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भारतीय मेधा के नए ठिकाने

अगर हमें विकसित देशों की तरह बड़ी कंपनियों की स्थापना का माहौल बनाना है कि दुनिया भर की प्रतिभाओं को भारत में आमंत्रित करने की प्रेरणा जगानी होगी। भारत काम करने लायक एक शानदार जगह है, यह धारणा बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

अभिषेक कुमार सिंह

एक वक्त था, जिसके बारे में दावा किया जाता है कि तब संसार में भारत की प्रतिष्ठा विश्व गुरु के रूप में थी। लेकिन सदियों तक हमारे देश की छवि कई तरह के अंधविश्वासों को प्रश्रय देने वाले मुल्क की बनी रही। आजादी के सात दशकों में भी भारत ऐसी उल्लेखनीय तरक्की नहीं कर पाया जिससे यह प्राचीन विश्व गुरु वाली हैसियत में दोबारा प्रतिष्ठित हो पाता। बड़ी-बड़ी कंपनियों के उत्पादन के बल पर भी हम चीन आदि देशों जैसी हैसियत में नहीं आ पाए हैं। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों में जिस एक चीज ने हमारे मुल्क की किस्मत और छवि में जबर्दस्त तब्दीली की है, वह कंप्यूटर, सूचना तकनीक (आइटी) और प्रबंधन आदि के क्षेत्र में भारतीय दिमागों का सबसे बेहतरीन साबित होना है।

इसकी चर्चा वैसे प्रतिभा पलायन (ब्रेन-ड्रेन) की समस्या के रूप में अरसे से हमारे देश में हो रही थी। कहा जाता रहा है कि अगर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के ऊंचे वेतन और विकसित देशों के सुविधापूर्ण जीवन की चाह में हमारे सर्वश्रेष्ठ शैक्षणिक संस्थानों से निकले युवा इसी तरह देश से बाहर जाते रहेंगे तो भारत का क्या होगा।

हालांकि इस सवाल को उठाते समय इसका कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता था कि अगर ये प्रतिभाएं देश में ही रह गईं या इन्हें विदेशों से लौटा लाया गया तो क्या ये स्वदेश को वास्तव में कोई फायदा पहुंचा पाएंगी। या इनके बल पर देश की किस्मत में कोई चार चांद लगाए जा सकेंगे। लेकिन इस दौर में जो प्रतिभाएं बाहर गईं, उन्होंने अपनी प्रतिभा और मेहनत से कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों में वह मुकाम हासिल किया है, जिसका सपना आज शायद हर मुल्क देखना चाह रहा है।

खासतौर से यह चमत्कार हुआ है आइटी और प्रबंधन के क्षेत्र में, जहां एक के बाद एक करके कई भारतीय या भारतीय मूल की प्रतिभाओं ने विभिन्न नामी कंपनियों के शीर्ष पदों पर कब्जा जमाया है। हाल-फिलहाल में इसकी चर्चा सोशल मीडिया कंपनी ट्विटर की शीर्ष पद (सीईओ) पर भारतीय मूल के पराग अग्रवाल की नियुक्ति से उठी है। महज सैंतीस साल के युवा पराग अग्रवाल ने इस पद पर पहुंच कर ऐसी हिलोर पैदा की कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में सोशल मीडिया पर तूफान उठ खड़ा हुआ।

वहां सोशल मीडिया पर मौजूद हर दूसरा-तीसरा शख्स यह सवाल उठाने लगा कि एक साथ आजादी हासिल करने वाले दो मुल्कों की अंतरराष्ट्रीय पहचान में कोई भेद करना हो तो कहा जा सकता है कि भारत अपनी आइटी और प्रबंधन प्रतिभाओं के बल पर दुनिया में नाम कमा रहा है, जबकि पाकिस्तान एक आंतकी मुल्क के रूप में पूरी दुनिया में कुख्यात है। निश्चय ही इस तुलना ने भारतीयों में यह उत्साह पैदा किया है कि अगर सरकारें देश में उत्कृष्ट शिक्षा का माहौल बनाएं तो पढ़ाई-लिखाई के बल पर कुछ क्षेत्र में वैश्विक मंच पर भारत की बादशाहत कायम की जा सकती है।

इसके एक नहीं, अनेक उदाहरण हैं जहां काबिलियत साबित करते हुए भारतीय युवाओं ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों में अपनी धाक जमाई है। हाल के प्रसंग देखें तो ऐसी उपलब्धियों में जगदीप सिंह और लीना नायर जैसे कुछ और नाम इस सूची में जोड़े जा सकते हैं। जगदीप सिंह एक अमेरिकी कंपनी की मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) बनाए गए हैं। दावा किया गया है कि उनका सालाना वेतन टेस्ला के सीईओ एलन मस्क के बराबर यानी दो सौ पचपन अरब डालर तक है। भारतीय मूल की ही लीना नायर एक प्रख्यात फ्रांसीसी फैशन कंपनी की वैश्विक मुख्य कार्याधिकारी बनाई गई हैं।

