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मेरा शरीर मर्दों जैसा लेकिन अंदर से मैं लड़की हूं:हाथ में 10 रुपए लेकर घर से भागा, आज 61 साल बाद भी नहीं लौट सका

2 घंटे पहलेलेखक: राजेश साहू

“हमें सामने से तो लोग बहुत इज्जत देते हैं लेकिन पीठ पीछे अपशब्द बोलते हैं। हमें सहानुभूति देने वाले तो मिल जाते हैं, लेकिन पढ़ाई-लिखे करने वाले, नौकरी देने वाले कोई नहीं हैं। नाच-गाकर और भीख मांगकर ही हमें गुजारा करना पड़ता है। जब तक हम जवान रहते पैसे कमा लेते। लेकिन एक उम्र के बाद हमें अपनी रोजी-रोटी के लिए भी अपने चेलों पर निर्भर रहना पड़ता है। ये कहना है 62 साल की रेनू किन्नर का।”

बुजुर्ग किन्नरों की स्थिति जानने के लिए हम प्रयागराज और फिर अमेठी जिले के रामगंज कस्बे में पहुंचे। उनके जीवन के अनसुने किस्सों को जाना। उनके डांस देखे। खुद बूढ़े हो जाने पर पैसे देकर नए किन्नर को लाने के तरीके जाने।

इस कहानी के लिए हमारी मुलाकात दो किन्नरों से हुई। पहली हैं प्रयागराज की हेमा जिनकी उम्र 73 साल है। वो इस वक्त बीमारी से बिस्तर पर पड़ी हैं। अब कहीं नाचने गाने भी नहीं जाती। दूसरी हैं 62 साल की रेनू जो नए किन्नरों के भरोसे अपना गुजरा करती हैं।

पहले हम हेमा की कहानी जानते हैं। उसके पहले किन्नर समाज से जुड़ा ये ग्राफिक देखिए।

लड़का था पर मां की तरह सजना मुझे अच्छा लगता
दोपहर का वक्त! मैं 12 साल का था। अब तक सब ठीक था। आम बच्चों की तरह मैं भी स्कूल जाता, दोस्तों के साथ खेलता था। मेरे मां-बाप मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे। उन्हें मुझ में अपने बुढ़ापे का सहारा नजर आता था लेकिन मैं एक लड़के की तरह ये जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं था।

अब मेरे शरीर में हल्के बदलाव आने लगे थे। मैं दिखता तो लड़के जैसा था पर अब मुझे लड़कों की तरह रहना पसंद नहीं था। मां की तरह सजना संवरना अब मुझे अच्छा लगने लगा था। पर जब ये बात मेरे परिवार को पता चली तो वो मुझे घर में कैद करके रखने लगे। मेरी पढ़ाई-लिखाई, दोस्तों के साथ खेलना सब बंद करा दिया गया।

12 साल का था जब 10 रुपए चुराकर घर से भाग आया

हेमा अब कहीं नहीं जाती। न कैमरे के आगे कोई बात करती हैं। उनके चेले ही अब उनका सहारा हैं।

हेमा अब कहीं नहीं जाती। न कैमरे के आगे कोई बात करती हैं। उनके चेले ही अब उनका सहारा हैं।

करीब दो साल गुजर गए। मेरे अंदर की सारी भावनाएं लड़कियों जैसी होने लगीं। मुझे किसी जलपरी जैसा महसूस होता। जिसका शरीर तो लड़कों के जैसा था पर अंदर से वो लड़कियों की तरह नाजुक थी।

घरवाले मुझे ऐसा करते देखते तो मारते-पीटते। मेरे पिता का कहना था कि अगर मुझे उस घर में रहना है तो उनका कहना मानना पड़ेगा। घरवाले मेरी स्थिति समझने को तैयार नहीं थे इसलिए मैंने घर से 10 रुपए चुराए और वहां से भाग आया।

कई बार लगा इस नरक से निकलकर घर वापस चला जाऊं
मैं कभी घर से अकेले बाहर नहीं गया था, लेकिन सड़कों पर घूमता रहा। हाथ में जो 10 रुपए थे वो भी खत्म हो गए। कुछ दिन बीते तो एक आदमी मेरे पास आया। उसने मुझे एक शख्स के पास छोड़ा। ये शख्स मेरे गुरू थे।

मैं गुरू के पास ही रहने लगा। उन्होंने मुझसे कहा कि यहां रहना है तो वही काम करना पड़ेगा जो हम सब करते हैं। मुझे ट्रेन में भीख मांगना, सिग्नल पर भीख मांगना, बाजार में भीख मांगना जैसे ऑप्शंस दिए गए। मैंने बाजार में भीख मांगना शुरू किया। कभी दुकान वाले कुछ रुपए देते तो कभी डांट कर भगा देते।

मैं भीख मांगते-मांगते बड़ा हो गया। मेरा शरीर बाकी लड़कों से अलग था। ये वो वक्त था जब मुझे पता चला कि मैं एक किन्नर हूं। पढ़ने-लिखने वाला मैं अब भीख मांगकर खाता था। कई बार लगा कि इस नरक से भाग जाऊं। लेकिन जाता कहां। मां-बाप के लिए तो मैं मर चुका था।

