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क्या ओबीसी की गिनती कराएगी सरकार?

क्या ओबीसी की गिनती कराएगी सरकार?

आर्थिक सवालों पर फेल हो चुकी या नए आर्थिक दर्शन की जगह पुराने को ही नया स्लोगन बनाकर अपना काम चला रही भारत की राजनीति को एक शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है. राजनीति का भगोड़ा सिस्टम. जिसके तहत हर दल हर नेता मूल सवालों से भाग रहा है. कोई सांप्रदायिकता से लड़ने के बजाए भागने लगता है, शहर में रंगाई पुताई को विकास बता कर उसके पोस्टर लगाने लगता है, तो कोई बेरोज़गारी और ग़रीबी के सवालों से भागने के लिए सांम्प्रायिकता को गले लगाने लगता है. सब भाग रहे हैं लेकिन भागते भागते सब अंत में वहीं पहुंच गए हैं जहां से भागना शुरू किया था. 

इसलिए किसी भी दल और उन दलों के किसी भी सांसद ने ओबीसी बिल का विरोध नहीं किया. संविधान के 127 वें संशोधन के तहत अब राज्यों को भी अपने हिसाब से ओबीसी सूची बनाने का अधिकार मिल गया है. हरियाणा में जाट तो राजस्थान में मीणा तो महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण के सवाल उठते रहे हैं. इस आम सहमति से गोदी मीडिया संकट में होगा जो आए दिन जातिवाद के विरोध के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाता रहता है. उसे भी स्वागत करना पड़ रहा होगा. लोकसभा में इस बिल के खिलाफ एक वोट नहीं पड़ा है. इसका मतलब है देश का एक भी सांसद इसे जातिवाद नहीं मानता है. एक भी दल इसे जातिवाद नहीं मानता है. बेशक इस प्रश्न पर विचार किया जा सकता है कि आखिर जो गाड़ी अंध राष्ट्रवाद से हाकी जा रही थी वो घूमकर जाति के अलग-अलग प्रश्नों पर क्यों लौट आई है.

अगर सरकार चाहती कि लोग बेरोज़गारी और नौकरी पर बात करें तो वह इनके आंकड़े देती न कि छिपाती. इसलिए क्यों और कैसे भारत की राजनीति धर्म और पहचान की राजनीति छोड़ ओबीसी के स्पेस में होड़ करने लगी है इसके कारण जाति में नहीं हैं, बल्कि आर्थिक असफलता में हैं. 

सात जुलाई के मंत्रिमंडल विस्तार में कितने गर्व के साथ गोदी मीडिया गिना रहा था और गिनवाया भी जा रहा था कि कुछ ऐतिहासिक हुआ है, 27 ओबीसी मंत्री बने हैं और 12 दलित मंत्री हैं. इसके पोस्टर शहर शहर लगाए गए. धन्यवाद मोदी जी लिखा गया. जब ओबीसी मंत्री गिने जा सकते हैं तो देश में कितने ओबीसी हैं और दलित हैं वो क्यों नहीं गिने जा सकते हैं. जब राजनीति के लिए दूसरे धर्म की आबादी बताई जा सकती है तो राजनीति के लिए जाति की संख्या क्यों नहीं मालूम होनी चाहिए. क्या यह बात आप नहीं जानते कि मंत्री बनाने से पहले जाति देखी जाती है? तो फिर उनकी जाति की संख्या का सही आंकड़ा क्यों नहीं होना चाहिए. 

इस साल क्यों दिया गया क्योंकि ज़माने बाद उन्माद और अंध राष्ट्रवाद के बाद राजनीति के पुराने स्टेडियम का जीर्णोद्धार किया जा रहा है जिसके उद्घाटन करने की होड़ मची है.ओबीसी बिल के बहाने हर दल अपने आपको ओबीसी हितैषी साबित करने पर लगा है. ज़ाहिर है इस होड़ में जाति की गिनती का सवाल आना ही था जिससे बीजेपी बच रही थी. जाति की गणना को जातिवाद के चश्मे से देखने की गलती मत कीजिए. गणना नहीं है तब भी जातिवाद है. इसे जातिवाद बताने वाले भी राजनीति में अपनी दावेदारी संख्या के आधार पर करते हैं तो क्या यह अच्छा नहीं होगा कि उनकी जाति की संख्या भी ठीक ठीक बता दी जाए. 


