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राजनीतिक कीमत की परवाह नहीं

जब बेइंसाफी और अन्याय बढ़ता है तो असमानता बढ़ती है। साल 2022 की वैश्विक असमानता रिपोर्ट बताती है कि भारत की शीर्ष दस फीसद आबादी के पास राष्ट्रीय आय का सत्तावन फीसद हिस्सा है और निचली पचास फीसद आबादी के पास सिर्फ तेरह फीसद।

ढेरों चिंताएं

डॉ. सुब्रमनियन की तीन बड़ी चिंताओं में सरकारी अनुदान, संरक्षणवाद और क्षेत्रीय व्यापार समझौतों को खत्म करना है। उनकी दूसरी चिंताओं में संदिग्ध आंकड़े, संघवाद-विरोध, बहुसंख्यकवाद और स्वतंत्र संस्थानों को नजरअंदाज करने जैस मुद्दे हैं। अघोषित रूप से उन्होंने वे कारण बता दिए कि करीब चार साल तक सरकार के साथ काम करने के बाद उन्होंने सरकार क्यों छोड़ दी, जबकि सरकार तो उन्हें बनाए रखने में खुश थी। वे खुश नहीं थे और उन्हें शायद लग चुका था कि चीजें बदतर हो जाएंगी।

हालात वाकई बदतर हो गए हैं। यूपीए सरकार के दौरान औसत कर जो करीब बारह फीसद था, वह बढ़ कर अठारह फीसद हो गया है। रक्षात्मक शुल्कों, डंपिंग रोधी शुल्कों और गैर-शुल्क कदमों का अंधाधुंध और अविवेकपूर्ण तरीके से इस्तेमाल किया जा रहा है। देश को अच्छा-खासा फायदा पहुंचाने वाले बहुपक्षीय व्यापार समझौतों से भारत ने अपने को अलग कर लिया है।

यह विडंबना ही है कि एक ओर नरेंद्र मोदी जनरल सिक्युरिटी आफ मिलिट्री इनफारमेशन एग्रीमेंट (जीसोमिया), कम्युनिकेशन कांपेटिबिलिटी एंड सिक्युरिटी एग्रीमेंट (कॉमकासा), रेसीप्रोकल आफ लाजिस्टिक्स एग्रीमेंट विद रशिया, क्वाड जैसी राजनीतिक-रक्षा बहुपक्षीय संधियों में शामिल होने को उत्सुक हैं और दूसरी तरफ वे व्यापार समझौतों के खिलाफ हैं।

एक समय एक और मुख्य आर्थिक सलाहकार हुआ करते थे, जिनका मोदी की आर्थिक नीतियों से मोहभंग हो गया था। डा. अरविंद पनगड़िया इन दिनों कोलंबिया विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। वे नीति आयोग के उपाध्यक्ष थे। हाल में ‘द इकानोमिक टाइम्स’ में एक लेख में उन्होंने सरकार का गुणगान किया, लेकिन इसके साथ ही एक नाखुशी भी थी।

उन्होंने लिखा- ‘मुक्त व्यापार समझौतों के साथ ही उच्च कर दरों को वापस लेकर अर्थव्यवस्था को खोला जाना चाहिए, पुराने पड़ चुके यूजीसी अधिनियम 1956 को हटा कर नए कानून के जरिए उच्च शिक्षा व्यवस्था का काम होना चाहिए और प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष करों का दायरा और बढ़ाया जाना चाहिए। सरकारी उपक्रमों का निजीकरण और तेज किया जाना चाहिए और सरकारी बैंकों का शुरू किया जाना चाहिए।’

इस तथ्य के अलावा कि डॉ. अरविंद सुब्रमनियन और डा. अरविंद पनगड़िया जो कुछ साल पहले तक सरकार के ‘हिस्से’ थे, दोनों ही उदारवादी अर्थशास्त्री हैं, मशहूर अकादमिक संस्थानों में पढ़ाते हैं और निजी क्षेत्र की अगुआई वाले माडल के समर्थक हैं। वे आर्थिक नीतियों की खामियों को पहचानने में हिचकिचाते नहीं हैं, पर वे ऐसी खामियों के खौफनाक नतीजों की सूची बनाने में दिलचस्पी नहीं दिखाते।

कई परिणाम

इस स्तंभ के पाठक जानते हैं कि क्या नतीजे हुए हैं:

-देश में प्रति व्यक्ति आय में गिरावट आई और कई लोग गरीब हो गए,

-बच्चों में कुपोषण, बौनापन और फेफड़ों की कमजोरी के मामले बढ़ गए,

-एक सौ सोलह देशों के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत चौरानवे से खिसक कर एक सौ चार वें स्थान पर चला गया,

-नोटबंदी, एमएसएमई को मामूली मदद, गरीबों को नगदी हस्तांतरण से इनकार और महामारी के कुप्रबंधन की वजह से लाखों लोग गरीबी में चले गए,

-बेरोजगारी उच्चस्तर पर पहुंच गई है (सीएमआइई के मुताबिक शहरी बेरोजगारी की दर 8.4 और ग्रामीण बेरोजगारी की दर 6.4 फीसद है),

-आसमान छूती महंगाई (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक 5.6 फीसद),

-ऊंचे प्रत्यक्ष कर और पक्षपातपूर्ण अप्रत्यक्ष कर, अविवेकपूर्ण तरीके से बनाया और लाया गया जीएसटी,

-पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री में मुनाफाखोरी,

-लाइसेंस व परमिट राज की वापसी,

-एकाधिकार के चलन को बढ़ावा,

-क्रोनी पूंजीवाद,

-शीर्ष कारोबार और इंजीनियरिंग, मेडिकल व विज्ञान क्षेत्र की प्रतिभाओं का पलायन।

जब गलत आर्थिक नीतियों और उनके नतीजों की आर्थिक कीमत लोगों को चुकानी पड़ रही है, तब भी मोदी सरकार को इसका राजनीतिक खमियाजा भुगतने के लिए नहीं कहा गया है। बिना पैसे, खाने और दवाइयों के घर लौटते गरीब मजदूर, अस्पतालों में आक्सीजन, बिस्तरों, दवाइयों और एंबुलेंसों की भारी कमी, यहां तक कि श्मशानों और कब्रिस्तानों तक में जगह नहीं मिलना, कोरोना से अनगिनत और अप्रमाणित लाखों मौतें, गंगा में बहती और इसके किनारों पर पड़ी लाशें, कोरोनाकाल में जब स्कूल बंद कर दिए गए तब लाखों बच्चों की पढ़ाई और बेरोजगारों की बढ़ती फौज, ऐसा अगर किसी अन्य उदार लोकतंत्र में होता तो सरकार के अस्तित्व को चुनौती मिल जाती। यहां, सरकार बेपरवाह रहती है, संसद में बहस बंद करवा देती है, विरोध करने का मखौल उड़ाने की नीतियों को बढ़ावा देती है और लोगों को राज्य प्रायोजित धार्मिक तमाशों से चकाचौंध कर देती है।

बढ़ता अन्याय

जब बेइंसाफी और अन्याय बढ़ता है तो असमानता बढ़ती है। साल 2022 की वैश्विक असमानता रिपोर्ट बताती है कि भारत की शीर्ष दस फीसद आबादी के पास राष्ट्रीय आय का सत्तावन फीसद हिस्सा है और निचली पचास फीसद आबादी के पास सिर्फ तेरह फीसद। शीर्ष एक फीसद लोगों के पास राष्ट्रीय आय का बाईस फीसद हिस्सा है। पिछले रविवार को आई आक्सफेम की रिपोर्ट उन निराशाजनक नतीजों का समर्थन करती है और बताती है कि राष्ट्र की दौलत का सतहत्तर फीसद हिस्सा सिर्फ दस फीसद लोगों के पास है।

भारत में अरबपतियों की संख्या एक सौ दो से बढ़ कर एक सौ बयालीस हो जाती है, जबकि साल 2021 में चौरासी फीसद लोगों की आमद में गिरावट आई है। मार्च 2020 में अरबपतियों की दौलत 23.14 लाख करोड़ रुपए थी, जो नवंबर 2021 में बढ़ कर 53.16 लाख करोड़ रुपए हो गई। जबकि चार करोड़ साठ लाख से ज्यादा लोग बेहद गरीबी में चले गए।

2022-23 का बजट आने में कुछ दिन रह गए हैं। अगर सरकार ने यह मान लिया है कि इस पर कोई असर नहीं पड़ना और बदलाव की जरूरत नहीं है तो यह एक त्रासदी होगी। एक बेपरवाह सरकार के लिए बचाव का रास्ता सिर्फ यही है कि उसे राजनीतिक कीमत अदा करने की चुनौती मिले।

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