तुम तो ‘वो’ हो, तुम्हें कौन नौकरी देगा
हेमा आगे बताती हैं, मजबूरी में ही सही पर यही मेरी जिंदगी बन गई। मेरे गुरू ही मेरे मां-बाप हो गए। मैं तो ज्यादा पढ़-लिख नहीं पाई। लेकिन आज कल जो बच्चे हमारे पास आते हैं उन्हें हम पढ़ाते भी हैं। पर उसका क्या फायदा। ना सरकार हमें नौकरी देती है ना कोई और।

हमारे लोग पढ़ लिखकर कहीं नौकरी मांगने जाते हैं तो उन्हें ताने सुनने पड़ते। उनसे कहा जाता कि तुम तो ‘वो’ हो, तुम्हारा काम नाचना-गाना है नौकरी करना नहीं। इसलिए मजबूरी में उन्हें भी भीख मांगकर या नाच-गाकर अपना गुजरा करना पड़ता है।

किन्नरों के रोजगार से जुड़ा ये ग्राफिक देखिए।

ये तो थी हेमा की कहानी। इसके बाद प्रयागराज से 95 किलोमीटर दूर हम पहुंचे अमेठी। यहां हमारी मुलाकात रेनू किन्नर से हुई जो अपने गुजर बसर के लिए अपने किन्नर चेलों पर निर्भर हैं…

जब मुझे पता चला कि मैं उनके जैसी हूं
दोपहर का वक्त! मैं 8 साल की थी। दोस्तों के साथ खेलकर घर वापस आई। मां ने दुकान से बिस्कुट लाने को कहा। मैंने दुकान के लिए घर से निकलने लगी। तभी 4 लोग आए और मेरा हाथ पकड़कर जबरदस्ती अपने साथ ले जाने लगे। मैं चिल्लाई तो मां बाहर आई। उसने मेरा हाथ छुड़ाया और उन लोगों से पूछा कि कहां ले जा रहे?

वो लोग कौन हैं ये मैं नहीं जानती थी। लेकिन जब उन्होंने कहा कि मैं उनके जैसी हूं मुझे ले जाने आए हैं तो मां जमीन पर बैठ गई और फूट-फूटकर रोने लगी। मुझे कुछ समझ नहीं आया। मां ने रोकने की कोशिश की पर ये लोग मुझे जबरदस्ती अपने साथ ले आए।

यहां तक हमने उनकी कहानी उनकी ही जुबानी लिखी। आगे की कहानी अब हम बताते हैं।

रेनू के चेले अब उनका सहारा हैं
62 साल की रेनू ये सब बताते हुए इमोशनल हो जाती हैं। कहती हैं जहां पैदा हुई, जहां उनके मां-बाप हैं अचानक से सब उनसे दूर कर दिया गया। उनकी पूरी दुनिया बदल गई। अमेठी के रामगंज कस्बे में ही अब रेनू का नया ठिकाना। वो जगह जहां किन्नर रहते हैं। रेनू अब किन्नरों की इस दुनिया में ढल चुकी हैं। वो अब बूढ़ी हो गई हैं इसलिए कमाई के लिए अब खुद नहीं नाचती।

भगवान दुश्मन को भी किन्नर न दे

रेनू सामाजिक भेदभाव को किन्नरों के लिए सबसे ज्यादा घातक मानती हैं। वह कहती हैं, “बहुत सारे लोग हैं जो हमें इंसान समझते ही नहीं। जबकि हम जो हैं उसकी वजह हम नहीं बल्कि भगवान हैं। मैं तो कहती हूं कि भगवान किसी को किन्नर न बनाए। 100 दुश्मन को भी किन्नर के रूप में कोई संतान न दें।”

रेनू के बाद हमने उनके ही ग्रुप की सबसे कम उम्र की चांदनी किन्नर से बात की। चांदनी ही अब पूरे ग्रुप को लेकर आगे बढ़ रही हैं।

घरवालों को कुछ पैसा दिया और लेकर चले आए
बिहार के कटिहार जिले की चांदनी इस वक्त कलकत्ता घूमने गई हैं। चांदनी से हमने उनकी लाइफ को लेकर बात की। वह कहती हैं, “10 साल की थी जब किन्नर ग्रुप को पता चल गया कि मैं लड़का या लड़की नहीं हूं। वह हमारे घर आए। मुझे उनके साथ नहीं जाना था फिर भी वह मुझे अपने साथ लेकर चले गए।”

हमने चांदनी से पूछा, “क्या आपके घरवालों को पैसा दिया गया?” चांदनी का जवाब था, “पैसा दिया होगा लेकिन कितना ये मुझे जानकारी नहीं है।”

चांदनी शुरुआत से ही रेनू के ग्रुप से जुड़ी। अब उनके ग्रुप को आगे बढ़ा रही हैं।

चांदनी शुरुआत से ही रेनू के ग्रुप से जुड़ी। अब उनके ग्रुप को आगे बढ़ा रही हैं।

यहां रुकते हैं, अब सवाल है क्या किन्नर पैसे से खरीदे जाते हैं?