 


यूपी चुनाव में हर दल ब्राह्मण समाज के लिए सभा कर रहा है. सपा भी और बसपा भी. आए दिन हेडलाइन छपती है. क्या ऐसी सभाओं में जाने वाले ब्राह्मण समाज ने विरोध कर दिया कि ये जातिवादी राजनीति है हम इसमें नहीं जाएंगे? दूसरी तरफ बीजेपी भी अलग अलग जातियों के नेताओं और दलों को साथ ला रही है. हम देखना नहीं चाहते कि सब खुलकर एक ही खेल खेल रहे हैं तो किसी भी खेल का एकमात्र वैज्ञानिक तरीका यह है कि खिलाड़ियों की संख्या हर पक्ष को मालूम रहे. ऐसा कैसे होगा कि उन्माद के लिए धर्म के हिसाब से गिनती होगी और विकास के लिए जाति के हिसाब से नहीं होगी? जाति की जनगणना से भारत की जाति की राजनीति में बराबरी आएगी. 

ऐसा नहीं था कि जाति की गणना पर उलझन में फंसी बीजेपी ओबीसी राजनीति से दूर हो गई थी. 2015 के साल में पहली बार बीजेपी में ओबीसी मोर्चा बनाया गया था. किसी भी दल में इस तरह का मोर्चा ऐसे समय में फैसलों को महान बनाने के लिए बताया जाता है. इस साल जून के महीने से ही राजनीति का चक्र ओबीसी की राजनीति प्रमुख स्थान प्राप्त कर रही है लेकिन आप शायद भूल गए हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ज़रूरत पड़ने पर अपनी ओबीसी पहचान को सामने रखने से नहीं भूलते. 2019 का चुनाव हो रहा था, मायावती ने प्रधानमंत्री को नक़ली ओबीसी कह दिया था. 

प्रधानमंत्री अपनी जाति भी बता देते हैं, यह भी कह देते हैं कि वे जाति की राजनीति नहीं करते. चलिए तब मायावती ने उनकी जाति को लेकर कह दिया था कि फेक ओबीसी हैं. केवल फेक न्यू़ज़ ही नहीं होता इस देश में फेक ओबीसी भी हो सकता है और फेक आईएएस और आईपीएस भी. ठगी वाले समाचार पढ़ा कीजिए. हर दूसरे दिन कोई फेक आईएएस पकड़ा जाता है लोगों को ठगते हुए. एनीवे 2019 में तो मायावती ने कह दिया था लेकिन इस बार किसने उकसाया था कि दिल्ली में होर्डिंग लगे कि कितने ओबीसी मंत्री हैं? ..कौन है जो उन्हें जाति की राजनीति में घसीट रहा है. 2019 में प्रधानमंत्री हाथ जोड़कर विनती कर रहे थे कि जाति की राजनीति में मत खीचों. 2021 में सांसद में उन्हीं के सांसद ज़ोर शोर से ओबीसी ओबीसी ओबीसी बता रहे हैं.

भारत में दो तरह की असमानता है. एक असमानता है आर्थिक. नीतियों के कारण आज भारत में 2 प्रतिशत लोग अमीर हैं और बाकी 80 करोड़ ग़रीब हैं. दूसरी असमनता है जाति की. लेकिन जाति की असमनता का संबंध भी आर्थिक असमानता से है क्योंकि देश के संसाधनों पर शुरू से ही प्रभावशाली जातियों का कब्ज़ा रहा है जिनकी संख्या संपूर्ण आबादी में कम है. यह सवाल है कि 2015 में जाति की जनगणना से इंकार करने वाली मोदी सरकार या बीजेपी 2021 में इस सवाल को टाल पाएगी? 

14 जुलाई 2015 का प्राइम टाइम इसी पर था. उस साल बिहार में हो रहे चुनाव के संदर्भ में अमित शाह प्रधानमंत्री मोदी को पहला ओबीसी प्रधानमंत्री बता रहे थे जबकि तथ्य यह था कि देवेगौड़ा पहले ओबीसी प्रधानमंत्री थे. उस साल पूछा जा रहा था कि मोदी सरकार जाति की जनगणना की रिपोर्ट क्यों नहीं प्रकाशित कर रही है? शरद यादव, लालू यादव और नीतीश कुमार रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग कर रहे थे. तब लालू यादव ने पटना में राजभवन तक इस सवाल को लेकर मार्च किया था. उस साल बिहार बीजेपी के अध्यक्ष नंदकिशोर यादव बयान दे रहे थे कि इस तरह की मांग से RJD JDU समाज को तोड़ रहे हैं. बीजेपी की तरफ से बैटिंग करते हुए रामविलास पासवान ने कहा कि हम अपने समय से करेंगे, वैसे जाति की जनगणना की एक शर्त यह भी थी कि इसे पब्लिश नहीं किया जाएगा. क्या ऐसी कोई शर्त थी भी? अगर ऐसी शर्त होती तो जब 3 जुलाई 2015 को जनगणना रिपोर्ट जारी हुई तब उस समय के मंत्री चौधरी वीरेंद्र सिंह ने यह बता कही होती जब उनसे पूछा जा रहा था कि सरकार ने जाति के आंकड़े क्यों नहीं बताए, जबकि अनुसूचित जाति के आंकड़े बताए गए हैं. क्या सरकार कभी बताएगी? जवाब में वीरेंद्र सिंह ने कहा था कि यह जनगणना के महानिदेशक के अधिकार क्षेत्र में आता है. उन्हें ही सोचना होगा कि वे क्या सोचते हैं. यह पूरी तरह उनके अधिकार क्षेत्र का मामला है. केवल वही इन सवालों का जवाब दे सकते हैं. 

