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चिराग तले अंधेरा

ममता केंद्र सरकार के इशारे पर भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों के नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजंसियों के इस्तेमाल को तो मुद्दा बना ही रही हैं, चाहती हैं कि 2024 के चुनाव में सभी दल भाजपा का एकजुट होकर मुकाबला करें।

चिराग पासवान अपने सियासी करियर के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। एक के बाद एक झटके लगे हैं रामविलास पासवान के बेटे को। ताजा झटका 12 जनपथ स्थित वह सरकारी बंगला खाली हो जाने से लगा है, जो उनके पिता को 1990 से आंबटित था। चिराग खुद बिहार की जमुई सीट से लोकसभा सांसद हैं। चाहते थे कि पिता के नाम पर आबंटित यह चर्चित बंगला उन्हें मिल जाए। पिता की तो पात्रता थी पर सरकारी नियमों के मुताबिक उनकी नहीं। पासवान तो कई बार न केवल सांसद रहे बल्कि केंद्र में मंत्री भी रहे।

जब 2020 में उनका निधन हुआ तब भी वे राज्यसभा के सदस्य ही नहीं केंद्रीय मंत्री भी थे। चिराग पहली बार 2014 में सांसद बने थे। उन्होंने ही अपने पिता को यूपीए छोड़कर राजग में आने की सलाह दी थी। इसके लिए पासवान ने उन्हें श्रेय भी दिया। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में भी लोजपा के छह लोकसभा सदस्य जीते। अगले साल रामविलास बीमार हुए तो उनकी पार्टी में कलह भी बढ़ गई। नीतीश कुमार से उनकी पटी नहीं। नतीजतन 2020 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने राजग से तो किनारा कर लिया पर यूपीए में भी नहीं गए।

अकेले लड़े और भाजपा-जद (एकी) के 20 सीट के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। भाजपा उम्मीदवारों का तो विरोध किया नहींं पर जद (एकी) के हिस्से की सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे। चुनाव के दौरान खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान बताते रहे। नतीजा आया तो सारे अरमान धरे रह गए। जद (एकी) के चालीस उम्मीदवारों की हार का श्रेय और उसे भाजपा से भी नीचे पहुंचाने का श्रेय तो ले लिया, खुद एक ही सीट जीत पाए। इस इकलौते विधायक को भी जद (एकी) ने तोड़ लिया।

नीतीश के दबाव में पिता की राज्यसभा सीट भी भाजपा ने उनकी मां रीना पासवान को देने की उनकी मांग नहीं मानी। ऊपर से चाचा पशुपति कुमार पारस ने नीतीश से हाथ मिला लिया। छह में से पांच सांसद पारस के खेमे में थे तो संसद में लोजपा के नाते मान्यता भी उन्हीं को मिली। पिता का मंत्रिपद भी भाजपा ने उनके बजाए उनके चाचा को दे दिया। अब सरकारी आवास खाली होने के मुद्दे पर समर्थन में आए तेजस्वी और जीतनराम मांझी। चाचा-भतीजे ने एक-दूसरे पर लांछन भी लगाया। मुसीबतों से घिरे चिराग अब खुद को प्रधानमंत्री का हनुमान नहीं बताते।

इंतजार-ए-फरमान

कांग्रेस पार्टी के हिमाचल से राज्यसभा सांसद आनंद शर्मा का कार्यकाल मार्च-अप्रैल में खत्म हो रहा है। ऐसे में हिमाचल से अब राज्यसभा किसे भेजा जाए यह तय नहीं हो पा रहा है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर, उनका खेमा और संघ चाहते हैं कि भाजपा के राष्टÑीय कार्यालय में कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे को हिमाचल से राज्यसभा भेजा जाए। जब पांडे हिमाचल में संगठन मंत्री थे उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के विरोध के बावजूद इन लोगों को आगे बढ़ाया था। पांडे के एक करीबी बताते हैं कि पांडे जब हिमाचल से चले गए थे तो उन्हें विदाई देने के लिए समारोह में तत्कालीन मंत्रिमंडल के कई मंत्री व नेता शामिल होने जा रहे थे। लेकिन सचिवालय से फोन कर के इन मंत्रियों को वापस बुलाया गया।

यह तब की बात है जब धूमल मुख्यमंत्री थे। अब धूमल भी हाशिए पर हैं। लेकिन भाजपाइयों का कहना है कि अब पांडे के रास्ते में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा अड़ंगा डाल रहे हैं। नड्डा और पांडे में भी किसी बात को लेकर छत्तीस का आंकड़ा है। अब सब कुछ पांडे की किस्मत पर है कि क्या होता है। पिछली बार भी राज्यसभा जाने के लिए इंदु गोस्वामी का कहीं कोई नाम नहीं था। लेकिन आलाकमान से आखिरी मौके पर फरमान आया व जयराम व उनकी मंडली को इंदु गोस्वामी के नाम पर मुहर लगाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। इस बार भी कहा जा रहा है फरमान तो आलाकमान की ओर से ही आएगा व कोई ना-नुकुर नहीं कर पाएगा।

ममता की महत्वाकांक्षा

गैर भाजपा दलों की एकता की ममता बनर्जी की अपील पर आम आदमी पार्टी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं जताई है। ममता केंद्र सरकार के इशारे पर भाजपा विरोधी क्षेत्रीय दलों के नेताओं के खिलाफ केंद्रीय एजंसियों के इस्तेमाल को तो मुद्दा बना ही रही हैं, चाहती हैं कि 2024 के चुनाव में सभी दल भाजपा का एकजुट होकर मुकाबला करें। पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतने के बाद ममता ने एलान किया था कि वे अब राष्ट्रीय राजनीति में उतरेंगी। त्रिपुरा और गोवा जैसे राज्यों में तृणमूल कांगे्रस के चुनावी जंग में कूदने के पीछे मकसद ममता की प्रधानमंत्री पद की महत्वाकांक्षा ही मानी जाएगी। वे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव के समर्थन के लिए लखनऊ और वाराणसी भी पहुंची थीं। लेकिन अखिलेश यादव का सत्ता हासिल करने का सपना पूरा नहीं हुआ।

गनीमत है कि उन्होंने हकीकत को समझते हुए लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी। सूबे की सियासत पर फोकस करने की बात कह दी। साफ है कि प्रधानमंत्री पद की हसरत कम से कम 2024 में तो उनकी नहीं है। शरद पवार पहले ही कह चुके हैं कि उनकी पार्टी छोटी है। नीतीश अब भाजपा के रहमोकरम पर मुख्यमंत्री हैं। साफ है कि गैर कांगे्रसी विपक्ष की तरफ अब मैदान में ममता और अरविंद केजरीवाल ही दिखते हैं। वहीं केजरीवाल का ध्यान अब हिमाचल और गुजरात पर है।

(संकलन : मृणाल वल्लरी)

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