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दरकार और सहकार

नीति आयोग भी अपनी ओर से यह बात कह रहा है कि छोटी जमीन वाले किसान ही हमारी फिक्र में ज्यादा रहने चाहिए।

नीति आयोग भी अपनी ओर से यह बात कह रहा है कि छोटी जमीन वाले किसान ही हमारी फिक्र में ज्यादा रहने चाहिए। नवाचार से जोड़कर संगठित किसानों को कंपनी बनाकर काम करने की आदत में लाने के लिए साल 2023 तक की मियाद रखी गई है। मगर मझोले किसानों को नए तौर-तरीकों से वाकिफ कराने का काम तय वक्तमें होने पर ही उद्यम के लिए साथ आए किसानों का मन तैयार हो पाएगा। थोड़ा पीछे मुड़कर देखें तो मुनाफाखोरी और सीनाजोरी की बयानी करती पचास के दशक की फिल्में ‘दो बीघा जमीन’ और ‘मदर इंडिया’ से लेकर आज तक किसान को हमेशा पिसता हुआ देखने के आदी समाज का सामना करने किसान जब खड़ा हुआ तो उसने अस्सी के दशक में अपने संगठन खड़े किए। अपने हक की आवाज को बुलंद किया और अब मुनाफे का मन बनाकर अपनी मेहनत का पूरा हिसाब लेने के लिए खुद कारोबार में कूद रहा है तो ये अपने आपको बाजार के बोझ से उबारने का सबसे कामयाब तरीका है।

पचास के दशक में आचार्य विनोबा के भूदान आंदोलन से जगी अलख के दौरान भूमिहीन किसानों को जोतने लायक जमीन हासिल हुई लेकिन उसकी तकदीर नहीं बदली। खेती पारंपरिक बनी रही और किसान अब जमींदारों के चंगुल से निकलकर बैंकों और कंपनियों का कर्जदार हो गया। उसकी तड़प का तोड़ एक ही था, पैदावार से लेकर कारोबार तक उसकी पकड़। हार्वर्ड बिजनस स्कूल के जान डेविस और गोल्डबर्ग ने साठ के दशक में ‘कांसेप्ट आफ एग्रीबिजनस’ के जरिए खेती और कारोबार के रिश्तों की गुत्थी बताई।

इसी दौरान साम्यवादी सोच दुनिया पर छा रही थी और आपसी साझेदारी से काम कर कमाई में बराबरी की बात सरकारों के हवाले से ही आगे बढ़ रही थी। मगर भारत तो सनातन काल से ही साझी सोच की पैरवी करता रहा है जिसके निशां खेती किसानी में इसलिए बाकी नहीं रहे क्योंकि जमींदारों की हुकूमतें किसानों के बूते ही कायम थीं। अपने पैमानों पर साझे खेतों की परंपरा तो हमारे देश के पश्चिमी इलाकों में भी रही है। जहां पानी के संकट से जूझते रेगिस्तान के किसान ‘खड़ीन’ जैसी विधियों से खेतों को मिलकर सींचने का तकनीक आज भी अपनाते हैं। पारिवारिक खेतों को बढ़ावा देने का संयुक्तराष्ट्र का तय किया 2019 से 2028 का लक्ष्य दुनिया से भुखमरी मिटाने के लिए है।

परंपरागत खेती से हासिल पोषण और विविधता के लिए भी पूरे परिवारों का खेती में जुटना ही टिकाऊ विकास का तरीका है। मगर किसानों के कारोबार में दाखिले पर इन अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का वैचारिक खुलापन भी उतना ही खुलकर नजर आना चाहिए। उपजाने वाले के पास अपनी ही उपज को संभालकर रखने का इंतजाम नहीं होने का फायदा बिचौलिए उठाते रहे हैं। पूरे देश का पेट भरने वाला किसान खुद कभी भूखा सोने को मजबूर हुआ तो सिर्फ इसलिए कि उसे कभी मौसम की मार ने तो कभी ब्याज के खेल ने मजदूर बनाकर छोड़ दिया। खेती के बूते दमदार हो रहे देश पर विदर्भ के किसानों की खुदकुशी के दाग ने इस मसले के हल की तरफ मोड़ा। रास्ता बाजार से तालमेल में ही नहीं बल्कि बाजार में कारोबारी की तरह दाखिल होने का ही बचा रहा, जिसे आज नीतियों के रास्ते पार करना आसान हो गया है।

महामारी के मुश्किल दौर में भी देश की पूंजी में आगे बढ़कर हिस्सेदारी करने वाला किसान अपनी उपज की कीमत के लिए भले ही दौड़-धूप करता दिख रहा हो मगर वो हर साल बाढ़ और अकाल की आहट सुनकर कांपता है। बाढ़ कई जानें लेकर जाती है और अकाल खेत-किसान-मवेशी सबको बदहाल कर जाता है। इस बीच, आबोहवा के बदलाव पर दुनिया में हो रही बहस के बीच खेती-बाड़ी के काम से उपजे कार्बन को कम करने के लिए भारत जैसे देशों पर दबाव बढ़ रहा है। मगर भारत की खेती अब जिस तरह उसकी आहट यही सुनाई दे रही है कि सेहत को लेकर बढ़ती फिक्र के बीच खेती-किसानी को अब तक नजरअंदाज करने वाला शहरी समाज भी उसी में कारोबारी गुंजाइश तलाशने निकला है। जैविक के नाम पर जो पैदावार हो रही है उसके लिए किसानों में भी नया सीखने की ललक बढ़ी है।

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