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तपते हुए उजाड़ रास्ते

आजकल देखें, तो सड़कों के किनारे फलों के पेड़ नहीं दिखाई देते।

बचपन के दिनों की बात है। पहली कक्षा में पढ़ती थी। उन दिनों पिताजी कन्नौज में थे। पास ही उन्नाव था, जहां से होकर गंगा बहती थी। एक दिन माता-पिता ने सोचा कि गंगा स्नान किया जाए। सवेरे-सवेरे चल दिए। स्टेशन से उतर कर पैदल चले। साथ में भाई भी थे। लंबी सड़क। दोनों ओर आमों से लदे पेड़। बस भाई सड़क से कंकड़ उठाते और वृक्षों की तरफ उछालते और कई आम नीचे गिर पड़ते। इस तरह जब तक गंगा के किनारे पहुंचे, पूरा थैला आम से भर चुका था। आम से भरे थैले को पिताजी ने गंगा के शीतल जल में डुबो दिया, जिससे कि आम ठंडे हो जाएं। बाद में ताजे खुशबूदार देसी आम खूब स्वाद लेकर खाए गए।

तब गांवों में भी बच्चों को जमीन पर पड़े फल किसी वरदान की तरह लगते थे। फलों के पेड़ों के पास से गुजरते हुए अमिया, जामुन, इमली आदि बीनना उनका प्यारा शौक होता था। वे स्कूल से आते-जाते ऐसे फल खूब बटोरते थे। जिन बच्चों को फल पाने का सौभाग्य नहीं मिलता, वे मायूस होते थे। कई बार जिन बच्चों को फल मिलते थे, वे दूसरे बच्चों के साथ बांट कर भी उन्हें खाते थे। तब यह भावना नहीं थी कि जमीन पर पड़ा फल कैसे खाएं। शहरों में ऐसा बहुत दिखाई देता है। कनाट प्लेस के टालस्टाय मार्ग पर बहुत से जामुन के पेड़ हैं। बरसात के मौसम में वहां इतने जामुन झरते हैं कि राहगीरों के पांवों से कुचलने के बाद, सड़क जामुनी हो जाती है। लेकिन मजाल है कि कोई उन्हें उठाता दिखे। ऐसा करना लोगों को अपनी शान के खिलाफ लगता है शायद।

आजकल देखें, तो सड़कों के किनारे फलों के पेड़ नहीं दिखाई देते। पुराने जमाने में सड़क के किनारे वे छायादार वृक्ष लगाए जाते थे, जहां जब राहगीर चलें तो पेड़ों की छाया उन्हें धूप-ताप से बचा सके। यही नहीं, जरूरत पड़ने पर लोग फल भी खा सकें। सड़कों के किनारे आमतौर पर ऐसे वृक्ष लगे होते थे, जिनकी उम्र लंबी होती है।

मगर इन दिनों जब सड़कों का निर्माण होता है, तो उनके किनारे पेड़ लगाने के बारे में नहीं सोचा जाता। अगर कुछ पेड़-पौधे लगाए भी जाते हैं तो वे सजावट के लिए होते हैं। सैकड़ों किलोमीटर में दौड़ते राजमार्गों पर नजर डालें, तो कहीं कोई पेड़ नहीं दिखता। दुर्योग से अगर रास्ते में कोई बस, कार या दुपहिया खराब हो जाए तो ऐसी कोई जगह तक नहीं, जहां दो पल के लिए आप चैन से खड़े हो सकें। आखिर सड़क और पेड़, वह भी छायादार और फलदार पेड़ों का जो रिश्ता था, उसे कैसे तोड़ दिया गया। नई दिल्ली में आज भी इमली, जामुन के पेड़ बहुतायत से दिखाई देते हैं, जिन्हें हमने नहीं, एक अंग्रेज ने लगवाया था, मगर इन दिनों जैसे किसी को ध्यान ही नहीं है। और तो और, पैदल चलने वालों की सुविधा का कोई ध्यान तक नहीं रखा जाता।

कई साल पहले एक बुजुर्ग को यमुना एक्सप्रेस वे के किनारे देखा था। वे बार-बार सड़क पार करने की कोशिश करते, लेकिन फर्राटेदार गाड़ियों को देखते हुए डर कर हट जाते। वे कौन थे, उन्हें कहां जाना था, इस उम्र में अकेले वहां क्यों थे, यह भी सोचने की बात है। मगर सड़क पार करने की इच्छा रखने वाले वे अकेले तो न रहे होंगे। ऐसी परेशानी में न जाने कितनी औरतें, बच्चे, यहां तक कि जानवर भी होते होंगे। और सड़क पार न हो पाए, तो इंतजार करने के लिए न कोई पेड़, न कुछ और कि दो पल सांस भी ले सकें।

हाल ही में पढ़ रही थी कि दिल्ली सरकार ने घोषणा की है कि यहां जिन सड़कों के किनारे पेड़ नहीं हैं, वहां पेड़ लगाए जाएंगे। अगर ऐसा है, तो अच्छी शुरुआत होगी। बड़े-बड़े राजमार्ग बनाने वाले तथा सरकारें इस ओर ध्यान देंगी कि सड़कों को पेड़ विहीन न किया जाए। ऐसे पेड़ लगाए जाएं, जो राहगीरों को छाया और फल भी दें। साथ ही वे ऐसे हों, जो भारतीय पारिस्थितिकी के अनुकूल हों। यही नहीं, इन पेड़ों को लगा कर ही जिम्मेदारी का अंत न मान लिया जाए। जब तक ये पनप न जाएं, उनकी देखभाल भी हो, जिससे कि ये दशकों तक लोगों की मदद कर सकें।

आने-जाने वाले भी इन्हें नष्ट न करें। इससे हरियाली भी बढ़ेगी। धूप, बरसात से बचाव भी होगा। बताते हैं कि शेरशाह सूरी ने जब पेशावर से कलकत्ते तक सड़क बनवाई थी, जिसे इन दिनों जीटी रोड कहा जाता है, वहां राहगीरों की सुविधा के लिए ऐसे ही पेड़ लगवाए थे। जब उस वक्त इतनी लंबी सड़क पर ऐसा हो सकता था, तो आज क्यों नहीं। जबकि आज तो तकनीक इतनी उन्नत है।

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