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जीत बिचौलियों की

सरकार ने तीन कृषि कानून वापस ले लिए। कोई मान रहा है कि अहंकार हार गया; कोई कह रहा है कि लोकतंत्र विजयी हुआ; कोई सरकार की हार और आंदोलन की जीत के रूप में इसे रेखांकित कर रहा है। पर सच्चाई यही है कि कृषि सुधार हार गए।

सरकार ने तीन कृषि कानून वापस ले लिए। कोई मान रहा है कि अहंकार हार गया; कोई कह रहा है कि लोकतंत्र विजयी हुआ; कोई सरकार की हार और आंदोलन की जीत के रूप में इसे रेखांकित कर रहा है। पर सच्चाई यही है कि कृषि सुधार हार गए।

कृषि उत्पादों के व्यापार और जिंसों की अंतरराज्यीय आवाजाही पर पहले वाले प्रावधान पुन: लागू हो जाएंगे। अब फिर किसान अपनी उपज एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना मंडी शुल्क चुकाए नहीं ले जा सकते। स्थानीय मंडियों के कानून के मकड़जाल और आढ़तियों का हस्तक्षेप जारी रहेगा। किसानों को अपनी निर्धारित और अधिसूचित मंडी में ही उपज बेचने की अनुमति होगी।

कृषि प्रसंस्करण उद्योग को धक्का लगेगा। उद्योग को गुणवत्ता युक्त कच्चे माल की कमी का सामना करना पड़ेगा। कांट्रैक्ट के प्रावधानों से किसानों को उनके खेत पर ही अच्छा मूल्य प्राप्त होने की आशा अब समाप्त हो गई। साथ ही प्रसंस्करण इकाइयों की सहूलियत का भी रास्ता भी बंद हो गया। फूड सेक्टर की कंपनियों की सीधी मांग से जहां किसानों को अधिक लाभ होता, वहीं कंपनियों को भी उचित मूल्य पर गुणवत्ता वाली उपज प्राप्त होती। अब घरेलू व्यापार के साथ जिंसों के निर्यात का प्रभावित होना तय है।

अब कृषि क्षेत्र में कानूनी सुधार की जिम्मेदारी राज्यों पर लौट आई है। सरकारी मंडियों के साथ निजी मंडियों की स्थापना से कारोबार में प्रतिस्पर्धा का खुलने वाला रास्ता फिर बंद हो गया है। इस क्षेत्र में पांच सौ निजी कृषि मंडियों के खोलने का प्रस्ताव तैयार था जो अब ठप हो जाएगा। गौरतलब है कि सहकारी संगठन नैफेड ने दो सौ मंडियों की स्थापना का मसौदा तैयार कर काम शुरू कर दिया था, आधा दर्जन कृषि मंडियों में काम चालू भी हो चुका था।

नई मंडियों की स्थापना के लिए सहकारी संस्थाओं के राज्यों के कानून के तहत लाइसेंस लेना पड़ेगा, यानी लाइसेंस राज की वापसी होगी। नई मंडियों में आढ़तियों का प्रावधान भी करना पड़ेगा। यानी बिचौलियों की बढ़ोतरी तय है, जिससे कृषि उपज की लागत में वृद्धि होना जारी रहेगा। आवश्यक वस्तु अधिनियम का दायरा, जो नए कानून में सीमित किया गया था, कानून हटते ही बढ़ गया। पुराने कानून में राज्य सरकारें विभिन्न कृषि जिंसों के मूल्य बढ़ते ही आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू कर देती हैं, जिससे किसानों को नुकसान होता है।

नए कानून में किसानों को नुकसान से सुरक्षित किया गया था। अब कृषि-कानून-सुधार की वापसी के साथ ही पुराने कानून लागू हो गए, यानी किसानों को नुकसान के लिए फिर तैयार रहना है। ये सारे तथ्य उन छोटे किसानों को कृषि में लागत और विपणन में सुरक्षा प्रदान करते थे। जिनके पास दो हेक्टेयर से कम जमीन है और जिनकी संख्या लगभग अस्सी फीसद (लगभग दस करोड़ परिवार)है, अब वे इसका लाभ खो चुके हैं।

कृषि कानूनों के रद्द होने से किसान नहीं, बल्कि बिचौलिए जीत गए हैं।

’मनोज श्रीवास्तव, नारायणपुर, सुल्तानपुर

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