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चिप संकट से बेहाल उद्योग

लेकर दवा और वाहन उद्योग तक पर इसका भारी असर पड़ा है क्योंकि इन सारे उद्योगों में पिछले दो दशकों में चिपों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।

अभिषेक कुमार सिंह

यह सिर्फ एक मुहावरा भर नहीं है कि चींटी जैसा नन्हा प्राणी भी हाथी जैसे विशालकाय जीव को हिला सकता है। असल में, भौतिक जगत में भी ऐसे कई उदाहरण हैं जो साबित करते हैं कि छोटी-से-छोटी चीज भी कई बार इतनी महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि उससे दुनिया की चाल डगमगा सकती है। इस कायदे को मौजूदा वक्त की किसी समस्या से जोड़ना चाहें तो इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में काम आने वाली मामूली-सी दिखने वाली एक चिप की कमी ने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।

यह चिप असल में सेमीकंडक्टर (अर्धचालक) है और कोरोना काल में इसके निर्माण और आपूर्ति में भारी कमी आई है। इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग से लेकर दवा और वाहन उद्योग तक पर इसका भारी असर पड़ा है क्योंकि इन सारे उद्योगों में पिछले दो दशकों में चिपों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। एक अनुमान के मुताबिक इस वक्त इलेक्ट्रॉनिक सामान बनाने वाले करीब पौने दो सौ तरह के उद्योगों को चिपों की कमी के संकट से जूझना पड़ रहा है।

चिपों के अभाव के असर का आकलन करना हो तो पिछले कुछ महीनों में विभिन्न उद्योगों से आई खबरें इसका अंदाजा देती हैं। हाल में भारत के एक बड़े वाहन निर्माता टाटा मोटर्स ने अपने एक प्रमुख ब्रांड के उत्पादन में कमी होने की बात कही। मर्सीडीज-बेंज, ऑडी और बीएमडब्ल्यू जैसी महंगी गाड़ियों का उत्पादन भी चिपों की कमी के चलते घटा है। इससे पहले दूसरी तमाम कार कंपनियों ने महंगी श्रेणी में आने में वाली कारों की आपूर्ति में काफी ज्यादा विलंब होने की बात स्वीकार की है।

हालत यह है कि ग्राहकों को आठ-दस महीने तक का इंतजार करना पड़ रहा है। और मामला सिर्फ वाहनों तक ही सीमित नहीं है, स्मार्टफोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, टेलीविजन और इलाज में काम आने वाले उपकरणों-मशीनों तक के निर्माण में चिप काम आते हैं। इसलिए अब उस हर सामान की आपूर्ति में बाधा पैदा हो गई है, जिसके निर्माण में चिप का उपयोग होता है। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि चिप एक तरह से वैश्विक अर्थव्यवस्था की धुरी भी बन चुकी है। समस्या गंभीर इसलिए भी है कि चिपों के निर्माण और आपूर्ति के सामान्य होने में अभी एक से डेढ़ साल और लग सकता है। वाहन कंपनियों को चिप आपूर्ति करने वाली प्रमुख कंपनियों- बॉश और सैमसंग ने पहले ही साफ कर दिया है कि अभी साल भर तक चिपों की कमी बनी रह सकती है।

वैसे तो कोरोना काल में थमी तमाम आर्थिक गतिविधियों को चिप उत्पादन संकट से भी जोड़ा जा सकता है, पर इसके पीछे यही अकेला कारण नहीं है। फैक्ट्रियों में कर्मचारियों और श्रमिकों की कम उपस्थिति से जूझ रही चिप निर्माता कंपनियों का कामकाज जिन अन्य वजहों से प्रभावित हुआ, उनमें चीन-ताइवान तनाव और जापान की चिप निर्माता कंपनी ‘रेनेसां’ में हुए अग्निकांड जैसे बड़े कारण भी रहे। उधर, दुनिया में चिप संकट गहराने के बाद अमेरिका ने हुआवे जैसी कई चीनी कंपनियों के लिए अमेरिकी चिपों की आपूर्ति रोक दी थी। पर इनसे ज्यादा बड़ी वजह यह रही कि कोरोना काल में पूरी दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक सामान की मांग तेजी से बढ़ी।

पढ़ाई से लेकर ज्यादातर आर्थिक गतिविधियां आॅनलाइन होने लगीं। स्मार्टफोन, लैपटॉप, कंप्यूटर जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान चिपों से बने होते हैं, इसलिए मांग के अनुरूप चिप की आपूर्ति नहीं होने से संकट बढ़ता गया। यही नहीं, कोरोना काल में सार्वजनिक परिवहन के साधनों पर रोक होने के कारण कारों की मांग भी बढ़ती गई। चूंकि आजकल ज्यादातर कारें इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों और खूबियों से सुसज्जित होती हैं, जिनमें चिपों का इस्तेमाल होता है, इसलिए यह चिप अचानक भारी मांग वाले तत्वों में शुमार हो गई।

ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर चिप में ऐसा क्या है कि यह इलेक्ट्रॉनिक सामान का अभिन्न हिस्सा बन गई है। दरअसल आज इलेक्ट्रॉनिक सामान के निर्माण में चिप एक अभिन्न हिस्सा बन गई है। बिना चिप के इनका निर्माण संभव नहीं है। किसी इलेक्ट्रॉनिक वस्तु में चिप की क्या भूमिका होती है और कैसे काम करती है, इससे जानना काफी दिलचस्प है। विज्ञान की भाषा में अर्धचालक को चालक और गैर-चालक (इंसुलेटर) के बीच की कड़ी माना जाता है। इस आधार पर अपने भीतर से बिजली प्रवाहित करने के मामले में धातु और सिरामिक के बीच की क्षमता वाला अवयव यानी चिप महत्त्वपूर्ण साबित होता है।

प्राय: सिलिकॉन या जरमेनियम जैसे तत्वों से बने चिपों में कुछ अन्य धातुएं मिला कर उनकी चालकता में बदलाव किया जाता है। चिप का फायदा यह है कि ताप बढ़ने पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण काम करना बंद नहीं करते हैं। साथ ही, उपकरणों को ठंडा रखने और उनमें विद्युत प्रवाह सुचारू रखने के लिए पहले जैसे भारी-भरकम प्रबंध नहीं करने पड़ते हैं। यह काम बेहद छोटे चिप यानी अर्धचालकों कराया जाता है। इससे कंप्यूटरों सहित तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आकार घटाने में मदद मिली है। आज कंप्यूटर, लैपटॉप, टेलीविजन का आकार-प्रकार पहले के मुकाबले कम इसीलिए संभव हो पाया है कि इसके केंद्र में असल में चिपों की भूमिका है। इसके अलावा टच स्क्रीन या टच बटन वाले उपकरणों के पीछे भी चिपों का ही करिश्मा है।

ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि जब चिप इतनी ही जरूरी चीज है तो दुनिया में इसे बनाने वाली कंपनियां कुछ ही देशों तक ही क्यों सिमटी हुई हैं। चिप बनाने वाली ज्यादातर प्रमुख कंपनियां फिलहाल ताइवान और अमेरिका में ही हैं। ताइवान की मशहूर- ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्यूफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) दुनिया की मांग के एक चौथाई चिपों का उत्पादन करती है। दावा तो यहां तक किया जाता है कि तमाम नाराजगी के बावजूद चीन अगर ताइवान के खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं कर पा रहा है तो इसके केंद्र में अर्धचालक यानी चिप ही हैं क्योंकि चीनी कार्रवाई से अगर ताइवान में चिप उत्पादन रुकता है तो चीन की हजारों इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों का भट्ठा बैठ जाएगा।

असल में चिप बनाना आसान नहीं है। इसके निर्माण के चार-पांच चरण होते हैं जिनमें महारत हासिल करना सबके लिए आसान नहीं है। फिर पेटेंट का मसला भी है। कोई भी कंपनी बिना पेटेंट लिए चिप नहीं बना सकती और पेटेंट का भारी-भरकम शुल्क हर दूसरी कंपनी के लिए बड़ी बाधा बनता है। इसलिए दुनिया चिपों की आपूर्ति के लिए चुनिंदा कंपनियों पर ही निर्भर है। हालांकि चिपों की मांग को देखते हुए कई बड़ी कंपनियां दुनिया के विभिन्न देशों में अपने संयंत्र लगाना चाहती हैं। लेकिन इसके लिए उस तरह की कई बुनियादी सुविधाओं की जरूरत होती है जैसी चीन में बताई जाती है और जिसके आधार पर चीन में आईफोन के लिए एप्पल तक ने अपने संयंत्र लगाए हैं। पर चीन के बारे में यह धारणा बन गई है कि वहां तकनीक को आसानी से चोरी कर लिया जाता है, इसलिए बड़ी कंपनियां अब वहां अपनी परियोजनाएं नहीं ले जाना चाहती।

ऐसे में भारत में चिप निर्माण के लिए अच्छे अवसर बन रहे हैं, बशर्ते सरकार इस पर ध्यान दे। भारत में कच्चा माल और श्रमिक- दोनों की उपलब्धता को लेकर कोई समस्या नहीं है। समस्या नीतिगत स्तर पर है, जिसमें केंद्र और राज्य सरकारों की भूमिका होती है। हाल में दो प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियों ने भारत में अपने कारखाने बंद किए हैं, जिसे देखते हुए अंतरराष्ट्रीय उद्योग जगत में भारत के बारे में एक नकारात्मक संदेश गया है। इसलिए अगर भारत को आइटी या सॉफ्टवेयर के अगुवा देश से आगे बढ़ा कर चिप जैसी वस्तुओं का निर्माण का केंद्र बनाना है तो इससे बेहतर मौका नहीं होगा।

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