POLITICS

क्‍यों जरूरी है समान नागरिक संहिता, क्‍या हैं इसे लागू करने में देरी के नुकसान?

  1. Hindi News
  2. ब्लॉग
  3. क्‍यों जरूरी है समान नागरिक संहिता, क्‍या हैं इसे लागू करने में देरी के नुकसान?

अब सोचिए जब इन देशों में मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार हो सकते है तो ऐसे कौन से कारण व्याप्त रहें होंगे कि 1930 के दौर में बना मुस्लिम पर्सनल लॉ अभी तक लोगों पर थोपा जा रहा है?

तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ प्रस्तुतिकरण के लिए किया गया है। (एक्सप्रेस इलस्ट्रेशन)

अभिनव नारायण झा

चर्चा उठना तो लाज‍िमी है। उठें भी क्यों न? संविधान के नीति निर्देशक तत्व के अधीन अनुच्छेद 44 इसकी दास्तां और प्रधानता को बल देने के लिए काफी है। अनुच्छेद के तहत राज्यों को उचित समय पर सभी धर्मों के लिए समान नागरिक कानून बनाने की खुली वकालत जगजाहिर है। जब संविधान में साफ़ तौर पर इसका ज़िक्र किया गया है तो फिर इसे लागू करने में क्या अड़चन है? एक तरफ जहां संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता पर जोर दिया गया है तो दूसरी तरफ समान नागरिक संहिता का जिक्र कहीं न कहीं धर्मनिरपेक्षता की कड़ी को साधने का एक महत्वपूर्ण आयाम माना जा सकता है।

जब देश में बाकी पहलुओं के लिए एक समान कानून का पालन किया जाता है तो फिर सभी नागरिकों के लिए व्यक्तिगत कानून एक क्यों नहीं? यह सवाल न सिर्फ मन को कचोटता है बल्कि भारत के संविधान पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करता है। हालांकि कहीं न कहीं संविधान में भी विरोधाभास का स्वर साफ झलकता है। एक तरफ जहां अनुच्छेद 44 राज्यों को समान नागरिक संहिता की दिशा में कदम बढ़ाने को कहता है तो वहीं दूसरी तरफ अनुच्छेद 37 इसको लागू करने के लिए न्यायालय को अधिकार देने से वंचित करता है। इसका साफ मतलब है कि अगर सरकार इस दिशा में आगे कदम नहीं बढ़ाती है तो न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने का कोई भी विकल्प मौजूद नहीं रह जाता है। इतना ही नहीं व्यक्तिगत कानूनों को संघ सूची के बदले समवर्ती सूची में रखने के कारण क्या थे? इसी अंतर्विरोध की वजह से कई सारे पहलुओं पर अभी तक मामला विचाराधीन है।

समय समय पर न्यायालय ने भी समान नागरिक संहिता की वकालत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के निर्णयों और टिप्पणियों ने सार्वजानिक पटल पर हमेशा से सुर्खियां बटोरी है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय के द्वारा समान नागरिक संहिता पर की गई टिप्पणी भी चर्चा का विषय बनी हुई है।

साल 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम केस में संसद को सीधे तौर पर समान नागरिक संहिता स्थापित करने के लिए निर्देशित किया। इसी प्रकरण में राजीव गांधी ने सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले को बदलने के लिए संसद में अध्यादेश लाया था। जॉर्डन डिएंगडेह बनाम एस.एस. चोपड़ा केस, सरला मुद्गल बनाम एसोसिएशन ऑफ इंडिया केस और ऐसे ही न जाने कितने मामलों में समान व्यक्तिगत कानून नहीं होने की वजह से काफी खामियाजा उठाना पड़ा। न्यायालय को भी इसमें दखल देना पड़ा और समान नागरिक संहिता की दिशा में सख़्त कदम बढ़ाने के लिए कहा गया।

इसके विपरीत गौर करने वाली बात है कि भारत को छोड़कर दूसरे देशों में मुस्लिम पर्सनल लॉ में काफी सुधार हुए है। मुस्लिम बहुल देशों की बात करें तो बहुविवाह और तीन तलाक जैसी लैंगिक असमानता वाली प्रथाओं को भी समाप्त कर दिया गया है। ट्यूनीशिया, तुर्की, पाकिस्तान, बांग्लादेश, इंडोनेशिया, इराक, सोमालिया, सीरिया, मिस्र, मोरक्को, ईरान जैसे देशों में एक से अधिक पति-पत्नी होने के कृत्य को पूरी तरह से प्रतिबंधित किया गया है।

अब सोचिए जब इन देशों में मुस्लिम पर्सनल लॉ में सुधार हो सकते है तो ऐसे कौन से कारण व्याप्त रहें होंगे कि 1930 के दौर में बना मुस्लिम पर्सनल लॉ अभी तक लोगों पर थोपा जा रहा है? क्या धर्म और मज़हब सियासत की धारा में इतना बह चुका है कि यह विभिन्न राष्ट्रों में अपनी सहौलियत के अनुसार परिवर्तित होते चला आ रहा है? यह कई सारे सवाल है जिसका जवाब आजाद हिंदुस्तान के 75 साल के बाद भी नहीं मिल पाया है। इसे दुर्भाग्य कहें या राजनीतिक मंशा, इसे विडंबना का नाम दें या फिर महज़ इत्तेफ़ाक। कारण जो भी हो, आखिरकार इसका खामियाजा जनता को उठाना पड़ रहा है। राजनैतिक लाभ के लिए बीते 75 सालों से राजनीतिक दल इसको हथियार बना कर राज कर रहे हैं।

न्याय में इतना विलंब नहीं होना चाहिए कि वह अन्याय लगने लगे। जरूरत है देश को समान नागरिक संहिता की, जरूरत है देश में सभी को एक चश्मे से देखने की, जरूरत है देश को गोवा जैसे राज्य के उदाहरण को चरितार्थ करने की, जरूरत है देश को एक बेहतर दिशा में आगे कदम बढ़ाने की। क्योंकि सामाजिक न्याय, सामाजिक उत्थान और लैंगिक समानता तब तक स्थापित नहीं हो सकता है जबतक देश में दो विधान लागू रहेंगे।

समान नागरिक संहिता और व्यक्तिगत कानून के आने से समाज को स्थिरता प्रदान होगी। राष्ट्र महान तभी हो सकता है जब इतिहास के पन्नों को टटोल कर उसे वर्तमान में ठीक करने का प्रयास किया जाएगा। जब तक समाज में बैठें अंतिम व्यक्ति तक इसका लाभ नहीं पहुंचेगा तब तक यह सिर्फ एक छलावा है और इसके सिवा कुछ भी नहीं। समान नागरिक संहिता के आने से समाज के हर वर्ग तक समानता पहुंचेगी और तब जाकर संविधान का ध्येय सफल माना जाएगा।

(लेखक कानून के जानकार हैं। यहां व्‍यक्‍त व‍िचार उनके निजी हैं।)

Read More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
%d bloggers like this: