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जंग में अमन का औजार

शांति और सौहार्द का रास्ता अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा से ही निकलेगा, जिसमें संस्कृति से जुड़ाव, राष्ट्र प्रेम, मानवीय मूल्यों की स्वीकार्यता तथा मानव-मात्र की एकता और सभी धर्मों-पंथों की बराबरी की पूर्ण स्वीकार्यता होगी।

मनुष्य के मष्तिष्क की सतत सक्रियता ही मानव सभ्यता के विकास का आधार रही है। जिज्ञासा की अंत:प्रेरणा और सर्जनात्मकता के कौशल नैसर्गिक रूप से मनुष्य को प्रकृति-प्रदत्त वरदान हैं। प्रकृति के रहस्यों के उद्घाटन में मानव जाति सदा ही संलग्न रही है, कहीं कम, कहीं अधिक। भारत की सभ्यता में ज्ञान-विज्ञान के रहस्योद्घाटन में भौतिकता से अधिक महत्त्व आध्यात्मिकता को दिया गया। इसी कारण यहां ज्ञान, बुद्धि, विवेक के अंतर को समझा और समझाया गया। इसी आधार पर यहां मनुष्य और प्रकृति के संवेदनशील संबंधों की व्यावहारिक परंपरा स्थापित की गई, समय के साथ यह शिथिल होती गई, और इस समय के ‘अधिकाधिक संग्रहण’ के प्रवाह में भारत भी बह रहा है।

अनेक कठिनाइयों का मूल विवेक की अनुपस्थिति में ज्ञान के स्वार्थ-परक दुरुपयोग में स्पष्ट ढूंढ़ा जा सकता है। 16 जुलाई, 1945 को पहला परमाणु विस्फोट लास अलामोस में किया गया। यह उस समय उपलब्ध विज्ञान द्वारा अर्जित सैद्धांतिक और प्रयोगात्मक ज्ञान तथा कौशल और तकनीकी का चरम बिंदु था। वैज्ञानिक अति प्रसन्न थे, उनके प्रयास को बड़ी सफलता जो मिली थी। वे उर्जा के नए विकल्पों को लेकर आश्वस्त थे, वे उस नए खुले अपरिमित ऊर्जा क्षितिज में, मानव हित में परमाणु शक्ति का उपयोग और कहां-कहां संभव होगा, इस पर गहराई से मनन-चिंतन में व्यस्त हो गए थे।

द्वितीय विश्वयुद्ध चरम पर था, मित्र-पक्ष के सत्ता में बैठे राजनेता भी अति प्रसन्न थे, उन्हें एक ऐसा हथियार मिल गया था, जिसने द्वितीय विश्वयुद्ध में उनकी विजय सुनिश्चित कर दी थी। हिटलर के आदेश से जो वैज्ञानिक इसी दिशा में प्रयास कर रहे थे, वे परमाणु बम बनाने में पीछे रह गए थे। ज्ञान के उपयोग या दुरुपयोग सत्ता में बैठे लोग ही करते हैं। अगर वहां मानवीय तत्त्व तथा विवेक अनुपस्थित हों, तो हिरोशिमा होगा, नागासाकी होगा! उस समय द्वितीय विश्व युद्ध जय-पराजय निश्चित कर बंद हो गया। आगे युद्ध न हों, इसके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई, सुरक्षा परिषद बनी, मगर न तो युद्ध रुके, न ही हिंसा रुकी।

जब सामान्य विद्वतजन परमाणु ऊर्जा की उपलब्धता- और विशेषकर उसके दुरुपयोग से- होने वाली समस्याओं को प्रस्तुत कर रहे थे, आइंस्टीन नें उसे यो कहा : ‘परमाणु ऊर्जा की उपलब्धता से नई समस्याएं पैदा नहीं हुई हैं। इसने पहले से उपस्थित समस्या के त्वरित समाधान की आवश्यकता को ही उजागर कर दिया है। जब तक विश्व में संप्रभु राष्ट्र और उनकी अति-शक्तिशाली सरकारें हैं, युद्ध रुकेंगे नहीं, वे तो अवश्यंभावी हैं।’ उनके अनुसार युद्ध कब होंगे, यह कहना संभव नहीं है, लेकिन होंगे अवश्य। परमाणु उर्जा के उद्भव के बाद युद्ध की विनाशक क्षमताएं और भयानक होंगी। यह सिद्ध हो चुका है और परमाणु हथियारों की बेपनाह प्रतिस्पर्धा इसे आगे भी जारी रखेगी।

उक्रेन और रूस का युद्ध भी आइंस्टीन की भविष्यवाणी को एक बार फिर सत्यापित कर रहा है। अनुमान है कि सौ से अधिक देश इस युद्ध से सीधे प्रभावित हो रहे हैं। एक-दो को व्यापार में संभवत: लाभ भी हुआ हो, मगर वह लाभ लाशों के ऊपर अर्जित ही माना जाएगा। वैश्वीकरण के इस युग में आवागमन का ताना-बाना, संचार तकनीकी, व्यापार, अप्रवासन जैसे अनेक कारणों से कोई देश कहीं भी हो रहे युद्ध से अछूता नहीं रह सकेगा। जहां युद्ध नहीं हो रहे हैं वहां की स्थिति में भी अनेक प्रकार के तनाव, हिंसा, असुरक्षा, आतंकवाद, सत्ता के लिए नैतिकता को ताक पर रख कर हो रही दौड़ से अछूती नहीं है।

