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बेकाबू होते जवान

पंजाब के अमृतसर में सीमा सुरक्षा बल के एक जवान ने मुख्यालय के मेस में ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं।

देश में सुरक्षा बलों के जवानों की खुदकुशी के मामले या फिर उनका खुद पर लगाम खोकर गोलीबारी करने की घटनाएं लंबे समय से चिंता का कारण बनी हुई हैं। समय-समय पर इस मसले के हल के लिए पहलकदमी की बातें भी की गर्इं। लेकिन अब तक इस दिशा में ठोस उपाय सामने नहीं आ सका है। यही वजह है कि आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों से जवानों द्वारा अपने ही साथियों पर अंधाधुंध गोलीबारी, बेवजह उनकी हत्या और फिर खुदकुशी कर लेने की खबरें आती रहती हैं।

एक ताजा घटना में पंजाब के अमृतसर में सीमा सुरक्षा बल के एक जवान ने मुख्यालय के मेस में ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। गोलीबारी की चपेट में आने वाले चार जवानों की मौत हो गई और एक गंभीर रूप से घायल हो गया। इस घटना को अंजाम देने वाले जवान ने अपने को भी गोली मार ली। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में भी सीमा सुरक्षा बल के एक शिविर में एक जवान ने अपने साथी की हत्या करने के बाद खुदकुशी कर ली।

संभव है कि इस तरह की घटनाओं को किसी जवान की हिंसक प्रवृत्ति का नतीजा माना जाए या फिर उसे मानसिक रूप से परेशान बता कर इसी कोण से मामले की जांच और उसका विश्लेषण किया जाए। लेकिन ऐसी तमाम घटनाएं इस जरूरत को रेखांकित करती हैं कि समस्या को सतही नजरिए से देखने के बजाय इसकी जड़ों की पहचान की जाए और उससे निपटने की कोशिश की जाए। अमृतसर की ताजा घटना में गोलीबारी की वजह फिलहाल ड्यूटी पर तैनाती से संबंधित विवाद के रूप में सामने आई है।

खबरों के मुताबिक, अधिकारियों का कहना है कि चार साथियों की हत्या करके खुदकुशी कर लेने वाले जवान शायद अपने ड्यूटी के घंटों को लेकर परेशान था। सही है कि सीमा सुरक्षा बल जैसे तंत्र में अनुशासन सबसे अहम पहलू होता है। ड्यूटी और तैनाती के निर्देशों को इसी के तहत देखना और उनका पालन करना जवानों का दायित्व भी होता है। लेकिन इस क्रम में क्या इस बात का ध्यान रखना जरूरी नहीं होना चाहिए कि तमाम प्रशिक्षण के बावजूद एक जवान आखिरकार इंसान होता है और उसकी मानसिक अवस्था पर भी हालात के दबाव सामान्य तरीके से ही काम कर रहे हो सकते हैं?

यह छिपा नहीं है कि सुरक्षा बलों के जवानों की ड्यूटी किन कठिन और संवेदनशील परिस्थितियों में भी चलती रहती है। इसके मद्देनजर कई बार जरूरत होने पर भी जवानों को छुट्टी नहीं मिल पाती या फिर ड्यूटी के हालात और उसकी अवधि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालते हैं। ऐसे में कई बार वे खुद पर से नियंत्रण खो देते हैं और इस तरह के अपराधों को अंजाम देते हैं और अपनी जान भी दे देते हैं।

एक व्यक्ति अपने भीतर मौजूद संवेदनाओं और उससे संचालित मानसिक उथल-पुथल से पूरी तरह निरपेक्ष या मुक्त नहीं हो सकता। विडंबना यह है कि बीएसएफ या सीआरपीएफ जैसे अलग-अलग बलों में अपने साथी जवानों पर गोलीबारी करके किसी जवान के खुदकुशी कर लेने की घटनाओं पर चिंता तो जताई जाती है, लेकिन इसके मूल कारणों पर गौर करके उसे दूर करने को लेकर कोई व्यावहारिक कदम नहीं उठाए जाते। करीब चार महीने पहले सीआरपीएफ ने जवानों में मानसिक और भावनात्मक तनाव का पता लगाने का निर्देश दिया था। दरअसल, इस गंभीर और जटिल समस्या का हल अनुशासन की कमी के बजाय इसी कोण से तलाशने की जरूरत है।

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