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देसी उद्यम का ध्वज लक्ष्मण किर्लोस्कर

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स्वाधीनता संघर्ष के समांतर देश में उद्यम और तकनीक के साझे को कामयाबी के सुलेख में तब्दील करना शुरू कर दिया था। विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़ा करने और देश के औद्योगिक सामर्थ्य की नई इबारत लिखने वाले किर्लोस्कर का सबसे बड़ा योगदान कृषिप्रधान देश को तकनीकी सामर्थ्य से लैस करना है।

मेहनत और प्रतिभा के साथ दूरद्रष्टा के साथ जमीन से उठकर ऊंचाइयों को छूने वाले उद्यमी लक्ष्मण किर्लोस्कर।

एक गुलाम देश में देशज संस्कार के साथ उद्यम की कुबेरी बुलंदी को छूना आसान बात नहीं है। दरअसल, भारतीय इतिहास और आलोचना में जिस समय को नवजागरण का दौर कहा गया, उसी दौर में साहित्य और संस्कृति के समांतर बहुत कुछ ऐसा हो रहा था, जिसमें भारतीय गौरव और पुरुषार्थ नए सिरे से अपनी शिनाख्त गढ़ रहे थे। किर्लोस्कर समूह के संस्थापक लक्ष्मण काशीनाथ किर्लोस्कर भारत के उन बड़े उद्योगपतियों में हैं, जिन्होंने उद्यमी सामर्थ्य को साबित करने के लिए स्वाधीनता के आने का इंतजार नहीं किया बल्कि तमाम प्रतिकूलताओं और चुनौतियों के बीच आजाद खयाली के साथ अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते गए। उनका जीवन और उपलब्धियां एक रोमांचक यात्रा की तरह है।

किर्लोस्कर का जन्म 20 जून, 1869 को मैसूर के निकट बेलगांव में हुआ था। बचपन में पढ़ने में मन न लगने के कारण वे मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ आर्ट में भर्ती हो गए। पर शीघ्र ही उन्होंने अनुभव किया कि आंखों में खराबी के कारण वे रंगों की सही पहचान नहीं कर पाते हैं। इसके बाद उन्होंने मैकेनिकल ड्राइंग सीखी और मुंबई के विक्टोरिया जुबली टेक्निकल इंस्टीट्यूट में अध्यापक नियुक्त हुए। वे अपने खाली समय में कारखाने में जाकर काम किया करते थे। इससे उनको मशीनों और उनके कलपुर्जों की काफी जानकारी हो गई थी।


किर्लोस्कर ने जीवन में पहली बार एक व्यक्ति को साइकिल चलाते देखा तो काफी रोमांचित हुए। फिर क्या था, उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर ‘किर्लोस्कर ब्रदर्स’ नाम से साइकिल की दुकान खोल ली। वे अतिरिक्त समय में साइकिल बेचते, उनकी मरम्मत करते और लोगों को साइकिल चलाना भी सिखाते। नौकरी में जब उनकी जगह पर एक एंग्लो इंडियन को पदोन्नति दी गई तो उन्होंने अध्यापक का पद त्याग दिया। इसी दौरान साइकिल का काम छोड़ उन्होंने खेती के उपकरण बनाने में दिलचस्पी दिखाई। छोटा-सा कारखाना खोलकर वे चारा काटने की मशीन और लोहे के हल बनाने लगे।

इस बीच, बेलगांव नगर पालिका के प्रतिबंधों के कारण उन्हें अपना कारखाना महाराष्ट्र लाना पड़ा। यहां 32 एकड़ भूमि में उन्होंने ‘किर्लोस्कर वाड़ी’ नाम की औद्यागिक बस्ती की नींव डाली। देखते- देखते इस वीरान जगह की काया पलट गई। दरअसल, किर्लोस्कर ने यूरोप और अमेरिका में ‘इंडस्ट्रियलटाउनशिप’ के बारे में पढ़ा था। उनका सपना था कर्मचारियों के लिए स्वयं का उद्योग और एक उद्यमशील समाज का निर्माण करना। किर्लोस्कर वाड़ी उनके इसी ख्वाब की तामीर थी। यह सिलसिला आगे और बढ़ा। किर्लोस्कर की औद्योगिक इकाइयां बंगलोर, पूना और देवास (मध्य प्रदेश) आदि में भी स्थापित हो गईं। इनमें खेती और उद्योगों में काम आने वाले विविध उपकरण बनने लगे।

लोकमान्य तिलक, जवाहरलाल नेहरू, विश्वेश्वरैया, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी आदि तब के कई चोटी के नेता किर्लोस्कर के उद्यम के प्रशंसक थे। आजादी के बाद भारत अगर औद्योगिक क्षेत्र में तेजी से तरक्की करता गया तो उसके पीछे बड़ा योगदान किर्लोस्कर जैसे उद्यमियों का है, जिन्होंने स्वाधीनता संघर्ष के समांतर देश में उद्यम और तकनीक के साझे को कामयाबी के सुलेख में तब्दील करना शुरू कर दिया था। विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़ा करने और देश के औद्योगिक सामर्थ्य की नई इबारत लिखने वाले किर्लोस्कर का सबसे बड़ा योगदान कृषिप्रधान देश को तकनीकी सामर्थ्य से लैस करना है। 26 सितंबर, 1956 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले इस पुरुषार्थी जीवन से लोग आज भी प्रेरणा लेते हैं।

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