POLITICS

नशे की खेप

गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर पकड़ी गई करीब तीन हजार किलो हेरोइन की खेप को लेकर स्वाभाविक ही कई सवाल उठ रहे हैं।

गुजरात के मुंद्रा बंदरगाह पर पकड़ी गई करीब तीन हजार किलो हेरोइन की खेप को लेकर स्वाभाविक ही कई सवाल उठ रहे हैं। हेरोइन की यह खेप अफगानिस्तान से लाई गई। इसकी कीमत लगभग इक्कीस हजार करोड़ रुपए आंकी गई है। हालांकि इसकी खेप जिस कंपनी के नाम पर यहां मंगाई गई थी, उसके मालिकों को गिरफ्तार कर लिया गया है। कुछ अफगान नागरिकों को भी दिल्ली में पकड़ा गया है। पर बंदरगाह की सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र को लेकर सवाल बने हुए हैं।

हालांकि कुछ लोग इसे राजनीतिक रंग देते हुए बंदरगाह के मालिक पर सवाल उठा रहे हैं, पर इसे इस कोण से देखने के बजाय चिंता इस बात पर होनी चाहिए कि आखिर किस तरह इतने बड़े पैमाने पर नशे की खेप भारत तक पहुंची। कांग्रेस पार्टी का कहना है कि यह खेप औचक पकड़ी गई, जिस महकमे पर जांच की जिम्मेदारी थी, वह इसे नहीं पकड़ पाया। इस तरह न जाने कितनी खेपें अब तक देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंची होंगी। निस्संदेह यह बेहद चिंता का विषय है। इसकी उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच होनी ही चाहिए।

हमारे देश के कई इलाकों में नशे का कारोबार इस कदर जड़ें जमा चुका है कि उसे समाप्त करना बहुत बड़ी चुनौती है। तमाम कोशिशों के बावजूद पंजाब, हिमाचल आदि के कुछ इलाकों में तो ऐसे नशे की गिरफ्त में आकर युवाओं के असमय मौत के मुंह में समा जाने की घटनाएं रुक नहीं पा रहीं। देश का शायद ही कोई महानगर हो, जहां ऐसे नशे के कारोबारियों ने अपना जाल न बिछा रखा हो। ये कारोबारी युवाओं को अपना शिकार बनाते हैं।

स्कूल-कॉलेजों में पढ़ने वाले युवाओं को नशे की लत लगाते हैं और जब वे इसकी गिरफ्त में आ जाते हैं, तो वे इस संजाल का हिस्सा बन जाते हैं। हेरोइन, चरस आदि जैसे नशे युवाओं के शरीर और दिमाग दोनों को इस कदर अक्षम बना देते हैं कि वे बिना इसके रह नहीं पाते। नशा न मिलने पर उनमें से कई खुदकुशी कर लेते हैं, कई दूसरे तरह के अपराध करने लगते हैं, अनेक ऐसे भी उदाहरण हैं जब ऐसे नशों के शिकार युवाओं ने अपने माता-पिता या किसी और परिजन की हत्या तक कर दी। फिर अंतत: उनकी दर्दनाक मौत होती है। कोई भी कल्याणकारी सरकार अपने युवा नागरिकों को इस तरह नशे की गिरफ्त में आकर मौत को गले लगाते नहीं देख सकती।

हालांकि नशे के कारोबार पर लगाम लगाने के लिए स्वापक नियंत्रण ब्यूरो यानी नार्कोटिक्स विभाग है। वह नशे के संजाल पर लगातार नजर रखता और उससे जुड़े लोगों की धर-पकड़ कर उसने ताने-बाने को तोड़ने का प्रयास करता है। पर हकीकत यह है कि अब तक वह छोटे-मोटे आपूर्तिकर्ताओं, नशा करने वालों को तो गिरफ्तार कर अपनी उपलब्धियां गिनाता रहा है, बड़े कारोबारी उसके चंगुल से बाहर ही रहे हैं। इस बात की कल्पना से भी सिहरन पैदा हो सकती है कि मुंद्रा बंदरगाह पर पकड़ी गई हेरोइन की खेप अगर देश के विभिन्न हिस्सों में पहुंच गई होती, तो कितने लोगों के खून में घुल कर उनका जीवन तहस-नहस करती। किसी बंदरगाह तक अगर कोई इतने बड़े पैमाने पर हेरोइन पहुंचाने का साहस कर सका, तो यह सवाल अपनी जगह है कि क्या वह पहले से ऐसा करता रहा है। उम्मीद की जाती है कि सरकार इस खेप के जरिए नशे के पूरे संजाल को पकड़ने और उसे ध्वस्त करने का प्रयास करेगी।

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