अब उसी जनता दल यूनाइटेड के साथ बीजेपी सरकार में है और जदयू जाति की गिनती की मांग कर रहा है. 2010 में जब मनमोहन सिंह की सरकार थी तब शरद यादव, लालू यादव और लेफ्ट ने जाति की गिनती की मांग उठाना शुरू कर दिया था. कांग्रेस के भीतर इसे लेकर विरोध था लेकिन वीरप्पा मोइली और व्यालार रवि इसके समर्थक थे. मनमोहन सिंह ने इस मांग को स्वीकार कर लिया और मंत्रियों का समूह बना दिया. सितंबर 2010 में तबके गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जून 2011 से सितम्बर 2011 के बीच जाति की गणना की घोषणा कर दी थी लेकिन 2015 में इसकी रिपोर्ट जारी नहीं हुई.

मनमोहन सिंह जाति की जनगणना के लिए मान गए थे क्या मोदी मानेंगे? क्या 2011 की जनगणना रिपोर्ट में जाति की गिनती की जो रिपोर्ट थी वो जारी कर दी जाएगी? 2010 की खबरों को पढ़ते हुए पता चला कि उस समय राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के जाति की गिनती के विरोध में था लेकिन अरुण जेटली और सुषमा स्वराज इसके हक में थे.

अगस्त 2010 में उस समय लोक सभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखा था और कहा था कि भारतीय जनता पार्टी ने लोक सभा में जातीय जनगणना पर अपना रुख़ साफ़ कर दिया है. पार्टी ये फिर से कहती है कि की 2011 की जनगणना में जाति का सवाल पूछा जा सकता है. मंगलवार को लोकसभा में जब ओबीसी बिल पर बहस हो रही थी तब बीजेपी की सांसद संघमित्रा मोर्या ने यह सवाल फिर से उठा दिया था जिस पर बीजेपी खुलकर बोलने से बचती रही है. 

संघमित्रा के साथ बीजेपी की सहयोगी अपना दल भी इस मांग के साथ है. जदयू भी है. अब बात उस होर्डिंग से आगे जा चुकी है कि कितने ओबीसी मंत्री बनाए गए हैं. आपने नीट मेडिकल आरक्षण की खबर से पहले एक तस्वीर देखी होगी कि ओबीसी मंत्री और सांसद प्रधानंमत्री से मिलकर नीट मेडिकल में आरक्षण की मांग कर रहे हैं. उसी तरह जनवरी 2016 में बीजेपी का ओबीसी मोर्चा प्रधानमंत्री मोदी से मिला था और जाति की गणना सार्वजनिक करने की मांग की थी. मोर्चा ने कर्पूरी ठाकुर फार्मूला के तर्ज पर ओबीसी के आरक्षण के भीतर आरक्षण की मांग की थी. कहा था कि किसी भी राज्य में ओबीसी को 15 प्रतिशत से अधिक कोटा नहीं मिलता है जबकि 27 प्रतिशत है. यह वो साल भी था जब मोहन भागवत ने कहा था कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए. अब आर एस एस आरक्षण की पुरज़ोर वकालत करता है और नियमित रुप से आरक्षण के समर्थन में बयान आते रहते हैं.

लोक सभा में कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने एक कदम आगे बढ़कर मराठा आरक्षण के संदर्भ में कहा कि पचास प्रतिशत की सीमा तोड़ देनी चाहिए. तब बीजेपी की तरफ से बिल पेश कर रहे सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री डॉ वीरेंद्र कुमार ने भी कहा कि सदन की भावनाओं का ध्यान रखा जाएगा.