ऐसे नामों की फेहरिस्त में सत्य नडेला, सुंदर पिचाई, शांतनु नारायण, रंगराजन रघुराम, अरविंद कृष्णा जैसे नाम भी जुड़े हुए हैं। इन भारतीय या भारतीय मूल के पेशेवरों की योग्यता ही वह कसौटी है जिसके आधार पर कई और तकनीकी कंपनियों की बागडोर किसी न किसी भारतीय को दिए जाने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। भारतीय प्रतिभा में यह भरोसा रातों-रात नहीं पैदा हुआ है।

इसे भारत में कायम हुई किसी एक दल की सरकार से भी नहीं जोड़ा जा सकता, बल्कि आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण के प्रक्रिया के दौरान ही देश में बनी एक के बाद सरकारों ने वैश्विक बदलावों को परखते हुए देश में आइआइटी और आइआइएम जैसे विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थानों की जो नींव रखी, उन्होंने देश के युवाओं को ऐसी क्षमताओं से युक्त किया जो उन्हें प्रतिभा के वैश्विक मुकाबले में आगे रखने में मददगार साबित हुईं।

हालांकि यह थोड़े अचरज की बात है कि तरक्की की यह बयार चौतरफा नहीं बही। हर तरह के विश्वस्तरीय विकास के मामले में देश अभी भी पिछड़ा हुआ है। लेकिन जिन चुनिंदा संगठनों ने लालफीताशाही से बाहर निकल कर प्रतिभाओं को निखारने का काम किया, उतने मात्र से आज हम भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अपनी पीठ थपथपाने का अवसर पा रहे हैं। हालांकि यहां एक विरोधाभास यह भी है कि जिन क्षेत्रों की बहुराष्ट्रीय कंपनियों की ऊंची नौकरियों में भारतीयों की तूती बोल रही है, उन्हीं क्षेत्रों में कंपनियां बनाने या कहें कि उनका मालिकाना हक रखने वाले भारतीयों का अभाव आज भी कायम है।

इसका असर यह है कि जिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय अपनी मेधा का योगदान दे रहे हैं, उन जैसी कंपनियों का स्वामित्व विदेशियों के पास है। स्थिति का अंदाजा इस तथ्य से हो जाता है कि आज डेढ़ सौ अरब डालर की वैश्विक और पचास अरब डालर का देसी आइटी उद्योग जिन कंपनियों के बल पर चल रहा है, उनका मालिकाना हक विदेशों में बैठे कारोबारियों के हाथों में है।

वर्ष 2019 में आई फोर्ब्स की आइटी कंपनियों की सूची में जिन पैंतीस शीर्ष कंपनियों को स्थान दिया गया था, उसमें से पहली चौंतीस कंपनियां अमेरिका की और एक कंपनी जर्मनी की थी। वैश्विक सूची में भारत की बड़ी दिग्गज आइटी कंपनियों का स्थान काफी नीचे ही आता है। यही नहीं, ऐसी भारतीय कंपनियों की सूची भी काफी छोटी है जो वैश्विक कारोबार में उल्लेखनीय स्थान पर आती हैं।

इसकी मिसाल पीडब्ल्यूसी ग्लोबल 100 सॉफ्टवेयर लीडर्स की रिपोर्ट से मिलती है, जिसमें कमाई को आधार बना कर किए गए आकलन में चीनी कंपनियों को शीर्ष पर रखा गया था। चीन के बाद इजरायल, रूस और ब्राजील का नाम था। इनके बाद भारतीय कंपनियों को स्थान दिया गया था।

निश्चय ही यह एक विसंगति है। इस विडंबना पर हमारी सरकारें ध्यान तो दे रही हैं, लेकिन इस दिशा में अभी कुछ ठोस काम नहीं हुआ है। आज हालत यह है कि नौकरी करने वालों की बजाय नौकरी देने वालों की हैसियत में आने के उद्देश्य से बनाई जा रही ज्यादातर नई कंपनियों की हालत पतली है। उनमें से बमुश्किल दस फीसद ही अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल हो पा रही हैं। यानी ब्रिटिश शासनकाल में भारत औद्योगिक विकास की होड़ में पिछड़ गया था, उसमें आज भी कामयाबी हमसे कोसों दूर है।

एक और बात उल्लेखनीय है। जब भी विदेशी कंपनियों में भारतीय प्रतिभाओं को उल्लेखनीय स्थान मिलने का जिक्र होता है तो ध्यान में रखना होगा कि यह सब कुछ प्रतिभा पलायन के कारण संभव हुआ है। विकसित देशों की बड़ी कंपनियों ने अगर भारतीयों के लिए अपने दरवाजे नहीं खोले होते, तो शायद आज हम यह गौरवगान नहीं कर रहे होते।

इसका सबक यह है कि अगर हमें विकसित देशों की तरह बड़ी कंपनियों की स्थापना का माहौल बनाना है कि दुनिया भर की प्रतिभाओं को भारत में आमंत्रित करने की प्रेरणा जगानी होगी। भारत काम करने लायक एक शानदार जगह है, यह धारणा बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

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