POLITICS

क्या कसीदे पढ़ेंगे जीएसटी के?

  1. Hindi News
  2. रविवारीय स्तम्भ
  3. क्या कसीदे पढ़ेंगे जीएसटी के?

2016 में इसकी स्थापना के बाद से अब तक किसी भी उपाध्यक्ष का चयन नहीं किया गया है। जीएसटी परिषद की अक्तूबर, 2020 और अप्रैल, 2021 के बीच छह महीने तक बैठक नहीं हुई। ‘सिफारिशें’ करने वाले अधिकारियों की जीएसटी कार्यान्वयन समिति का गठन करके चुपके से (और प्रभावी रूप से) इसे दरकिनार कर दिया गया है। अब केंद्र सरकार खुद जीएसटी परिषद और राज्य विधानमंडलों को दरकिनार कर सारे नियम बनाती है!

जीएसटी अनिवार्य रूप से एक उपभोग कर है और अंतिम उपभोग बिंदु पर लगाया जाता है। (प्रतिकात्मक तस्वीर)

वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) कोई अनोखा जीव नहीं है। यह संघीय और एकात्मक राष्ट्र-राज्यों में लागू है। सब जगह इसके अलग-अलग स्वरूप हैं, पर मूल सिद्धांत सबका एक ही है : कि आपूर्ति शृंखला के एक चरण में भुगतान किए गए कर को अगले चरण में देय कर के विरुद्ध समायोजित किया जाना चाहिए। कर के ऊपर दूसरा कोई और कर नहीं होना चाहिए।

उत्पाद शुल्क और सेवा कर के प्रभाव को कम करने के लिए मोडवैट और फिर सेनवैट (केंद्रीय वैट) पेश किया गया था। इसका प्रदर्शन काफी अच्छा रहा। बिक्री कर के स्थान पर वैट (मूल्य वर्धित कर) अपनाने के लिए राज्यों को काफी प्रयास करके राजी किया गया। केंद्र सरकार द्वारा सेनवैट और राज्य सरकारों द्वारा वैट स्वतंत्र रूप से अपने अधिकार क्षेत्र में संचालित होते हैं। हालांकि अंतरराज्यीय बिक्री और अंतरराज्यीय सेवाओं के बीच कुछ अनसुलझे मुद्दे थे। कुछ ऐसे भी मुद्दे थे, जैसे आपूर्ति की शृंखला में, एक स्तर पर एक ‘सेवा’ प्रदान की जाती थी और दूसरे स्तर पर ‘बिक्री’ की जाती थी। इसे सुलझाने का एक ही उपाय था जीएसटी, जो सभी बिक्रियों और सेवाओं पर लागू होगा।

एक काम पूरा हुआ


केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को एक ही सतह पर लाना काफी कठिन काम था। उसमें जिन मामलों को सुलझाया जाना था उनमें से प्रमुख थे:


* कि एक संप्रभु राज्य के पास कर उगाही की शक्ति होती है;


* कि भारतीय संविधान की प्रकृति संघीय है और उसमें कर उगाही का अधिकार केंद्र और राज्यों के बीच विभाजित है;


* कि राज्यों को कर उगाही संबंधी अपनी विशेष शक्ति को छोड़ना आवश्यक था, क्योंकि माल की बिक्री पर लगने वाला कर उनके राजस्व का प्रमुख स्रोत था;


* कि बड़े राज्यों और छोटे राज्यों के बीच अंतर करना उचित नहीं था;


* कि राज्यों को मुआवजे के आश्वासन और उसके लिए एक प्रवर्तनीय तंत्र के माध्यम से उनके होने वाले राजस्व के नुकसान का भय दूर करना होगा;


* कि साझा संपभुता का पालन आपसी विश्वास और सम्मान के आधार पर ही किया जा सकता है; और


* मतदान को लेकर एक नियम आवश्यक था, उसमें महत्त्वपूर्ण अलिखित नियम यह रखा गया कि सभी निर्णय सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए, न कि पार्टी के आधार पर।

यशवंत सिन्हा, दिवंगत प्रणब मुखर्जी और मैंने ऊपर लिखे सारे सिद्धांतों का पालन करने का प्रयास किया। अरुण जेटली ने भी ऐसा ही किया, हालांकि वे शुरुआती कर दरों के मामले में फिसल गए। हालांकि जब तक अरुण जेटली अध्यक्ष रहे, जीएसटी के लिए बुलाई गई वित्त मंत्रियों के समूह और जीएसटी परिषद की बैठकें हमेशा सहज और बिना किसी टकराव के संपन्न हुईं। जीएसटी की प्रक्रिया को रुक-रुक कर, लेकिन फिर भी उन्होंने आगे बढ़ाया।

खराबी


उसके बाद श्रीमती निर्मला सीतारमण का प्रवेश हुआ। फिर तो परिषद की शायद ही कोई ऐसी बैठक हुई होगी, जिसमें विवाद और टकराव न हुआ हो और वह सफलता पूर्वक संपन्न हो गई हो। अब तो स्थिति यह है कि परस्पर विश्वास और सम्मान पूरी तरह टूट चुके हैं, खत्म हो चुके हैं।