30 से 50 लाख रुपए में बिकते हैं किन्नर
चांदनी बताती हैं, “किन्नरों को पैसे के बदले ही इधर-उधर ले जाया जाता है। मतलब अगर वो एक गुरू से दूसरे गुरू के पास जाती हैं तो दूसरा वाला गुरू पहले वाले गुरू को पैसा देगा। यह पैसा 30 लाख से 50 लाख रुपया भी हो सकता है।” हमने सर्च किया तो हमें कासगंज के जितेंद्र मिले।

जीतेंद्र एक स्वस्थ लड़का था। पूजा हाजी ने जीतेंद्र के प्राइवेट पार्ट्स को कटवाकर नेहा किन्नर बनाया और 2 लाख रुपए में सलमा किन्नर को बेच दिया। इसके बाद सलमा ने उसे 2 लाख में ही पायल किन्नर को बेच दिया। पायल ने एक महीने बाद उसे चांदनी गंजडुडवारा को 3 लाख में बेच दिया। जब यह मामला पुलिस के पास पहुंचा तब जाकर जीतेंद्र की जान बची।

ये जीतेंद्र हैं। पुलिस थाने में शिकायत के बाद इन्हें आजादी मिल सकी।

ये जीतेंद्र हैं। पुलिस थाने में शिकायत के बाद इन्हें आजादी मिल सकी।

क्या चांदनी को भी पैसे के जरिए लाया गया है
हमने रामगढ़ के ही कई और लोगों से बात की। ये वो लोग हैं जो रेनू को लंबे वक्त से जानते हैं। वो बताते हैं कि चांदनी के आने से रेनू की जिंदगी में बहुत बदलाव आया। अब इन्हें ज्यादा पैसे मिलने लगे हैं। चांदनी जहां भी जाती है लोग देखने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। लोग तो यह भी दावा करते हैं कि चांदनी को 30 लाख रुपए देकर यहां लाया गया है। हालांकि उनके इस दावे में सच्चाई कितनी है यह उन्हें ही पता होगा।

चांदनी एक स्टेज शो का 4 हजार चार्ज करती हैं
चांदनी सिर्फ बच्चे के जन्म या फिर किसी शादी प्रोग्राम में ही नहीं जाती बल्कि स्टेज शो भी करती हैं। इस फील्ड में उनकी अच्छी खासी डिमांड है। वह एक शो के लिए एक रात का 3 से 4 हजार रुपए चार्ज करती हैं। चांदनी ये सारा पैसा लाकर रेनू को दे देती हैं। रेनू अपने हिसाब से उन्हें पैसा देती हैं। चांदनी कहती हैं, “रेनू ही अब मेरी मां और पिता हैं। वह जो कहती हैं मैं वही करती हूं।”

बहुत परेशान रहकर क्या कर सकती हूं
चांदनी से हमने पूछा, क्या आप अपनी इस जिंदगी को लेकर परेशान हैं? चांदनी कहती हैं, “हमारे परेशान होने से चीजें बदल नहीं जाएंगी। अब ऊपर वाले ने जो बना दिया है उसी में रहना है। किसी से कोई भी शिकायत नहीं है।”

चांदनी कहती हैं, पैसों के लिए हम किसी पर दबाव नहीं बनाते। बधाई में वह जितना दे दे वही ठीक है।

चांदनी कहती हैं, पैसों के लिए हम किसी पर दबाव नहीं बनाते। बधाई में वह जितना दे दे वही ठीक है।

यहां हमारी कहानी खत्म होती है। अब आपको किन्नर समाज की 3 रोचक बातें बताते हैं।

  • किसी किन्नर को अगर एक घराने ने निकाल दिया तो दूसरा उसे अपने पास तभी रख सकता है जब वह पहले वाले घराने की मुंह मांगी कीमत चुका देगा।
  • एक किन्नर दूसरी किन्नर से बहन का रिश्ता जोड़ती है तो दोनों एक-दूसरे को स्तनपान कराती हैं। इसमें उम्र का कोई लेना-देना नहीं। इस रिवाज को किन्नरों की भाषा में ‘बहनापा’ कहते हैं।
  • किन्नर घराने में शामिल करने के दौरान जो पुरुष शरीर के किन्नर होते हैं उनके प्राइवेट पार्ट को रिमूव किया जाता है। इसे शुद्धिकरण कहा जाता है।

देश में किन्नरों की आबादी कितनी है
2011 की जनगणना के मुताबिक, देश में 48 लाख किन्नर हैं। 2005 में इंडिया टुडे ने किन्नरों पर एक सर्वे करवाया था। इस सर्वे में दिल्ली के 2000 किन्नरों का मेडिकल चेकअप किया गया। मेडिकल रिपोर्ट से पता चला कि 2000 में से 3 ऐसे थे जिन्हें किन्नर कहा जा सकता था। बाकी 1997 सिर्फ स्वाभाव से किन्नर थे। यानी अगर उनकी छोटी-मोटी सर्जरी करवाई जाए तो वो ठीक हो सकते थे। इसके अतिरिक्त गे और लेस्बियन शामिल थे।

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