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देशांतर अंतर्दृष्टि

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इन दिनों दुनिया सिकुड़ गई है। आभासी दुनिया का एक नया जीवन कोलाज अब जीने का एक अभिन्न तरीका बन गया है।

सांकेतिक फोटो।

कृष्ण कुमार रत्तू

इन दिनों दुनिया सिकुड़ गई है। आभासी दुनिया का एक नया जीवन कोलाज अब जीने का एक अभिन्न तरीका बन गया है। पिछले दो वर्ष के कोरोना काल में जिस परिवर्तन से समूचा विश्व गुजर रहा है, उसने जीने का नजरिया भी बदल दिया है। इन दिनों इंटरनेट की दुनिया का नया आभासी चेहरा स्वीकार्य हो गया है। तकनीक और नई सूचना प्रौद्योगिकी के क्रांतिकारी विस्फोट से चकाचौंध भरी छोटी स्क्रीन पर दुनिया का पूरा मंजर दिखाई देने लगा है। ये आभासी दुनिया अब जीवन का एक स्थायी हिस्सा बन चुका है। चूंकि अब आने वाले समय में शायद कोरोना के साथ ही जीना होगा, इसलिए यह बदलाव अब जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए हैं।

इस कालखंड में समूचे विश्व में एक नई देशांतर अंतर्दृष्टि पैदा हुई है, जिसका बोध हर उम्र के बच्चे से लेकर वृद्धों तक दिखाई देता है। अब जब दुनिया में भौगोलिक सीमाओं का टूटना जारी है और एक नई आभासी दुनिया की बदलती जीवन शैली विज्ञान की इलेक्ट्रॉनिक यंत्र पर केंद्रित हो गई है। आज संवेदनाओं और प्रेम का पवित्र अहसास आभासी दुनिया की नई भाषिक शैली का परिवर्तित रूप दिखता है। फेसबुक, वाट्सऐप और ट्विटर से लेकर पॉडकास्ट और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर इसे केंद्रित कर दिया गया। अब इन दिनों जिंदगी का हर रंग और हर पहलू इस नए प्लेटफार्म पर देखा जा सकता है।

सूचना क्रांति के इस दौर में जिंदगी की डिजिटल आभासी छवि कुछ इस तरह की हो गई है कि सब कुछ आॅनलाइन में निहित हो गया है। उदाहरण के तौर पर अब किसी के लिए चिट्ठियां लिखना और बांचना इतिहास की चीज हो गई है। अब पोस्टमैन का इंतजार शायद ही कोई करता हो और पोस्टमैन भी अब प्यार से भरी चिट्ठियों के स्थान पर कंपनियों के पत्र और उपभोक्ता से जुड़े हुए बाजार के पत्र लेकर आपके पोस्ट बॉक्स में छोड़ देते हैं, क्योंकि सूचनाओं और संदेशों का आदान-प्रदान त्वरित गति से वाट्सऐप, फेसबुक और अन्य संचार माध्यमों में रच-बस गया है।

इस देशांतर अंतर्दृष्टि की नई मानवीय प्रवृत्ति भी बदल गई है और भाषा का विशेषकर हिंदी में जिस तरह का भाषा का विकास या विनाश, दोनो रंग, ढंग, संप्रेषण की इस नई दुनिया में दिखाई देते हैं, उसने भाषायी संसार के एक नए सोशल मीडिया भाषा संसार को प्रचलित और प्रचारित कर दिया है। अब उसमें हिंदी के साथ अंग्रेजी और अन्य देशी-विदेशी भाषाओं का जिस तरह से समावेश हुआ है, वह हमारी मानवीय प्रवृत्तियों के नए मनोविज्ञान को तो दिखाता ही है, लेकिन इसके साथ ही हमारे दिलो-दिमाग पर एक वैश्विक नई देशांतर अंतर्दृष्टि की छाप भी छोड़ता है। यही है आज की इस आभासी नई जिंदगी का चौंकाने वाला स्वरूप।

इस देशांतर मनोवैज्ञानिक अंतर्दृष्टि में भाषा अब कोई सीमा नहीं रही। मानवीय सरोकार उस तरह की उत्तेजना और उत्साह से भरे हुए नहीं रहे। सच तो यह है कि संवेदनाओं का एक नया शून्य संसार हमने अपने आसपास रचा-बसा लिया है और हमारी तमाम संवेदनाएं, रिश्ते, नई संभावनाएं, हमारे मोबाइल फोन की छोटी-सी स्क्रीन पर ही समाहित होकर रह गई हैं। क्या हमारे पास कभी फुर्सत होगी कि हम अपने बहुत कुछ पाने और विज्ञान के अमल से एक नई दुनिया बसाने के चक्कर में इंसान के मन-मस्तिष्क और रूह के संवाद का सब कुछ गंवा दिया है?

देशांतर मनोविज्ञान हमें भौगालिक सीमाओं से मुक्त करता है, लेकिन यह सच है कि मनुष्य की अंतर्दृष्टि का कोई भी दूसरा रूप अभी तक सामने नहीं आया है। हालांकि रोबोट से लेकर आकाश-पाताल तक विज्ञान की नई सूचनाओं की तकनीक ने मानवीय प्रकृति के नए सूचना, मनोरंजन और संसाधनों का संपूर्ण कायाकल्प कर दिया है। अब खौफनाक और विचलित कर देने वाले दृश्य छोटी स्क्रीन पर भी आपकी संवेदनाओं को छूते नहीं और यही इस नई वर्चुअल या आभासी तकनीक वाली नई पीढ़ी का सच है। अब यह एक आम प्रक्रिया का हिस्सा हो गया है।

देशांतर अंतर्दृष्टि में बदलाव कुछ इस तरह का हो गया है कि समय से पहले बच्चे वह सब वर्जित सामग्रियों को पंसद करने लगे हैं जो शायद अब से एक दशक पहले की पीढ़ी में परिवार की बात तो अलग सोचना भी वर्जित था। यही समय की नई धारा है और यही कोरोना के इस कालखंड का नई जिंदगी का नया चेहरा है, जिसको हम सब जी रहे है और जीते रहेंगे, क्योंकि यह सब अब हमारी जिंदगी का अभिन्न अंग बन चुका है।

अगर कोई भी व्यक्ति सचमुच इस सच के आसपास ही हैं तो फिर अपनी अंतर्दृष्टि को अपने अंतर्मन से जोड़ कर भारतीयता का चेहरा देखने की कोशिश तो करें शायद उसमें हमें पुराने फ्रेम में जड़ी हुई हमारे पुरखों की कोई तस्वीर और नसीहत का दृश्य मिल सके और हम अपनी विरासत की जड़ों की तरफ, अपनी मिट्टी की तरफ एक बार लौटने के बारे में सोच सकें, क्योंकि भारतीयता के प्रेम का दृश्य आपके गांव की मिट्टी की सोधी महक में ही रचा-बसा है।

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