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‘धारणा’ के धारण से संभव मन का परिष्कार

अपने मन को अपनी इच्छा से अपने ही शरीर के अन्दर किसी एक स्थान में बांधने, रोकने या स्थिर कर देने का अभ्यास धारणा कहलाता है।

नरपतदान चारण

अपने मन को अपनी इच्छा से अपने ही शरीर के अन्दर किसी एक स्थान में बांधने, रोकने या स्थिर कर देने का अभ्यास धारणा कहलाता है। धारणा मन की एकाग्रता है। सामान्य रूप से यह एक बिन्दु, एक वस्तु या एक स्थान पर मन की सजगता को अविचल बनाए रखने की क्षमता है। योग शास्त्र के अनुसार धारणा का अर्थ होता है मन को किसी एक बिन्दु पर लगाए रखना, टिकाए रखना।

धारणा शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘धृ’ धातु से हुई है जिसका अर्थ होता है- आधार, नींव।’ अर्थात ध्यान की नींव, ध्यान की आधारशिला। धारणा से ही ध्यान तक अच्छी तरह जाया जा सकता है। धारणा परिपक्व होने पर ही ध्यान में प्रवेश मिलता है। कठोपनिषद् में धारणा को परिभाषित करते हुए सूत्र लिखा है – ‘तां योगमिति मन्यते स्थिरामिन्दिय धारणम्’। अर्थात मन और इंद्रियों का दृढ़ नियंत्रण ही धारणा योग है। वहीं, स्वामी विवेकानन्द के अनुसार धारणा का अर्थ है मन को देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थान में धारण या स्थापन करना।योगदर्शन (3/1) के अनुसार ‘देशबंधचित्तस्य धारणा’ अर्थात चित्त को किसी एक निश्चित स्थान विशेष मे स्थिर कर देना। यहां मन को स्थान विशेष में धारण करने का अर्थ है मन को शरीर के अन्य स्थानों से हटाकर किसी एक विशेष अंश के अनुभव में बलपूर्वक लगाए रखना।

कई कारणों से प्राय: हम मन एक स्थान पर नहीं टिका पाते। जैसे मन की जड़ता को स्वीकार ना करना। सात्विकता की कमी और सांसारिक पदार्थों व सांसारिक-संबंधों में मोह रहना। बार-बार मन को टिकाकर रखने का संकल्प नहीं करना। मन के शान्त भाव को भुलाकर उसे चंचल मानना। ऐसे अनेक कारण हैं, जिन से मन धारणा स्थल पर टिका हुआ नहीं रह पाता। इन कारणों को प्रथम अच्छी तरह जान लेना चाहिए, फिर उनको दूर करने के लिए निरन्तर अभ्यास करते रहने से मन एक स्थान पर लम्बी अवधि तक टिक सकता है, क्योंकि कुछ साधक ऐसे होते हैं जो धारणा के महत्व को नही समझ पाते और सीधे ध्यान में जाने का प्रयास करने लगते है, इससे नुकसान होता है। उनका न तो ध्यान ही लगता है और न ही वे धारणा में जा पाते है, इससे केवल उनका बहुमूल्य समय व्यर्थ होता है। इसलिए धारणा के बाद ही ध्यान में जाने का विधान बताया गया है।

प्रारंभिक योग साधको, योगियों को ध्यान करते समय ध्यान की अवस्था मे बीच-बीच में धारणा स्थल का ज्ञान बनाए रखना चाहिए जिससे मन मे भटकाव की अवस्था उत्पन्न न हो पाए। यह बात अवश्य याद रखनी चाहिए कि बिना धारणा बनाए ध्यान समुचित रूप में नहीं हो सकता। चूंकि धारणा से एकाग्रता बढ़ती है और इससे अनेक कार्य संपन्न होते हैं क्योंकि हमारी मानसिक ऊर्जा एक बिन्दु पर होती है। आध्यात्मिक एवं लौकिक दोनों प्रकार के कार्यों के लिए धारणा आवश्यक है। कोई भी छोटा से छोटा कार्य हो, उसे एकाग्रता से करने की आवश्यकता होती है।

बिना एकाग्रता के हम कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकते। जबकि एकाग्र मन वाला व्यक्ति कोई भी कार्य अधिक दक्षतापूर्वक कर सकता है। अत: दैनिक जीवन के साथ ही साथ आध्यात्मिक साधना के लिए धारणा आवश्यक है। उदाहरण के लिए हम मन की तुलना बल्ब से कर सकते हैं। एक बिजली के बल्ब का प्रकाश सभी दिशाओं में फैलता है, ऊर्जा बिखरती रहती है। आप उस बल्ब से पांच फुट की दूरी पर ताप का अनुभव नहीं कर सकते। यद्यपि उस बल्ब के मध्य स्थित फिलामेंट में पर्याप्त ताप विद्यमान होगा।

इसी प्रकार मन में प्रच्छन्न रूप में अपरिमित शक्ति है परन्तु यह सभी दिशाओं में बिखरी हुई है जो धारणा से केन्द्रित होती है। वशिष्ठ संहिता (4/11-15) में धारणा की महत्ता के सन्दर्भ में बताया गया है कि -पृथ्वी तत्व की धारणा से पृथ्वी तत्व पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। जल तत्व की धारणा से रोगों से छुटकारा मिलता है। अग्नि तत्व की धारणा करने वाला अग्नि से नहीं जलता। वायु तत्व की धारणा से वायु के समान आकाश विहारी होता है। आकाश तत्व में पांच पल की धारणा से जीव मुक्त होता है। जिस तरह किसी लक्ष्य पर बन्दूक से निशाना साधने के लिए बन्दूक की स्थिरता परमावश्यक है, ठीक उसी तरह ईश्वर को पाने के लिए भी हमारे मन को एक स्थान पर टिका देना अति आवश्यक है।

वैसे तो धारणा धारण करने के कई बिन्दु हैं लेकिन सर्वोत्तम स्थान हृदय को माना गया है। बहुत से लोग धारणा को ही ध्यान मान लेते हैं, ऐसा नहीं है। धारणा का अर्थ केवल मन को टिकाए रखना ही है। धारणा से मन को टिका कर अगली प्रक्रिया में ध्यान प्रारम्भ किया जाता है। धारणा से मन एकाग्र होता है। मन प्रसन्न, शान्त, तृप्त रहता है। मन की मलिनता का बोध अर्थात परिज्ञान होता है। मन के विकारों को दूर करने में सफलता मिलती है। ध्यान की पूर्व तैयारी होती है। इससे ध्यान सही रूप में लगता है।

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