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गांधी और पश्चिमी क्रांतियां

दरअसल, गांधी की दृष्टि में पूरी मानवजाति है। इसलिए वे उपनिवेशों के लोगों को भी उतनी ही अहमियत देते हैं, जितनी यूरोप के समाजों को। वे देख पा रहे थे कि पूंजी के विकास के लिहाज से पश्चिम दोहरे मानदंड अपनाता है। वहां हुई प्रजातांत्रिक क्रांतियां जिन महान मूल्यों की बात करती हैं, उनका संबंध उपनिवेशों के लोगों से नहीं है।

विनोद शाही

अगर गांधी के ‘हिंद स्वराज’ के स्रोतों में जाएं और उनके बुनियादी सरोकारों को पकड़ने की कोशिश करें, तो पाएंगे कि गांधी अगर किसी सत्ता परिवर्तन की बात करते हैं, तो वह इटली का आस्ट्रिया की दासता से मुक्ति का संघर्ष है। लेकिन वे न अमेरिका के ‘वार आफ इंडिपेंडेंस’ की बात करते हैं, न उसके कुछ ही वर्ष बाद घटित फ्रांसीसी क्रांति की।

यूरोप और अमेरिका की विविध क्रांतियां, वहां के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के सभ्यतामूलक विकास के अगले पड़ावों की तरह देखी जाती हैं। गांधी पूछते हैं कि उनका मकसद क्या है? तीव्र आर्थिक विकास और उसकी वजह से मुमकिन होने वाला समाज-सांस्कृतिक विकास- ये दो उसके बुनियादी सरोकार हैं। पर गांधी को मनुष्य की फिक्र है। वे समझना चाहते हैं कि तीव्र आर्थिक विकास द्वारा संभव होने वाले समाज-सांस्कृतिक विकास के केंद्र में मनुष्य होता है या नहीं?

गांधी की मूल चिंता मनुष्य की चेतना के मानवीय अंतर्विकास की है। वे पाते हैं कि पश्चिम जिस वैज्ञानिक प्रगति की वजह से तीव्र आर्थिक विकास कर पाने लायक हुआ है, वह प्रगति उल्टे मनुष्य को इस नई सभ्यता में गैरजरूरी बना रही है। मनुष्य के दोहन-शोषण की सामर्थ्य भी उतनी ही बढ़ गई है, जितनी विकास की गति तीव्र हुई है। जो यंत्र तीव्र आर्थिक विकास का मूल कारक है, वह मनुष्य को एक यंत्र से अधिक अहमियत नहीं देता। तो गांधी के निशाने पर यंत्र क्रांति से जुड़ी वे तमाम चीजें आ जाती हैं, जो मनुष्य को प्राथमिक महत्त्व दे पाने में खुद को असमर्थ पाती हैं।

इसे गांधी के विज्ञान-विरोधी होने की तरह देखना, गांधी के चिंतन के वास्तविक अर्थों की उपेक्षा करना है। वे अगर विज्ञान-विरोधी होते, तो छापेखाने का इस्तेमाल करके अपने विचार लोगों तक नहीं ले जाते। वे विज्ञान, यंत्र, उद्योग, रेल, शहरीकरण आदि की आलोचना इस संदर्भ में करते हैं कि इन सबकी मनुष्य के उच्चतर मूल्यों के हनन में क्या भूमिका है? अगर पश्चिम इन सबका इस्तेमाल बेहतर मनुष्य और मानवीय सभ्यता के नवनिर्माण के लिए कर रहा होता, तो गांधी के पास इनके विरोध के लिए कोई दलील नहीं होती।

इस दिशा में अपने चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वे औद्योगिक क्रांति के गर्भ से प्रकट हुई प्रजातांत्रिक क्रांतियों के भी आलोचक हो जाते हैं। इस संदर्भ में उनकी आलोचना के निशाने पर आ जाती हैं, प्रजातांत्रिक संस्थाओं की तरह भारत में प्रवेश करने वाली संसदीय सत्ता प्रणाली, कचहरियों के वकीलों की जिरह पर निर्भर न्याय व्यवस्था, मनुष्य के रोगी होने पर उसका उपचार करने वाली चिकित्सा व्यवस्था तथा अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली द्वारा भारत की आत्मा को नष्ट करने वाली संस्कृति।

यह आलोचना गहरे में पश्चिम में घटित प्रजातांत्रिक क्रांतियों के उस वास्तविक चेहरे की आलोचना है, जिसका कुत्सित रूप यूरोप से बाहर उसके उपनिवेशों में प्रकट हुआ।

बहुत से लोगों को यह बात परेशान करती है कि गांधी प्रजातंत्र जैसी महान यूरोपीय परिघटना के इतने कटु आलोचक कैसे हो सकते हैं? प्रजातांत्रिक क्रांति के महान मानवीय मूल्यों के रूप में समानता, स्वतंत्रता, न्याय और भाईचारे के जो आदर्श जमीनी हकीकत बन सके, उनसे सम्मोहित हुए लोग ऐसी आलोचना को कभी स्वीकार नहीं कर पाते। फिर इन्हीं का अंतर्विकास बाद में प्रकट होने वाली समाजवादी क्रांतियों में होता है। हालांकि समाजवादी क्रांतियां प्रजातांत्रिक व्यवस्था के बजाय जनकेंद्रित तानाशाही की ओर आगे बढ़ीं, परंतु मुनाफों के अधिक न्यायपूर्ण वितरण के मामले में वे समाजार्थिक न्याय, समानता और भाईचारे के प्रजातांत्रिक मूल्यों को ही जमीनी हकीकत बनाने की कोशिश करती हैं।

दरअसल, गांधी की दृष्टि में पूरी मानवजाति है। इसलिए वे उपनिवेशों के लोगों को भी उतनी ही अहमियत देते हैं, जितनी यूरोप के समाजों को। वे देख पा रहे थे कि पूंजी के विकास के लिहाज से पश्चिम दोहरे मानदंड अपनाता है। वहां हुई प्रजातांत्रिक क्रांतियां जिन महान मूल्यों की बात करती हैं, उनका संबंध उपनिवेशों के लोगों से नहीं है।

पश्चिम की क्रांतियां पश्चिम के विकास और प्रगति तक सीमित थीं। उन्हें उपनिवेशों के विकास से कुछ खास लेना-देना नहीं था। 1775-83 वाली अमेरिका की ‘आजादी की लड़ाई’ का मकसद था, वहां विजयी हो गए आक्रांता अंग्रेजों को ब्रिटेन से अलहदा होकर स्वतंत्र राष्ट्र हो सकने लायक बनाना। वह मूल निवासियों की सामूहिक हत्या करके अमेरिका के खुद शासक होने के लिए आवाज उठाने वाले हमलावरों की अपने लिए पाई गई आजादी थी। 1789 की फ्रांस की महान मानी जाने वाली प्रजातांत्रिक क्रांति ने इसी अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम से प्रेरणा ली थी।

फ्रांस का मध्यवर्ग अनेक देशों में अपने उपनिवेश बनाने में कामयाब हो चुका था। अब वहां के नवधनाढ्य हो रहे साम्राज्यवादी मानसिकता वाले लुटेरों को अपनी लूट पर मिल्कियत की आजादी चाहिए थी। फ्रांसीसी क्रांति के चिंतक, रूसो और वोल्तेयर जैसे लोग, मूल रूप में ‘संपत्ति पर निजी मिल्कियत के अधिकार’ को मुद्दा बना कर क्रांति का आह्वान कर रहे थे। यानी जिसे प्रजातंत्र कहते हैं, वह दरअसल नवधनाढ्य वर्ग द्वारा खोजा गया, सत्ता में सीधा हस्तक्षेप करने का, नया इंतजाम था।

दो फरवरी 1848 को जारी हुए ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ को अगर समाजवादी क्रांतियों का सूत्रपात करने वाली घटना मानें, तो कह सकते हैं कि इसने पश्चिमी क्रांतियों के इस पूर्व परिदृश्य में बस इतनी तब्दीली की कि वहां का पूंजीपति, वहां के श्रमिकों का दोहन-शोषण उतनी निर्दयता से न करे, जितना वह उपनिवेशों के संदर्भ में करने का आदी हो गया था।

अफ्रीका और एशिया के दास श्रमिकों तथा भारत जैसे देशों के गिरमिटिया मजदूरों के समान अधिकारों की बात यूरोप और अमेरिका में कभी बड़ा विचारधारात्मक मुद्दा नहीं बनी। समाजवादी चिंतन में जब विश्व के मजदूरों के समान अधिकारों की बात उठती है, तो बड़े-बड़े समाजवादी विचारक भी ‘लुंपेन’ की एक अलग कोटि बना कर उपनिवेशों की शोषित श्रम-संपदा के मानवीय अधिकारों की बात को ही अप्रासंगिक बना देते हैं। बाद में इन देशों में जब बात दास प्रथा के उन्मूलन तक पहुंची, तब भी सभी श्रमिकों के लिए समान अधिकार पाने का रास्ता एकदम से नहीं खुला।

अमेरिका में तो अफ्रीकी मूल के अनेक बेरोजगार युवक अभी तक गुजर-बसर के लिए अक्सर नशे और हथियारों की तस्करी करते पाए जाते हैं और ऐसा करते-करते वे खुद नशेड़ी होकर ‘लुंपेन’ की कोटि में धकेल दिए जाते हैं। यह तो अब कहीं जाकर अश्वेत फ्रांसीसी मनोविश्लेषक फ्रैंज फेनन जैसे लोगों ने यह सवाल उठाना शुरू किया है कि ‘लुंपेन’ को जन्म देने की जिम्मेवारी किसकी है?

क्या वह खुद उन साम्राज्यवादी लुटेरों की जिम्मेवारी नहीं, जिन्होंने उनका अमानवीय और अनैतिक शोषण करके उन्हें नरपशुओं में बदल दिया? क्या उपनिवेशों के श्रमिकों के एक बड़े हिस्से के ‘आपराधिक’ होने के कारण, जिसे उन्होंने ही अपराधी होने के लिए विवश किया, उनके ‘समान अधिकारों’ की बात न्यायोचित नहीं रह जाती? लेकिन बात अपराध वृत्ति वाले श्रमिकों की ही नहीं है, वह एक सामान्य नियम की तरह बाकियों पर भी लागू होती है।

आज के दौर की बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी उसी इतिहास प्रणीत अन्याय के नए संस्करण तैयार कर रही हैं। समान काम करने वाले भारतीय एशियाई ‘टेक्नोक्रैट’, अपने यूरो-अमेरिकी साथियों के मुकाबले में बहुत कम ‘सेलरी’ पाते हैं। अदायगी जब एक को रुपए में और दूसरे को यूरो में होती है, तो जमीन आसमान का फर्क पड़ जाता है।

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