प्रजातांत्रिक मूल्यों पर अनेक प्रकार के प्रहार हर तरफ दिखाई दे रहे हैं। अफगानिस्तान मध्ययुगीन सोच के कारण ध्वस्त हो चुका है, श्रीलंका आर्थिक दिवालिएपन से जूझ रहा है, पाकिस्तान भारत से प्रतिस्पर्धा और उसे हजार जख्म देने की नीति के कारण आतंकवाद को बढ़ावा देकर अब स्वयं ही उससे उबर नहीं पा रहा है। यूरोप आप्रवासियों के आगमन से त्रस्त है, अमेरिका कब किस युद्ध में कूद पड़े, कोई कह नहीं सकता। भारत की अपनी समस्याएं हैं, जो उसकी प्रगति और विकास की परियोजनाओं से ध्यान हटाती हैं।

राष्ट्र की उर्जा और संसाधनों का एक बड़ा भाग हिंसक गतिविधियों की रोकथाम, आतंकवाद से सुरक्षा तथा पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के समक्ष सैन्य-बल और अस्त्र-शस्त्र में सदैव तैयार रहने की बाध्यता में व्यय होता है। पाकिस्तान कभी अमेरिका और कभी चीन के कंधे पर अपना दुख-दर्द बयान करता रहता है। कभी वह आइएमएफ के दरवाजे पर पहुंचता है, तो कभी सऊदी अरब से ऋण मांग रहा होता है।

जब राजनीति में नैतिक तत्व का ह्रास हो जाता है, तब ऐसे अनेक उदाहरण सामने आते हैं, जहां सरकारें समाधान खोजने में विफल रहने पर दूसरे देशों पर आरोप लगाती हैं। जो वर्तमान परिस्थितियों में उस शांति स्थापना की संभावना दूर-दूर तक नहीं है, जिसके लिए यूनेस्को के संविधान के आमुख में लिखा गया था कि युद्ध मनुष्य के मस्तिष्क में प्रारंभ होते हैं अत: शांति की संरचना भी मनुष्य के मष्तिष्क में ही करनी होगी।

इस शांति स्थापना के लिए तीन आधारभूत तत्त्व यूनेस्को के नाम में ही सम्मिलित किए गए थे: शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति। जिन देशों नें गुलामी का दौर देखा था, उन सभी में शिक्षा-व्यवस्थाएं बाहर से लाकर रोपित की गई थीं, और उनके उद्देश्य सीमित तथा शासकों के हित को ध्यान में रख कर निर्मित किए गए थे।

सत्तर-अस्सी साल के अनुभव के आधार पर अब यह वैश्विक स्तर पर मान्य है कि हर देश की शिक्षा व्यवस्था की जड़ें गहराई तक वहां की संस्कृति में जानी चाहिए, और उसकी प्रतिबद्धता विकास के लिए नए ज्ञान को स्वीकार करने की होनी चाहिए। शांति और सौहार्द का रास्ता अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा से ही निकलेगा, जिसमें संस्कृति से जुड़ाव, राष्ट्र प्रेम, मानवीय मूल्यों की स्वीकार्यता तथा मानव-मात्र की एकता और सभी धर्मों-पंथों की बराबरी की पूर्ण स्वीकार्यता होगी। इनकी अनुपस्थिति से अनेक नकारात्मक पक्ष बहुधा उभरते हैं, जो देश कि प्रगति में बाधक तो बनते ही हैं, देश की अंतरराष्ट्रीय छवि को भी आघात पहुंचाते हैं।

संविधान सर्वधर्म समभाव, समादर और बराबरी का संदेश देता है। इसके लिए आवश्यक है कि चौदह साल तक- और नई शिक्षा नीति के अनुसार अठारह वर्ष तक- सभी बच्चों को राष्ट्रीय स्तर पर निर्मित पाठ्यक्रम पढ़ना आवश्यक होना चाहिए। वे यहां पंथनिपेक्ष तथा सब धर्मों की बराबरी से न केवल परिचित हों, उनका दृष्टिकोण भी वैसा ही बने।

भारत को अपनी शिक्षा-व्यवस्था का क्रियान्वयन करते समय 1909 में लिखी ‘हिंद स्वराज’ में पश्चिमी सभ्यता के संबंध में कहे गांधी के इन शब्दों का समसामयिक संदर्भ सदा याद रखना चाहिए : ‘यह सभ्यता दूसरों का नाश करने वाली और खुद नाशवान है। इससे दूर रहना चाहिए और इसीलिए ब्रिटिश पार्लियामेंट और दूसरी पर्लियामेंटें बेकार हो गई हैं।’

उन्होंने उसी के आगे यह भी कहा था कि यह सभ्यता कोई अमिट रोग नहीं है और इससे छुटकारा पाया जा सकता है। मगर छुटकारा पाने का प्रयास न तो यूरोप ने किया और न ही अन्य देशों नें। आज से सत्तर-अस्सी साल पहले जितने भी देश साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त होकर स्वतंत्र हुए, वे सभी पश्चिम की सभ्यता की चमक-दमक से इतने प्रभावित थे कि उसी ओर खिंचे चले गए। क्या भारत विश्व-बंधुत्व की नई व्यावहारिक व्यवस्था का उदाहरण बनने का उत्तरदायित्व लेने का साहस करेगा?

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