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मस्तिष्क को धीरे-घीरे जकड़ता है ‘अल्जाइमर’

दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग ‘अल्जाइमर’ और अन्य तरह की ‘डिमेंशिया’ से प्रभावित हैं, लेकिन दुनिया में इसका प्रभावी इलाज अब तक नहीं खोजा जा सकता है।

दुनिया भर में बड़ी संख्या में लोग ‘अल्जाइमर’ और अन्य तरह की ‘डिमेंशिया’ से प्रभावित हैं, लेकिन दुनिया में इसका प्रभावी इलाज अब तक नहीं खोजा जा सकता है। दरअसल, चिकित्सा जगत अब भी इस बीमारी के पीछे की वजह या यह किस तरह से बढ़ता है, इसके बारे में ज्यादा पता नहीं कर पाया है। हाल में कैंब्रिज विश्वविद्यालय के शोध से इस दिशा में उम्मीद बनी है।

‘साइंस एडवांसेस’ में प्रकाशित कैंब्रिज के जार्ज मिसल और उनके सहकर्मियों के ताजा अनुसंधान में अल्जाइमर रोगियों के आंकड़ों का विश्लेषण कर कुछ नई जानकारियां हासिल की गई हैं। अनुसंधानकर्ता मस्तिष्क में अल्जाइमर बीमारी के बढ़ने को रोकने की प्रक्रिया के संबंध में बेहतर समझ बनाने में सक्षम हुए।

दरअसल, अल्जाइमर की बीमारी और तंत्रिका तंत्र से संबंधित अन्य बीमारियों में प्रोटीन, जो कि सामान्य तौर पर स्वस्थ मस्तिष्क कोशिकाओं का हिस्सा होते है, वे सूक्ष्म गुच्छों में एकसाथ चिपकने लगते हैं। मरीज के मस्तिष्क में ये गुच्छे के रूप में जमा होने लगते हैं, जिससे मस्तिष्क की कोशिकाएं मरने लगती हैं और स्मृति लोप होने संबंधी लक्षण दिखने लगते हैं।

जैसे-जैसे इन गुच्छों की संख्या बढ़ती जाती है, बीमारी बढ़ती जाती है और मौत तक हो जाती है। इन गुच्छों के जमा होने के पीछे कई क्रियाएं जिम्मेदार हो सकती हैं, लेकिन अब तक विस्तार से वैज्ञानिकों के हाथ यह जानकारी नहीं लग पाई है कि आखिर ये गुच्छे बन कैसे जाते हैं और इन्हें कैसे नियंत्रित किया जा सकता है।

अल्जाइमर की बीमारी का अनुसंधान अक्सर प्रयोगशाला जीवों जैसे कि चूहों पर किया जाता है। यह बीमारी के आनुवांशिक कारकों के प्रभाव का अध्ययन करने में तो प्रभावी होते हैं, लेकिन इस बीमारी का पूरी तरह पता लगाने के लिए अनुसंधान का अच्छा तरीका नहीं है। अल्जाइमर को मनुष्य में विकसित होने में आम तौर पर दशकों का समय लगता है जबकि प्रयोगशाला में इन जीवों पर अध्ययन कुछ समय के लिए ही किया जा सकता है।

इस कमी को ध्यान में रखते हुए नया अनुसंधान किया गया और इसमें फिजिकल केमेस्ट्री (भौतिक रसायन) जिसे केमिकल काइनेटिक्स कहा जाता है, इसका इस्तेमाल किया गया। इससे यह समझा जा सकता है कि अणु किस तरह से एक-दूसरे से संपर्क करते हैं। इसी तरह का अध्ययन यह समझने में किया गया कि अल्जाइमर से ग्रसित मनुष्य के मस्तिष्क में गुच्छे कैसे बनते हैं। बीते 10 साल से केमिकल कानेटिक्स का इस्तेमाल करके जांच की गई। परिणाम में यह सामने आया कि रोगियों के मस्तिष्क में प्रोटीन के गुच्छे तेजी से बढ़ते हैं, जिसका मतलब है कि एक गुच्छे निश्चित अवधि के बाद दो गुच्छे उत्पन्न करते हैं और फिर यह समय के साथ चार में तब्दील हो जाते हैं और इस तरह यह बढ़ता रहता है।

ठीक कोविड-19 महामारी की तरह, जिसका प्रसार शुरू में तो धीमा लगा लेकिन फिर अचानक तेजी से बढ़ा। अल्जाइर में भी शुरू में या तो लक्षण सामने नहीं आते या आंशिक लक्षण दिखते हैं और इसी दौरान प्रोटीन के गुच्छे बन रहे होते हैं जो बाद में तेजी से बढ़ने लगते हैं। इस अध्ययन में यह खुलासा हुआ कि मानव मस्तिष्क इन गुच्छों की संख्या को रोकने में काफी अच्छा काम करता है। यह पता चला कि गुच्छों के दोगुना होने में करीब पांच साल का समय लगा। मस्तिष्क क्षेत्रों के बीच गुच्छों के प्रसार को रोकना अल्जाइमर के एक बार शुरू हो जाने के बाद इसे धीमा करने में नाकाफी हो सकता है। अब वैज्ञानिक इन गुच्छों के बढ़ने को लक्षित करने पर काम कर रहे हैं।

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