संवैधानिक प्रावधान स्पष्ट हैं। अनुच्छेद 246ए अंतरराज्यीय व्यापार और वाणिज्य को छोड़ कर संसद और विधानसभा दोनों को जीएसटी उगाही की शक्ति प्रदान करता है। अंतरराज्यीय व्यापार के मामले में अनुच्छेद 269ए में कहा गया है कि जीएसटी ‘भारत सरकार द्वारा लगाया जाएगा और फिर वस्तु एवं सेवा कर परिषद की सिफारिशों के आधार पर इस कर का बंटवारा केंद्र और राज्यों के बीच किया जाएगा।’ अनुच्छेद 279ए के माध्यम से जीएसटी परिषद का गठन और केंद्रीय वित्तमंत्री को उसके अध्यक्ष के रूप में नियुक्त कर इस चक्र को पूरा किया गया है। इसके अलावा उसमें अनिवार्य रूप से एक उपाध्यक्ष के चुनाव की आवश्यकता रेखांकित की गई है। परिषद को कर, उपकर और अधिभार सहित जीएसटी से संबंधित हर मामले में अनिवार्य रूप से सर्वसम्मति और सिफारिशें करने को अधिकृत किया गया है। उसे मतदान के जरिए करों से संबंधित विवादों के समाधान का तंत्र विकसित करने को अधिकृत किया गया है, ताकि केंद्र, राज्यों पर किसी भी तरह हावी न होने पाए।

मगर अब जीएसटी परिषद की ये प्रमुख विशेषताएं खत्म हो गई हैं। 2016 में इसकी स्थापना के बाद से अब तक किसी भी उपाध्यक्ष का चयन नहीं किया गया है। जीएसटी परिषद की अक्तूबर, 2020 और अप्रैल, 2021 के बीच छह महीने तक बैठक नहीं हुई। ‘सिफारिशें’ करने वाले अधिकारियों की जीएसटी कार्यान्वयन समिति का गठन करके चुपके से (और प्रभावी रूप से) इसे दरकिनार कर दिया गया है। अब केंद्र सरकार खुद जीएसटी परिषद और राज्य विधानमंडलों को दरकिनार कर सारे नियम बनाती है!

हथियार के रूप में जीएसटी


जीएसटी परिषद की तिरालीसवीं बैठक में मनप्रीत बादल (वित्तमंत्री, पंजाब) ने उपरोक्त सभी मुद्दों को उठाया और दो जरूरी मुद्दों पर बल दिया : कोविड के उपचार और प्रबंधन से जुड़ी वस्तुओं पर जीएसटी दरों में कटौती की जानी चाहिए और जीएसटी कार्यान्वयन समिति में प्रतिनिधित्व बढ़ाया जाना चाहिए। बैठक के बाद, केंद्रीय वित्तमंत्री ने कोविड से संबंधित जीएसटी दरों की समीक्षा के लिए आठ मंत्रियों की एक समिति का गठन किया और, स्पष्ट रूप से, तीन कांग्रेस शासित राज्यों और अन्य राज्यों को बाहर कर दिया, जिन्होंने दरों में कटौती के लिए जबर्दस्त तर्क दिए थे!

डॉ अमित मित्रा (वित्तमंत्री, पश्चिम बंगाल) की ओर से सुश्री सीतारमण को 4 जून, 2021 को लिखे गए एक पत्र के अनुसार, जनवरी 2021 तक राज्यों को जीएसटी मुआवजा बकाया 63,000 करोड़ रुपए था। पंजाब, राजस्थान और छत्तीसगढ़ ने दावा किया है कि उनका 1 जून तक का बकाया क्रमश: 7393 करोड़ रुपए, 4635 करोड़ रुपए और 3069 करोड़ रुपए है। फिर भी, 15 जून को एक टीवी साक्षात्कार में, सुश्री सीतारमण ने गुस्से में साक्षात्कारकर्ता का खंडन किया और कहा- ‘क्या बकाया है, मैंने सभी राज्यों के जीएसटी बकाए का भुगतान कर दिया है!’

मोदी सरकार ने राज्यों को डराने के लिए जीएसटी को हथियार बनाया है। जीएसटी परिषद को महज एक बड़बोली दुकान में अपघटित कर दिया गया है। प्रभावी विधायी शक्तियां जीएसटी कार्यान्वयन समिति और केंद्र सरकार द्वारा हड़प ली गई हैं। जीएसटी बकाया और मुआवजे को रोक दिया गया है या राज्यों को धन के लिए केंद्र सरकार के सामने ‘भीख’ मांगने को मजबूर कर दिया है। जन्नत इसकी इजाजत नहीं देती, मगर मोदी सरकार जीएसटी के लिए स्तुतिगान का मार्ग प्रशस्त कर रही है।

Read More

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
%d bloggers like this: