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“पेगासस केस की आम जनता को शायद ही कोई परवाह, वो तो पेट पालने को कर रहा संघर्ष”

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कुछ लोगों की राय है कि पेगासस केस का अर्थ भारत में लोकतंत्र खत्म होने से है, क्योंकि अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। पर भारतीय लोकतंत्र बड़े पैमाने पर जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक था। दूसरे शब्दों में- लोकतंत्र का नाटक। जब किसी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं है, तो वह ख़त्म कैसे हो सकती है?

पेगागस जासूसी कांड को लेकर सड़क से लेकर संसद तक विपक्ष ने हंगामा खड़ा किया है। मॉनसून सत्र के दौरान संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास इस मसले पर विरोध प्रदर्शन करते कांग्रेस और डीएमके और अन्य विपक्षी दलों के नेता। (फोटोः पीटीआई)

पेगासस केस (Pegasus Spyware Case) पर हिंदी न्यूज पोर्टल ‘The Wire’ ने हाल में कई लेख प्रकाशित किए। इस मुद्दे के दो पहलू हैं। पहला- कानूनी, जबकि दूसरा- यथार्थवादी। हालांकि, भारत सरकार ने स्वीकारा नहीं है कि उसने इजरायली स्पाइवेयर खरीदा है। पर परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidences) इशारा करते हैं कि उसने ऐसा किया है। पेगासस, स्पाइवेयर को केवल सरकारों या उनकी एजेंसियों को बेचता है, निजी व्यक्तियों या निजी संगठनों को नहीं।

केएस पुट्टुस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार (Right to Privacy) को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मौलिक अधिकार घोषित किया गया है, इसलिए पेगासस का इस्तेमाल कर जो किया गया वह अवैध लगता है। नि:संदेह निजता का अधिकार एक पूर्ण अधिकार (Absolute Right) नहीं है। जांच की जा रही है कि मामला अगर राज्य सुरक्षा, आतंकवाद, आपराधिक कृत्यों आदि से जुड़ा है, तो इसपर प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। जैसा कि भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (Information Technology Act) की धारा 69 और भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम की धारा 5(2) में कहा गया है। पर यह प्रतिबंध इससे आगे नहीं जा सकते, इसलिए भारत सरकार जो कर रही थी, वह अवैध लगता है।

वैसे, इस केस की यथार्थवादी ऐंगल से भी जांच की जानी चाहिए। पेगासस मुद्दा भारत में आम आदमी को शायद ही प्रभावित करता है, जिसके असल मुद्दे बेरोजगारी, महंगाई (खाद्य पदार्थों, ईंधन आदि की कीमतों में भारी वृद्धि), कृषि संकट, बाल कुपोषण का भयावह स्तर (वैश्विक भूख सूचकांक Global Hunger Index के अनुसार भारत में हर दूसरा बच्चा कुपोषित है) और जनता के लिए उचित स्वास्थ्य देखभाल का लगभग पूर्ण अभाव आदि हैं।

thewire.in और मीडिया के कुछ अन्य वर्गों ने जैसे यह मुद्दा उजागर किया, उससे लगता है कि पेगासस केस से स्वर्ग गिर जाएगा। सच तो यह है कि भारत में आम आदमी अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए संघर्ष कर रहा है और उसे पेगासस की शायद ही कोई परवाह है। कुछ लोगों की राय है कि पेगासस केस का अर्थ भारत में लोकतंत्र खत्म होने से है, क्योंकि अब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। पर भारतीय लोकतंत्र बड़े पैमाने पर जातीय और सांप्रदायिक वोट बैंक था। दूसरे शब्दों में- लोकतंत्र का नाटक। जब किसी चीज़ का अस्तित्व ही नहीं है, तो वह ख़त्म कैसे हो सकती है? इसके अलावा, भारत में अधिकांश लोग नौकरी, पौष्टिक भोजन और स्वास्थ्य संबंधी देखभाल आदि चाहते हैं। बोलने की आजादी शायद ही उनके लिए मायने रखती है।

दूसरे, अवैध टेलीफोन टैपिंग भारत में कोई नई बात नहीं है। 2010 में तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक पत्र लिखा था कि उनका टेलीफोन किसी अन्य सरकारी विभाग (शायद केंद्रीय गृह मंत्रालय) द्वारा टैप किया जा रहा है। भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को डर था कि राष्ट्रपति भवन के कई कमरों में जासूसी (Bugging) हो रही है (यह सर्वविदित है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जैल सिंह पर भरोसा नहीं था)। तीसरा, आधुनिक तकनीक इतनी विकसित हो गई है कि जासूसी रोकी नहीं जा सकती। हो सकता है कि पेगासस का पता लगा लिया गया हो, पर कई अन्य परिष्कृत उपकरण, डिवाइस और उपकरण हो सकते हैं, जिनका पता लगाना असंभव हो।



लेखक सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज हैं। आलेख में व्यक्ति विचार उनके निजी हैं। (एक्सप्रेस आर्काइव फोटो)

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