ही रह गया। लोहिया ने कुछ नहीं कहा और चले गए।

चंद्रशेखर नेताओं की जी-हुजूरी नहीं करते थे। वह बड़े से बड़े नेताओं के सामने बोल देते थे कि मैं यह नहीं कहूंगा कि आपकी बात से सहमत नहीं हूं, लेकिन इतना जरूर कहूंगा कि आपकी यह बात समझ में नहीं आई।

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