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घाटी में आतंकी

सुरक्षाबलों का दावा है कि घाटी में इस साल एक सौ अस्सी आतंकी मारे गए। इनमें बीस पाकिस्तानी और बाकी स्थानीय थे। स्थानीय स्तर के आतंकियों में ज्यादातर नौजवान बीस से पच्चीस साल के बीच के थे, जो पिछले एक साल के दौरान ही आतंकी संगठनों के साथ जुड़े थे।

कश्मीर में आतंकियों के बढ़ते हमले बता रहे हैं कि प्रदेश में हालात अभी भी सामान्य नहीं हैं। आए दिन सुरक्षा बलों और नागरिकों पर हमले हो रहे हैं। पिछले तीन महीनों में ये हमले ज्यादा बढ़े हैं। जाहिर है, राज्य में आतंकियों का नेटवर्क कमजोर नहीं पड़ा है। सुरक्षा बलों ने दो दिन पहले दक्षिण कश्मीर के अनंतनाग और कुलगाम जिले में दो मुठभेड़ों में छह आतंकियों को मार गिराया। इनमें कश्मीर टाइगर्स फोर्स (केटीएफ) का स्वयंभू कमांडर और दो पाकिस्तानी आतंकी भी थे।

चौंकाने वाली बात यह है कि इन लोगों के पास से जो हथियार मिले वे अमेरिका में बने हैं। इससे यह तो साफ हो गया है कि पाकिस्तान न सिर्फ आतंकियों को भारत में घुसाता रहा है, बल्कि उन्हें हथियारों की आपूर्ति भी कर रहा है। घाटी में ड्रोन के जरिए हथियार पहुंचाने के मामले सामने आते ही रहते हैं। गौरतलब यह भी है कि इस साल अगस्त में अफगानिस्तान में से लौटी अमेरिकी सेना अपने ज्यादातर हथियार वहीं छोड़ गई थी। फिर ये हथियार पाकिस्तान के बाजारों में बिकने लगे। ऐसे में इस बात की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिकी हथियार इसी जरिए आतंकियों तक पहुंचाए जा रहे हों।

अगस्त 2019 में कश्मीर से धारा 370 को हटा देने के बाद से दावा किया जाता रहा है कि इससे आतंकी घटनाओं पर लगाम लगी है। प्रदेश में उग्रवादियों के खिलाफ सेना ने बड़ा अभियान भी छेड़ा हुआ है। लेकिन आतंकी हमलों में कमी नहीं आई है। इसका बड़ा कारण स्थानीय स्तर पर आतंकियों को मदद मिलना भी बताया जाता है। हालांकि सुरक्षा बलों की सख्ती से कुछ समय के लिए आतंकी हमलों में कमी दिखी थी, लेकिन बाद में अचानक से हमलों में तेज होने लगे। पंचायत चुनावों के दौरान भी राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों पर हमले कर उग्रवादियों ने राजनीतिक प्रक्रिया को पटरी से उतारने की कोशिश की थी।

कुछ महीने पहले दूसरे प्रदेशों से आए कामगारों पर ताबड़तोड़ हमलों ने सरकार और सुरक्षाबलों की नींद उड़ा दी। हकीकत यह है कि घाटी में लश्करे-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद के लिए काम कर रहे आतंकियों ने अब स्थानीय स्तरों पर अपने गुट बना लिए हैं। कश्मीर टाइगर्स फोर्स भी इन्हीं में से है। इसी संगठन ने तेरह दिसंबर को पुलिस की बस पर हमला किया था, जिसमें तीन जवान शहीद हो गए थे। मुश्किल यह भी कि आतंकियों का नेटवर्क ग्रामीण इलाकों में ज्यादा मजबूत है। आतंकी घने जंगलों में छिपे रहते हैं, जहां पहुंच पाना सुरक्षाबलों के लिए भी आसान नहीं होता।

सुरक्षाबलों का दावा है कि घाटी में इस साल एक सौ अस्सी आतंकी मारे गए। इनमें बीस पाकिस्तानी और बाकी स्थानीय थे। स्थानीय स्तर के आतंकियों में ज्यादातर नौजवान बीस से पच्चीस साल के बीच के थे, जो पिछले एक साल के दौरान ही आतंकी संगठनों के साथ जुड़े थे। इससे यह पता चलता है कि आतंकी संगठनों में स्थानीय नौजवानों की भर्ती का काम गुपचुप तरीके से जारी है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आतंकी संगठनों के लिए काम करने वाले ज्यादातर नौजवान वे हैं जो बेरोजगार हैं। अभी भी दो सौ के करीब आतंकियों के मौजूद होने की बात कही जा रही है, जिनमें नब्बे आतंकी विदेशी हैं। ये हालात बता रहे हैं कि आतंकियों के जाल को तोड़ पाना आसान नहीं है। ऐसे में कैसे मान लिया जाए कि घाटी में आतंकवाद अब कमजोर पड़ चुका है।

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