आगे की सारी लड़ाई ओबीसी के मैदान में होने जा रही है. कांग्रेस ने पचास फीसदी से अधिक आरक्षण की मांग कर दी है. नीट मेडिकल परीक्षा में आरक्षण देने को लेकर सोनिया गांधी ने पिछले साल ही प्रधानमंत्री को पत्र लिखा था लेकिन अब सब कुछ सामने से होने लगा है. आज भी राज्य सभा में अभिषेक मनु सिंघवी ने जाति की गिनती और पचास फीसदी से अधिक आरक्षण की बात की. अभिषेक मनु सिंघवी ने बताया कि कई राज्यों में 80 प्रतिशत तक आरक्षण है तब फिर यह आशंका भी बेकार है कि जाति की गिनती होगी तो आरक्षण बढ़ेगा. वो तो बढ़ ही चुका है और अब तो सब बढ़ाने के पक्ष में भी हैं. क्या किसी ने दल कहा है कि पचास फीसदी से अधिक नहीं होना चाहिए, बीजेपी ने कहा है?

बिहार में आए दिन इस मसले को उठाया जाता है. राजद नेता तेजस्वी ने इसे बड़ा मुद्दा बना लिया है. नीतीश कह रहे हैं कि केंद्र नहीं कराएगा तो राज्य कराएगा. लेकिन वहां बीजेपी चुप है. क्या ओबीसी ओबीसी का जाप करते हुए बीजेपी जाति की गिनती की मांग को अब टाल पाएगी? 2015 में वह टाल चुकी है रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की लेकिन क्या अब इसे टाल पाएगी? जाति की गिनती की मांग ओबीसी नेता ही कर रहे हैं. 

तृणमूल सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने सवाल उठाया कि इतने महत्वपूर्ण बिल पर चर्चा हो रही है लेकिन प्रधानमंत्री खुद नहीं हैं. अखबारों में खबर यह छपी है कि प्रधानमंत्री ने संसद में न आने वाले भाजपा सांसदों की सूची मांगी है. 

जब जाति की गिनती होगी तब स्वाभाविक है कि उसके हिसाब से आरक्षण की सीमाएं नए सिरे से तय होंगी. इसी से जुड़ा एक सवाल है. व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी से जुड़े अंध राष्ट्र भक्तों का क्या होगा जिन्हें धार्मिक उन्माद की खुराक यह कह कर दी गई कि आरक्षण खत्म हो जाएगा. उन्हें समझ लेना होगा कि राजनीति की हवा अगस्त के महीने में बदल गई है. व्हाटसऐप यूनिवर्सिटी में जितने भी लोग नेहरू के बारे में अनाप शनाप कहते थे और आरक्षण का विरोध करते थे, वे चाहें तो दोबारा से नेहरू को प्यार कर सकते हैं. 

इससे पहले कि व्हाटसऐप यूनिवर्सिटी वाले आरक्षण का विरोध करने के लिए नेहरू की जय जय न करने लग जाएं उन्हें इंटरनेट सर्च करना होगा कि किस साल और किसकी सरकार में आरक्षण लागू हुआ था. मैं जानता हूं कि इस तरह की चर्चा से व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी वालों को दिक्कत होगी, ऐसे में वे कुछ दिन वीडियो कॉल पर NRI अंकिलों से बात कर सकते हैं. जाति की बात होगी तो उन्हें अच्छा नहीं लगता है. धर्म की बात होती तो बुरा नहीं लगता है. सवाल एक और है. निजीकरण के रहते क्या आरक्षण रह पाएगा? सरकारी संस्थान खत्म हो गए और नौकरियां घटती जा रही हैं. आरक्षित पद खाली पड़े हैं.जब तक अवसर में भागीदारी नहीं मिलेगी, तरक्की कैसे आएगी, जब आएगी तभी तो गुणवत्ता की बात होगी. उसकी बात होनी भी चाहिए लेकिन उसके कारण भी हमारे सामाजिक यथार्थ से जुड़े हैं. प्रतिभा से नहीं. 

अगर किसी ने यह सोचा कि कैसे पास होंगे, आरक्षण से गए हैं, मेरिट नहीं है तो उनकी जानकारी के लिए बता दूं. भारत में थर्ड डिवीज़न की शुरूआत ही इसलिए हुई क्योंकि मद्रास यूनिवर्सिटी में अपर कास्ट पास नहीं कर पा रहे थे. आज भी लाखों की संख्या में छात्र फ़ेल हो जाते हैं क्योंकि अच्छे शिक्षक नहीं होते हैं. तो जिन्हें पीढ़ियों से इन सब अधिकारों और अवसरों से वंचित रखा गया है उन्हें गुणवत्ता देना भी सरकार का काम है.

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